window.location = "http://www.yoururl.com"; Iqta System during Sultanate Period | सल्तनतकालीन अक्ता प्रणाली

Iqta System during Sultanate Period | सल्तनतकालीन अक्ता प्रणाली

 


विषय - प्रवेश (Introduction) -

मध्यकालीन भारत में तुर्की शासन के भू-राजस्व व्यवस्था के प्रारंभिक स्वरूप को समझने के लिए हमें सबसे पहले तुर्की शासन के स्वरूप को समझना होगा। प्रारंभ में तुर्की शासन की राजनीति दो मूलभूत तत्वों पर आधारित थी और ये दोनों तत्व स्वतंत्र रूप से विकसित हुये। इनमें से पहला तत्व इक्ता प्रणाली था और दूसरा तत्व खराज था। इक्ता का तात्पर्य हस्तांतरणीय लगान अधिन्यास से है और खराज का तात्पर्य गैर-मुस्लिम जनता पर लागू भूमिकर से है। इक्ता के प्रशासकीय ढॉंचे के अन्तर्गत किसी क्षेत्र से स्थायी सम्बन्ध न होते हुये भी शासक वर्ग के लिए वहा से आय की व्यवस्था की जाती थी। साथ ही यह प्रणाली शासक वर्ग की सामाजिक हैसियत तथा उसके राजनीतिक प्रभाव के निर्धारण का आधार भी मानी जाती थी। स्पष्ट है कि दिल्ली सल्तनत की राजनीतिक व्यवस्था अपने पूर्ववर्ती राजपूत राज्यों से भिन्न थी। 

अक्ता प्रणाली का अर्थ -

’अक्ता एक अरबी शब्द है जिसे एक प्रकार के प्रशासकीय अधिकार प्रदान करने के अर्थ में प्रयुक्त किया जाता था। किंतु अक्सर इस शब्द को भ्रामक अनुवाद के कारण यूरोप में प्रचलित ’फीफ़’ (जागीर) शब्द के अर्थ में प्रयुक्त किया जाता रहा है। मुस्लिम राज्य के अस्तित्व में आने के बाद प्रारंभिक कुछ शताब्दियों में राज्य के अंतर्गत विभिन्न भू-भागों को विशिष्ट खंडों में वितरित किया जाता रहा। इस विशिष्ट खंड को ’कता’ कहा जाता था। राज्य के भू-भाग वास्तव में अर्धस्वामित्वशाली उस्र अदा करने की शर्तों पर प्रदान किए जाते थे। मुस्लिम शासन के विस्तार के साथ ही राज्य का सैनिक उत्तरदायित्व भी बढ़ गया। शक्तिशाली सेना रखने के लिए अधिकाधिक भू-भाग की आवश्यकता पड़ने लगी। इसके परिणामस्वरूप एक नई व्यवस्था ने जन्म लिया, जिसे अक्ता कहा गया। इस प्रकार इस्लाम धर्म के प्रारंभ से ही राज्य की सेवा करने के बदले पुरस्कार स्वरूप अक्ता प्रदान करने का प्रचलन हो चुका था। सामान्यतया ऐसा माना जाता है कि अब्बासी खलीफाओं (754-861) के अंतर्गत आर्थिक तथा सामाजिक परिवर्तन ने वह पृष्ठभूमि प्रस्तुत की जिससे दसवीं शताब्दी में मुस्लिम समाज में भूमि प्रदान करने की प्रथा का आविर्भाव हुआ। खलीफा ने राज्य के असैनिक अधिकारियों को वेतन देने तथा अपने सैनिक अभियान के खर्च को पूरा करने के लिए अक्ता प्रणाली विकसित की। अधिकारी वर्ग तथा सेना का वेतन देने के लिए धन प्राप्ति की कठिनाई इतनी अधिक बढ़ गई कि अंततोगत्वा प्रशासकीय ढाँचा ही लड़खड़ा गया। इस वित्तीय कठिनाई के निदान के लिए सैनिकों एवं सैनिक अधिकारियों को वे भू-खंड बाँटे जाने लगे, जो अक्ता कहलाते थे। अक्ता प्राप्त व्यक्ति उक्त भू-खंडों के मालिक नहीं थे। वे केवल उसके लगान का ही उपयोग कर सकते थे। इसके परिणामस्वरूप आगे चलकर आबंटन व्यवस्था भी स्थापित हुई। खलीफा अल-मजमून के शासनकाल (833 ई०) में सेनानायकों को उनके वेतन के बदले विशेष भू-खंड का राजस्व या लगान आबंटित किया जाने लगा।

किसी सेनानायक को एक बड़े इलाके की कर वसूली का अधिकार प्राप्त होने पर वह अधिक आसानी से अपने को अर्ध-स्वतंत्र रूप में स्थापित करने का अवसर पा जाता था। इस वजह से राजस्व-प्राप्ति अनियमित होने पर भूमि-संबंधी अधिकार ही उसे प्रदान किया जाने लगा। सैनिकों को भूमि-संबंधी विशेष अनुदान देने की यह प्रथा अक्ता नाम से विख्यात हुई। 

सैद्धांतिक रूप से यह अक्ता-प्रणाली वंशानुगत प्रणाली नहीं थी। समय-समय पर इन अक्ताओं का पुनर्वितरण होता था तथा पदाधिकारी को सैनिक सेवा के लिए प्रस्तुत रहना पड़ता था। सिद्धांततः विस्तृत नियमों का पालन करना उसके लिए आवश्यक था और उसका निरीक्षण भी किया जाता था। अक्ता के अधिकारी अमीर सैनिकों को वेतन देने की जिम्मेदारी से मुक्त थे, क्योंकि ये सैनिक राज्य से ही वेतन अथवा ’अक्ता’ प्राप्त करते थे। प्रांतीय शासक, सैनिक कमांडर, राजस्व वसूल करने तथा उससे लाभांश प्राप्त करने वाले अधिकारी और अक्ता के विभिन्न कार्य-भार एक ही व्यक्ति में सन्निहित होने के कारण वास्तविक रूप से सरकार से स्वतंत्र एक विशाल भू-स्वामित्व वर्ग का आविर्भाव हुआ। अपने ही प्रांत के किसी क्षेत्र में अक्ता प्राप्त होने के कारण भी मुक्ताओं के वास्तविक अधिकार की वृद्धि में सहायता मिली। जहाँ कहीं भी इस तरह की स्थिति होती थी वहाँ मुक्ता के आर्थिक अधिकार तथा प्रांतीय शासन की शक्ति एक ही व्यक्ति में केंद्रित हो जाती थी और ये शासक व्यवहारतः दोनों प्रकार के अधिकारों का संपूर्ण प्रांत में प्रयोग करते थे। 

सल्जुकों के समय में (1037-1157 ई०) ’सैनिक’ तथा ’प्रशासकीय’ अक्ता में स्पष्ट रूप से भेद कर पाना कठिन है। ईरान में सल्जुकों के समय में अक्ता-भूमि के आम प्रचलन का प्रमाण मिलता है। सल्जुकों ने अपने समय में पूर्ववर्ती काल की अपेक्षा अक्ता का प्रचलन व्यापक स्तर पर किया। अक्ता पाने वाला अधिकार प्राप्त भू-भाग का सारा लगान अपने उपयोग के लिए रखता था और केंद्रीय शासन के प्रति उसका एकमात्र कर्तव्य सेना में अपनी व्यक्तिगत सेवा प्रदान करना था। अक्ता संबंधी नियुक्ति यदि महत्वपूर्ण होती थी तो उसे सैनिकों का एक दस्ता भी रखना पड़ता था। किंतु यह साधारण सैनिकों को न दी जाकर मुख्य रूप से उच्च पदाधिकारियों को ही प्रदान की जाती थी। इस प्रकार सल्जुकों के समय में अक्ता-प्रथा तुर्कों के प्रभुत्व विस्तार का एक प्रमुख माध्यम बन गई। इसी प्रकार तेरहवीं सदी के बाद मंगोल-तुर्की खानाबदोश सैनिकों के अभिजात वर्ग ने अपने प्राधान्य के विस्तार के लिए भी इस व्यवस्था का उपयोग किया।

धीरे-धीरे अक्ता प्रथा की विचारधारा एवं तत्संबंधी व्यवस्था में परिवर्तन आने लगा। आम तौर पर इस प्रथा की विशिष्टता थी सुल्तान का मुक्ता पर यथेष्ट प्रशासकीय तथा आर्थिक नियंत्रण जिसकी वास्तविक रूप में स्वतंत्र स्थिति नहीं थी और संक्षेप में, वह सेवा के बदले वेतन पाता था। वरिष्ठ अधिकारियों को जो अक्ता प्रदान की जाती थी, उसके बदले उन्हें अपने अधीन एक सैनिक टुकड़ी रखनी पड़ती थी जिसकी व्यवस्था वह अक्ता से प्राप्त आय के द्वारा करता था। इसी कारण मूल स्रोतों में ’बीस की अक्ता’, ’सौ की अक्ता’ आदि की चर्चा है। किंतु सुल्तान के अधीन सेना के जितने बड़े सैनिक दस्तों का यह संचालन करता था उसकी अपेक्षा उसकी अपनी सैनिक टुकड़ी छोटी होती थी। सैनिक दायित्वों की पूर्ति के लिए बड़े कठोर अनुशासन का प्रयोग किया जाता था। इस प्रकार राज्य द्वारा व्यक्ति विशेष को प्रदत्त भू-संपत्ति का अपना कहा जाता था। सामान्यतः इसे भू-अधिन्यास सूचक माना जाने लगा। वास्तव में यह भूमि से प्राप्त होने वाले भू-राजस्व का अनुदान था। मुसलिम राज्यों में अक्ता शब्द का इसी विशिष्ट अर्थ में प्रयोग होता था।

दिल्ली सल्तनत में अक्ता प्रथा :

दिल्ली सल्तनत के अन्तर्गत हिंद-फारसी ग्रन्थों मे भावी सेवा की शर्तो पर राजस्व हस्तांतरण के रूप में अवता को परिभाषित किया गया है। पुनर्हस्तान्तरण के सिद्धांत पर आधारित इसी राजस्व संबंधी नियुक्ति की प्रथा का दिल्ली सल्तनत की राजनैतिक व्यवस्था में बडी सतर्कता से अनुकरण किया गया। ऐसा प्रतीत होता है कि अक्ता-प्रथा जिस रूप में भारत पहुँची उसका प्रारूप सर्वप्रथम खलीफा मुक्तादिर ने इस उद्देश्य से बनाया था कि उसे अपने खिलाफत (राज्य) के विभिन्न क्षेत्रों पर नियुक्त मुक्ताओं से नियमित रूप से राजस्व प्राप्त होता रहे। ये मुक्ता लोग अपने प्रदेश के संपूर्ण राजस्व की वसूली करते थे और प्रशासन तथा सैनिकों के वेतन-संबंधी व्ययों के बाद बचे हुए धन में से एक निश्चित राशि को उन्हें बगदाद के दरबार में भेजना पड़ता था। हिंदुस्तान में भू-राजस्व अनुदान की ये मूलभूत विशेषताएँ सल्तनत शासन के प्रारंभ से अंत तक बनी रहीं। 

अक्ता के विभिन्न रूप -

अक्ता के विभिन्न रूप निम्नलिखित थे :

1. प्रांतीय शासक को अक्ता के रूप में संपूर्ण प्रांत प्रदान करना तथा उस्र अथवा खराज अथवा लगानया व्यक्तिगत करों से प्राप्त लाभ के बदले कुछ कृषि-भूमि का अनुदान ।

2. वेतन अथवा पेंशन के रूप में किसी भू-भाग के राजस्व का हस्तांतरण। किंतु यहाँ अक्ता की सैद्धांतिक विचारधारा को व्यापक बनाया गया। सीमा शुल्क, नदियों तथा नहरों से प्राप्त शुल्क तथा महसूल संबंधी राजस्व की ठेकेदारी को अक्ता में शामिल किया जाने लगा।

उपर्युक्त सभी प्रकार की अक्ताओं में प्रशासकीय अक्ता का ही सर्वाधिक महत्व था। यह निस्संदेह सैनिक अनुदान था किंतु इसके साथ कुछ प्रशासकीय दायित्व भी संलग्न थे। भारत में वे अक्ता सर्वाधिक प्रचलित थे जिसे मावर्दी ने अक्ता-ए-तमलीक (नियुक्ति द्वारा), हस्तांतरित अक्ता तथा अक्ता-ए-इस्तिरा़लाल (स्वभोगाधिकार संबंधी अक्ता) कहा है। इनमें प्रथम अथवा तमलीक का संबंध भूमि से था तथा दूसरा अर्थात् इस्तिरालाल का तात्पर्य वृत्ति या वेतन से था। अक्ता प्राप्त करने वाले अधिकारियों को मुक्ता, अमीर तथा कभी-कभी मलिक भी कहा जाता था।

मुक्ता के वेतन -

मुद्रामूल्य (अब्रा) को आधार मानकर अक्ता का हिसाब वेतन-मूल्य के बराबर किया जाता था। मूलतः इसका उद्देश्य राजकोष की मध्यस्थता के बिना ही वेतन-वृत्ति को सीधे राजस्व-स्रोत से ही वसूल करना था। यद्यपि मुक्ता के पारिश्रमिक अथवा मुवाजिब की धनराशि के संबंध में कोई लिखित प्रमाण प्राप्त नहीं हैं किंतु ऐसा अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि कुछ भाग उसे अवश्य मिलता होगा। खान, मलिक तथा अमीर लोगों को केंद्रीय सेवा से वेतन नहीं दिया जाता था वरन वे अपने पद या ओहदे के अनुपात में भू-राजस्व को ही अनुदान के रूप में प्राप्त करते थे। विभिन्न स्रोतों से यह पता चलता है कि खान, मलिक, अमीर तथा सिपहसालार राजकोप द्वारा प्रदत्त भूमि का राजस्व प्राप्त करते थे और यदि उनमें वृद्धि नहीं होती थी तो कभी किसी प्रकार की कमी भी नहीं आती थी। साधारण रूप से इस अनुमानित आय से कहीं अधिक धनराशि उन्हें प्राप्त हो जाती थी। खान को दो लाख टंकों का राजस्व अनुदान वेतन में मिलता था। प्रत्येक टंके का मूल्य आठ दिरहम के बराबर होता था। यह उसकी व्यक्तिगत आय थी। उसके नेतृत्व में लड़ने वाले सैनिकों को इसमें से कुछ धन देना उसके लिए आवश्यक नहीं था। एक मलिक को मिलने वाली धनराशि पचास से साठ हजार टंका तक होती थी। अमीरों को तीस से चालीस हजार टंका तथा सिपहसालार को बीस हजार टंका अथवा इस मूल्य के बराबर का राजस्व प्राप्त होता था। सिपाहियों का वेतन दस से एक हजार टंका के बीच निर्धारित किया जाता था। हमें अनेक ऐसे उदाहरण भी प्राप्त होते हैं जिनमें मुक्ता केवल हिंदू क्षेत्रों को जीतकर ही अपनी अक्ता का विस्तार नहीं करते थे वरन अन्य अक्ताओं को पूरी तरह से अथवा उसके कुछ अंश को अपनी अक्ता में शामिल करके अपना प्रभाव-विस्तार करते थे। इस तथ्य से ऐसा प्रतीत होता है कि वेतन का निर्धारण संपूर्ण राजस्व से अनुपात के आधार पर किया जाता था। किंतु यह अनुपात कितना था इसे निश्चित करना संभव नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि किसी मुक्ता को बड़ी अक्ता से स्थानांतरित करके छोटी अक्ता पर नियुक्त नहीं किया जाता था। इसका अपवाद हम केवल दंडरूप में पाते हैं जब इल्तुतमिश ने कबीर ख़ाँ को मुल्तान से हटाकर पलवल की छोटी अक्ता दी अथवा बल्बन ने 1253 ई० में किशलू ख़ाँ को दरबार से निकालकर उसे नागौर की व्यापक अक्ता से हटाया और कड़ा में नियुक्त किया। यह महत्वपूर्ण तथ्य ध्यान देने योग्य है कि मुक्ता को राजस्व का एक निश्चित भाग ही प्रदान किया जाता था और उसकी आर्थिक स्थिति अक्तादार से भिन्न थी क्योंकि इसका केंद्रीय राजकोष के प्रति कोई उत्तरदायित्व नहीं था। 

भारत में तुर्की शासन के प्रारंभिक काल में अक्ता के लिए निजाम-उल-मुल्क-तूसी द्वारा सियासतनामा में व्यक्त मत का उद्धरण यहाँ उपयोगी होगा। इस प्रसिद्ध ग्रंथ में उसने ग्यारहवीं शताब्दी में पश्चिमी एशिया के सल्जुक, ख़्वारिज्म के शासकों तथा तुर्की राज्यों के अंतर्गत राजनीतिक प्रशासन के अनुभव का सारांश प्रस्तुत किया है-

‘‘मुक्ता लोगों को यह ज्ञात होना चाहिए कि रिआया पर उनके अधिकार का अर्थ केवल उनसे यथोचित धनराशि तथा अतिरिक्त लाभ (माल-ए-हक) को शांतिपूर्ण ढंग से प्राप्त करना है... रिआया के जीवन, संपत्ति, परिवार को हर प्रकार के नुकसान से बचाना चाहिए। उन पर मुक्ताओं का कोई अधिकार नहीं है। यदि रिआया सुल्तान से सीधे अपील करना चाहती है तो मुक्ता को उन्हें रोकना नहीं चाहिए। जो मुक्ता इन नियमों को भंग करता है उसे पदच्युत कर देना चाहिए और उसे दंडित करना भी अपेक्षित है... मुक्ता तथा वली उसी प्रकार उन लोगों पर निरीक्षक के समान हैं, जैसे मुक्ता पर सुल्तान निरीक्षक के रूप में होता है... प्रत्येक तीन या चार वर्ष के बाद आमिलों तथा मुक्ताओं का स्थानांतरण करना उचित है जिससे कि वे अधिक शक्ति अर्जित न कर सकें।‘‘

यह महत्वपूर्ण बात है कि पर्याप्त विस्तार के साथ भारत में इसी प्रथा का अनुसरण किया गया और सैनिक प्रांतपति पद की व्यवस्था भी लागू की गई। 

अक्ता लागू करने का उद्देश्य -

तुर्कों के सामने प्रशासन संबंधी अनेक जटिल समस्याएँ थीं। जितने व्यापक क्षेत्र के प्रशासन की जिम्मेदारी उनपर थी उसकी तुलना में उन्हें साधन कम उपलब्ध थे। इससे भी अधिक स्थानीय महत्व की अनेक समस्याएँ उपस्थित हुईं जिनका समाधान भी स्थानीय स्तर पर ही संभव था। तुर्कों ने इस बात को शीघ्र ही समझ लिया था कि आंतरिक रूप से देश में अनेकों विकेंद्रीकरण की प्रवृत्तियों तथा सीमाओं पर विदेशी आक्रमण के निरंतर बढ़ते हुए खतरे के कारण इतने विस्तृत क्षेत्र पर प्रभावशाली शासन स्थापित करना एक कठिन समस्या है। तुर्की शासक यह अच्छी तरह समझते थे कि राज्य के साधनों को समन्वित करके अपनी शक्ति को सुदृढ़ किए बिना उक्त समस्याओं का निदान संभव नहीं है। इन विषम परिस्थितियों में इस समस्या के निदान के रूप में ही 13वीं शताब्दी में अक्ता-प्रथा को स्थापित किया गया था। ऐबक तथा इल्तुतमिश ने इस प्रथा से पूरा लाभ उठाया था। इन प्रशासकों ने भारतीय समाज से सामंती-प्रथा को समाप्त करने तथा साम्राज्य के दूर-दराज के हिस्सों को केंद्र से जोड़ने के लिए महत्वपूर्ण साधन के रूप में अक्ता-प्रणाली का उपयोग किया। इससे तुर्की शासकवर्ग की अर्थलिप्सा की तुष्टि भी हुई और नए विजित प्रदेशों में कानून तथा व्यवस्था की स्थापना के साथ ही राजस्वक्सूली की आवश्यक समस्या का समाधान भी हुआ।

यह सर्वविदित है कि सल्तनत के प्रारंभिक काल में मुद्रा प्रणाली में स्थिरता नहीं आ पाई थी। अधिकारियों को वेतन अदा करने का एकमात्र साधन भू-राजस्व का अनुदान था। इस कारण राजस्व-अनुदान व्यवस्था अर्थात अक्ता को एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्था के रूप में स्थापित किया गया। भारत में अक्ता लागू करने का एक और महत्वपूर्ण कारण यह भी था कि इससे सुल्तान उपज के अधिशेष का एक बड़ा भाग एकत्र कर सकता था। राज्य की आय का यह अंश खराज के रूप में लिया जाता था और इस समय तक यह एक नियमित कर हो चुका था। इस भू-राजस्व व्यवस्था के अंतर्गत किसान अपने निर्वाह से संबंधित न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के अलावा अपने कृषि-अधिशेष के अधिकांश अंश को राज्य को खराज के रूप में दे देता था। अक्ता के पदाधिकारी जिन्हें मुक्ता या वली कहा जाता था, खराज तथा अन्य कर वसूल करके अपना तथा अपने सैनिकों का भरण-पोषण करते थे और बची हुई राशि सुल्तान के कोष के लिए भेज देते थे। इस प्रकार उपलब्ध विपुल राजस्व के कारण ही मुस्लिम राज्य बड़ी सेना रखने में समर्थ हुए। इस प्रकार अक्ता में इन दोनों कार्यों का अंतर्भाव था : कृषक वर्ग से अधिशेष की वसूली और इस अधिशेष का शासक वर्ग में वितरण। 

अक्ता का प्रचलन -

मुहम्मद गोरी की विजयों के बाद शीघ्र ही उत्तर भारत में अक्ता-प्रथा स्थापित हो गई। मुहम्मद गोरी ने कुतुबुद्दीन ऐबक को 1191 ई० में हाँसी में नियुक्त किया तथा मलिक नासिरुद्दीन अस्ताम को कच्छ का प्रदेश प्रदान कर दिया। ऐबक का काल अत्यंत संक्षिप्त था जिसके कारण उसके अंतर्गत इस व्यवस्था के बारे में जानकारी प्राप्त नहीं होती। 1210 ई0 में इल्तुतमिश के राज्यारोहण के साथ ही दिल्ली सल्तनत के शासन-तंत्र की आधारशिला के रूप में अक्ता-प्रथा स्थापित हुई। उसके शासनकाल के छब्बीस वर्षों में (1211-1236 ई०) मुल्तान से लखनौती के बीच सम्पूर्ण सल्तनत बड़े तथा छोटे भू-भागों में विभाजित हो गई जिन्हें अक्ता कहा जाता था और जो मुक्ता नामक विशिष्ट अधिकारी के प्रशासन के अंतर्गत थे। इस प्रकार अक्ता की दो श्रेणियाँ थीं- पहली खालसा के बारह प्रांतीय स्तर की अक्ता तथा दूसरी कुछ गाँवों के रूप में छोटी अक्ता। प्रांतीय स्तर की अक्ताएँ उच्च वर्ग के अमीरों को दी जाती थीं। राजस्व संबंधी तथा प्रशासकीय दोनों प्रकार के उत्तरदायित्व उनके पद से जुड़े होते थे। इन बड़ी-बड़ी अक्ताओं के धारकों को मुक्ता कहा जाता था। मिनहाज-उस-सिराज तथा जियाउद्दीन बरनी ने समस्त उत्तरदायित्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियों के संबंध में इसी मुक्ता शब्द का आम तौर पर प्रयोग किया है। कुछ गाँवों को जोड़कर बनी छोटी अक्ताओं को सुल्तान अपने द्वारा नियुक्त सैनिकों को वेतन के बदले दे देता था। इन अक्तादारों को किसी प्रकार के प्रशासकीय अथवा आर्थिक उत्तरदायित्व नहीं दिए जाते थे। बरनी के अनुसार इल्तुतमिश के समय इस प्रकार के दो हजार अक्तादार थे जिनका कोई भी प्रशासकीय उत्तरदायित्व नहीं होता था। इस प्रकार स्पष्ट है कि 13वी शताब्दी में सुल्तानों ने छोटे-बड़े क्षेत्रों को विभिन्न अमीरों को प्रदान किया जिन्हें प्रशासकीय, राजस्व संबंधी तथा सैनिक कार्य करने पड़ते थे। मुक्ता भी अपनी बड़ी अक्ता में से छोटी-छोटी अक्ताएँ जिसे चाहें उसे दे सकते थे। उइाहरण के तौर पर बदायूँ के मुक्ता ताजुद्दीन संजर कुतुलुग ने मिनहाज सिराज के जीवन निर्वाह के लिए 1242-43 में अक्ता प्रदान की थी जब उसे दिल्ली छोड़ना पड़ा था। यदि मुक्ता अंत तक सक्रिय रूप से सेवारत रहता है तो राजस्व पर उसका अधिकार बना रहना स्वाभाविक था। उसकी मृत्यु होने पर उसका राजस्व-संबंधी अधिकार पुनः राज्य में विलीन हो जाता था। उसके उत्तराधिकारियों की पेंशन की व्यवस्था दूसरे मद से की जाती थी। अक्ता को संपूर्ण जीवन-काल के लिए नहीं प्रदान किया जाता था, न अक्तादार इसे अपने उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित कर सकता था क्योंकि राज्य भूमि पर अपने अधिकार का समर्पण करके अपनी वित्तीय प्रभुसत्ता को नहीं खोना चाहता था। 

खिलजी तथा तुगलक शासकों के अंतर्गत इस प्रकार की नियुक्तियों का प्रचलन समाप्त होने लगा। प्रांतीय प्रशासन में एक जटिल प्रणाली का समावेश करते हुए अक्ता-प्रथा में पर्याप्त परिवर्तन किया गया। इस परिवर्तन के मूल में शिक़ नामक एक नई प्रणाली का अस्तित्व में आना स्वाभाविक था। इस प्रकार इन शासकों के अंतर्गत अक्ता में कई तरह के परिवर्तन आए। 13वीं शताब्दी के अंतिम दशक के पहले मुक्ता लोगों ने असैनिक, सैनिक तथा आर्थिक मामलों में प्रशासकीय अधिकार का पूरा उपभोग किया। इसके बाद अक्ता-प्रशासन पूर्ण रूप से उनके अधिकार में नहीं रह गया। राजस्व के मामले में वे अधिकाधिक केंद्रीय शासन के नियंत्रण में होते गए। उन्हें संग्रहीत की गई पूरी रकम तथा उसके व्यय का हिसाब पेश करना पड़ता था। इस तरह के प्रमुख परिवर्तन अलाउद्दीन खलजी के शासनकाल (1296-1316) में देखने में आए। सुल्तान के तहत, साम्राज्य की सीमाओं का असीमित विस्तार और पुराने क्षेत्रों में बसे किसान वर्ग पर पूरा लगान लगाना- ये दोनों काम एक ही साथ किए गए। शासक वर्ग के राजस्व में इस अभूतपूर्व वृद्धि के साथ ही अनेक ऐसे कदम उठाए गए जिन्होंने अक्ता-व्यवस्था को प्रभावित किया। जैसे-जैसे अधिक दूरवर्ती इलाके साम्राज्य के अधिकार में आते गए और उन्हें अक्ता के रूप में बाँट दिया गया, वैसे-वैसे दिल्ली राजधानी के निकटवर्ती इलाके खालसा जमीन का अंग बनते गए। अब पूरा मध्य दोआब और आधुनिक रूहेलखंड के कुछ हिस्से इसके अंतर्गत आ गए। खालसा का पूरा राजस्व खजाने में लाकर जमा किया जाता था और सैनिकों को वेतन का नकद भुगतान किया जाता था। यह प्रणाली मुहम्मद तुगलक के शासनकाल के अंत तक जारी रही।

मोरलैण्ड मानते है कि अलाउद्दीन खलजी ने अपने सेनापतियों अर्थात मुक्ता और वली को अक्ता प्रदान करने की प्रथा को कायम रखा पर अब जो नया तत्व आ गया वह यह था कि प्रशासन में सुल्तान की नौकरशाही के हस्तक्षेप की मात्रा बढ़ गई। जहाँ सुल्तान की सरकार मुक्ताओं द्वारा आय को छिपाने या गबन करने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए आमादा थी, वहाँ मुक्ता इसी तरह अपने मातहतों को शक-शुबहा की दृष्टि से देखते थे।

प्रारंभिक तुगलक शासकों के समय में अक्ता प्राप्त अधिकारियों की स्थिति में एक बड़ा परिवर्तन आया। अक्ता के राजस्व में से मुक्ता की व्यक्तिगत आय तथा उसके अधीन रखे गए सैनिकों के वेतन के भागों में गयासुद्दीन तुगलक ने स्पष्ट विभाजन किया। इसके अतिरिक्त मुहम्मद बिन तुगलक के काल में दूसरा महत्वपूर्ण कदम उठाते हुये राजस्व तथा आर्थिक अधिकारों को सैनिक कार्यभार से अलग कर दिया गया। अब राजस्व संबंधी उत्तरदायित्व मुक्ता तथा क्ली से लेकर नए अधिकारी क्ली-उल-ख़राज को सौंपा गया। इब्नेबतूता साफ तौर पर यह कहता है कि अक्ता में दो अधिकारियों की नियुक्ति होती थी। प्रथम वली-उल-खराज जो लगान वसूल करता था तथा दूसरा अधिकारी अमीर जो सेना की देखरेख करता था। अक्ता की आय का प्रतिवर्ष निर्धारण किया जाता था और तदुपरांत उसके राजस्व की वसूली का काम ठेकेदारी पर था। ठेकेदारी पर राजस्व की वसूली को ’मुक्ता’ व्यवस्था कहा जाता था। अन्त में अक्ता पर केंद्रीय नियंत्रण छोड़ देने का प्रचलन फिरोज शाह तुगलक के समय में प्रारंभ हुआ। अमीरों को रियायत देने के लिए उसे बाध्य होना पड़ा। उसने अक्ता पर उत्तराधिकार को मान्यता देने के साथ ही नियुक्तियों का हस्तांतरण भी रोक दिया। उसने भूमि-अनुदान के रूप में सैनिकों को वेतन देने की प्रथा को पुनर्जीवित किया। लोदियों के काल में भूमि का पुनर्हस्तांतरण बहु प्रचलित प्रथा हो गई। 

अक्तादार अथवा मुक्ता के कार्य -

ऐसा प्रतीत होता है कि सैनिकों का एक दस्ता रखना तथा उसे प्रशिक्षित करना बाद में मुक्ताओं के उत्तरदायित्वों में जोड़ दिया गया। ए० बी० एम० हबीबुल्ला के मतानुसार ’अल कामिल फ़ित तवारीख’ के लेखक असीर ने मुक्ताओं के सैनिकों को हथियार से लैस करने का उल्लेख किया है। तेरहवीं तथा चौदहवीं शताब्दी के आंरभ में सुल्तान द्वारा प्रदत्त अक्ता अनुदान संबंधी प्रमाणों के विस्तृत अध्ययन के आधार पर मुक्ता के निम्नलिखित मुख्य कार्य बताये जा सकते है :

1. हिंन्दू सामंतों तथा विदेशी आक्रमणों के विरुद्ध युद्ध करना।

2. महत्वपूर्ण शहरों तथा चौकियों में अपना प्रतिनिधि नियुक्त करना।

3. अपने प्रियजनों तथा विद्वान व्यक्तियों को भूमि प्रदान करना तथा भूमि का निःशुल्क अनुदान करना।

4. उनको प्रदान किए गए भू-राजस्व में से यथेष्ट संख्या में सैनिक रखना ।

उनसे यह भी अपेक्षा की जाती थी कि जिस समय तथा जिस स्थान पर जरूरत पडेगी सुल्तान को सैनिक सहायता देंगे। 1204 ई० में मुहम्मद गोरी ने लाहौर तथा मुल्तान के मुक्ताओं के पास निर्देश भेजा था कि वे भू-राजस्व का बकाया भेजें जिससे वह ट्रांसआक्सियाना में अभियान की तैयारी कर सकें। बरनी के अनुसार बलबन का लड़का शहजादा मुहम्मद (जो सिंध का वली था) प्रतिवर्ष अपने प्रांत का राजस्व स्वयं अपने पिता के पास पहुँचाता था। कड़ा तथा अवध के मुक्ता अलाउद्दीन खलजी ने सुल्तान जलालुद्दीन ख़लजी से आज्ञा माँगी थी कि चंदेरी पर अभियान के सिलसिले में घोड़े खरीदने तथा सैनिकों की भर्ती के लिए प्रांत के फाजिल या फवाजिल (अतिरिक्त आय) के उपयोगों की अनुमति दी जाए। यद्यपि प्रत्येक मुक्ता सैनिक सेवा के लिए प्रतिबद्ध था तथापि साधारणतया दिल्ली के पास-पड़ोस के लोगों को ही उपस्थित रहने की आज्ञा दी जाती थी। बलबन ने समाना तथा सुनाम के मुक्ता बुशरा ख़ाँ को सैनिकों की नई भरती के द्वारा प्रांतीय सैनिकों की संख्या दुगुनी करने तथा सैनिकों के वेतन बढ़ाने का निर्देश दिया था। सुल्तान ने इस बात पर भी बल दिया कि वह अपने सैनिक मामले की विस्तृत जानकारी रखे। सेना के लिए किसी खर्च को बहुत ज्यादा मत समझो और तुम्हारे आरिज (सेनाध्यक्ष) को चाहिए कि पुराने सैनिकों को बनाए रखते हुए नए लोगों की भर्ती करे और अपने विभाग के हरेक खर्च के बारे में जानकारी रखे। 

इस प्रकार मुक्ता लोगों का पहला कर्तव्य सुल्तान की सेवा के लिए हर समय तैयार रहने वाले सैनिकों की एक टुकड़ी रखना और संपूर्ण आंतरिक प्रशासन का निरीक्षण करना था। अपने क्षेत्र में कानून-व्यवस्था बनाए रखना, लोगों के जान-माल की रक्षा करना और असामाजिक तत्वों द्वारा प्रांत की शांति तथा सुरक्षा को खतरे में डालने से रोकना था। वे अक्ता द्वारा राजस्व वसूली की जाँच-पड़ताल तथा निरीक्षण करते थे। आंतरिक व्यापार का प्रोत्साहन देना भी मुक्ता के अनिवार्य कर्तव्यों में से एक था।

अक्ता के राजस्व पर मुक्ता को विस्तृत अधिकार प्राप्त थे। कभी-कभी अतिरिक्त राजस्व की एक वार्षिक राशि उन्हें केंद्र को भेजनी पड़ती थी। इसका निर्धारण परगनों तथा गाँवों के पिछले प्रमाणपत्रों के आधार पर किया जाता था। दीवाने-आला में उनके हिसाब की जाँच की जाती थी। यदि सारी औपचारिकता समुचित रूप से पूरी हो जाती थी तो नियुक्त अधिकारी अपनी अक्ता का प्रशासन स्वेच्छा से चलाने की अनुमति प्राप्त करता था। यदि अक्ता से दीवान द्वारा अनुमानित राशि से अधिक आय होती थी तो नियुक्त अधिकारी को सिकंदर लोदी जैसे सुल्तान से उसके उपयोग की अनुमति लेनी पड़ती थी। अपनी अक्ता के सर्वोच्च अधिकारी होने के कारण वे कुछ भूमि धर्मपरायण लोगों को भी दे सकते थे।

मुक्ता अपनी अक्ता के अंतर्गत खेती की प्रगति में यथेष्ट रुचि लेते थे। काश्तकारों को नई भूमि पर खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें ऋण दिए जाते थे। यदि उसकी नियुक्ति उसकी अक्ता से कहीं बाहर की जाती थी तो उसका प्रतिनिधि वहाँ का शासन चलाता था या प्रांत के हाकिम से पूरी तरह स्वतंत्र होकर वह अक्ता के अंदर सैनिक तथा कार्यकारी अधिकारों का पूर्ण रूप से प्रयोग करता था। उदाहरण के तौर पर इब्राहीम लोदी के काल में ईसा खाँ सरवानी को मसनद-ए-आली की उपाधि दी गई थी। वह दिल्ली के किले में नियुक्त था किंतु थानेश्वर में उसकी अक्ता का प्रशासन उसका लड़का कमाल खाँ चला रहा था।

किंतु प्रांत की न्याय-व्यवस्था पर मुक्ता के नियंत्रण का अथवा उसके किसी प्रकार के न्याय-संबंधी कार्यों का कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिलता। शांति और व्यवस्था कायम रखना उसका सामान्य कार्य था जो संयोगवश साधारणतया प्रमुख नगर तथा किलों तक ही सीमित था, और जिसे उसके द्वारा नियुक्त कोतवाल संपन्न करता था। इसके अतिरिक्त उसका काम था सुल्तान के भू-राजस्व भाग को काश्तकारों तथा हिंदू सामंतों से वसूल करना।

स्पष्ट है कि अक्ता प्रणाली सामन्ती संस्था नही थी क्योंकि राज्य ने कभी भी मुक्ता या वली को प्रदत्त भूमि के साथ अपना मूल अधिकार हस्तानांतरित नही किया था।

मुक्ताओं की शक्ति -

विद्वानों, सैयदों तथा धार्मिक व्यक्तियों को निर्वाह के लिए अनुदान में दी गई भूमि को छोड़कर अक्ता पर अमीरों की नियुक्ति होती थी। अक्ता के अधिकारियों को अपने क्षेत्र के प्रशासन में न्यूनाधिक रूप से पूरी स्वतंत्रता देने पर भी दिल्ली के दीवाने-विजारत से आवश्यक कागजों की जाँच के लिए आडिटर को दौरे पर भेजा जाता था किंतु अक्ता के अधिकारियों पर नियंत्रण रखना बड़ा कठिन था। यह बात दूर-दराज के इलाकों में नियुक्त व्यक्तियों पर विशेष रूप से लागू होती थी। अमीर खुसरो ने एक मुतशर्रफ (आडिटर) के अनुभव का उल्लेख किया है जिसे अक्ता में अत्यधिक कठिनाई का सामना करना पड़ा। बड़ी संख्या में अक्ता वितरण से अपनी समस्या का समाधान करने का इल्तुतमिश ने प्रयत्न किया और इस कारण अप्रत्यक्ष रूप से राज्य के लिए अधिक समस्या खड़ी करने की जिम्मेदारी भी उसी की है। अपने जीवनकाल तक प्रशासन पर सावधानीपूर्ण तथा सतर्क नियंत्रण से उसने इस प्रथा में निहित हानिकारक तत्वों को निर्मूल किया। किंतु इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद उत्पन्न अस्थिरता के समय में संपूर्ण अक्ता-प्रणाली अव्यवस्थित हो गई। अतादारों में केंद्रीय सत्ता के प्रति अवज्ञा की भावना आ गई। अक्ता-व्यवस्था को शासन के केंद्रीकरण की प्रक्रिया को मजबूत बनाने के लिए प्रयुक्त गया था किंतु यही प्रथा एक समय राजनीतिक सत्ता के विघटन तथा विकेंद्रीकरण का कारण बन गई।

एक शक्तिशाली सुल्तान के अंतर्गत किसी अमीर की अक्ता का आकार तथा उसका व्यक्तिगत पद और उसकी प्रतिष्ठा नितांत व्यक्तिगत चीजें थीं। उत्तराधिकार संबंधी नियम के अंतर्गत आने वाली निजी संपत्ति और राजकीय पदों तथा भू-अनुदान में स्पष्ट अंतर करने पर राज्य ने बल दिया क्योंकि ये राजकीय पद किसी प्रकार के निहित अथवा आनुवंशिक अधिकार से मुक्त थे। यह स्थिति प्रारंभिक तुग़लुक शासकों के समय तक न्यूनाधिक मात्रा में यथावत बनी रही। किंतु मुहम्मद तुग़लक की मृत्यु के बाद केंद्रीय सत्ता के शक्तिहीन होते ही इसमें परिवर्तन आ गया। फिरोजशाह तुरालुक के काल में शासक वर्ग अत्यधिक शक्तिशाली हो गया था और देश के अतिरिक्त आय के बड़े भाग का स्वयं उपभोग करने लगा। ये मुक्ता लोग अधिकतर शहरों में रहते थे और अपनी आय फिजूलखर्ची में ही खत्म करते थे। जब अफ़ग़ान अमीर अपनी अक्ता को वंशानुगत मानने लगे तो सुल्तान सिकंदर लोदी ने एक प्रसिद्ध अफ़ग़ान अमीर के उत्तराधिकारी जैनुद्दीन नामक मसनद-ए-आली को अपने दृष्टिकोण से खुले रूप में अवगत कराया। 

अक्ता का स्वरूप -

पूर्वी ’सामंतवाद के बारे में प्रायः टिप्पणियाँ प्रस्तुत की जाती है कि मध्यकाल में उसका आधार अक्ता संस्था ही होती है। रेवर्टी जैसे विद्वानों ने अक्ता के लिए ’फ़ीफ’ शब्द का प्रयोग किया है जो सीधे सामंती-प्रथा की और संकेत करता है। इसमें राजा का प्रधान काश्तकार (Tenants in chief) वास्तव में अपनी जमींदारी का सर्व-शक्तिमान शासक होता था। किंतु यह तथ्य पूर्णतः भ्रामक है क्योंकि मुक्ताओं पर बहुत अधिक नियंत्रण लागू था। ’फीफ’ शब्दावली से इतने अधिक नियंत्रण का बोध नहीं होता। इस संबंध में उदाहरणों को गलत ढंग से प्रस्तुत करके यह दिखाया गया है कि लगातार कमजोर शासकों के काल में या किसी निर्बल वंश के अंतर्गत अक्ता पर अक्ता-धारकों के चले आ रहे अधिकार को कुछ अंश तक मान्यता प्राप्त हो गई थी और अक्ता को व्यक्तिगत संपत्ति के समान माना जाने लगा था। इसे किसी भी स्तर पर स्वीकार नही किया जा सकता है। इस संस्था को ’सामंती’ रूप में देखने के लिए एक अन्य पक्ष भी प्रस्तुत किया गया है। यह पक्ष है प्रत्यक्ष पद-सोपानिक अधिकार (Hierarchical Rights) की। यूरोपीय सामंती समाज से तुलना करना जिसमें सर्वोच्च पद पर सुल्तान, उसके नीचे बड़े मुक्ता, प्रांतीय गवर्नर, इसके छोटे सैनिक अक्तादार और अंत में खूत, मुक़द्दम चौधरी आदि स्थानीय स्तर के बिचौलिए लोग थे। किंतु अक्ता सामंती संस्था नहीं थी, यह इसी से स्पष्ट है कि राज्य और मुक्ता या कभी-कभी तो सबसे छोटे पदाधिकारी के बीच सीधा संबंध था। इसके अतिरिक्त, किसी भी राज्य ने कभी भी मुक्ता या वली को प्रदत्त भूमि के साथ अपना मूल अधिकार हस्तांतरित नहीं किया। अक्ता प्रणाली में सामन्ती विशेषताएॅ जैसी कोई बात ही नही थी।

मोरलैंड ने अक्ता में सामंती विशेषताएँ न होने के बहुत से कारण प्रस्तुत किए हैं। मोरलैण्ड ने अमीर वर्ग की उत्पत्ति के संबंध में खोज की है और वे कहते है कि इन्हीं अमीरों में से मुक्ताओं को चुना जाता था। तेरहवीं शताब्दी के मध्य में मिनहाज द्वारा प्रधान अमीरों की जीवनी के संबंध में लिखित वर्णन से ज्ञात होता है कि मुक्ता पद प्राप्त करने वाले प्रत्येक व्यक्ति की जीवन-वृत्ति शाही गुलाम के स्प मे शुरु होती थी। इल्तुतमिश  बड़ी संख्या में विदेशी गुलामों को ले आया तथा उन्हें अपने राजमहल के घरेलू काम में नियुक्त किया। वे अपने विवेक एवं क्षमता के अनुरूप राज्य के उथे-से-ऊंचे पदों पर तरक्की करते गए। इनमें तुरान खाँ, सैफुद्दीन, तुगरिल खाँ, तथा उलुग खाँ (बाद में सुल्तान बल्बन) महत्वपूर्ण थे। मोरलैंड इन्हें “सामान्य एशियाई किस्म का अधिकारी वर्ग मानता है। उनके अनुसार मुक्ता की अपनी कोई क्षेत्रीय हैसियत नहीं थी, न ही किसी विशिष्ट भू-भाग पर उसका दावा ही मान्य था। जिस पद पर मुक्ता नियुक्त होता था मूल रूप से वह उसका प्रशासक था। इसके लिए उसे वेतन प्राप्त होता था। मुक्ता का यह कर्तव्य था कि एक सैनिक टुकड़ी अपने पास रखे और आवश्यकतानुसार उसे सुल्तान की सेवा में उपलब्ध कराए। मुक्ता को अपने अधीनस्थ लोगों से निर्धारित राजस्व वसूल करना पड़ता था। सैनिकों के वेतन जैसे स्वीकृत खर्च के बाद बचे धन को राजधानी में सुल्तान के खजाने में जमा करना पडता था। वसूल किया गया धन तथा उसके व्यय के संबंध में मुक्ता के लेन-देन लेखा-जोखा दीवाने-विजारत का अधिकारी करता था। उसके जिम्मे की बकाया राशि की वसूली किसी-किसी सुल्तान के समय में पर्याप्त कठोर ढंग से की जाती थी।

मोरलैण्ड के इन तर्को से यह निश्चित रूप से प्रमाणित होता है कि मुक्ता एक हस्तांतरणीय पद था जिसमें सामंती परंपरा या स्थायी अधिकार की कोई संभावना निहित नहीं थी। मुक्ता को सौंपे गए कार्यभार एक शासक के सामान्य कर्तव्य थे जिनमें धर्म तथा धार्मिक वर्ग का संरक्षण, जन-समुदाय में शांति-व्यवस्था स्थापित करना, प्रांतीय न्यायालय में अधिकारी के रुप में कार्य करना अथवा उसका निरीक्षण करना, कर वसूलना तथा वेतन-भत्ता का विवरण देना सम्मिलित था। कुछ ऐसे भी उदाहरण मिलते हैं जिनमें ’मलिक’ को हिदायत दी गई है कि वह परामर्श के सिद्धांत का पालन करे। इस प्रथा का सबसे बड़ा दोष यह था कि केन्द्रीय प्रशासन द्वारा अपेक्षाकृत अपनी प्रबलता और शक्ति के प्रयोग के अलावा प्रशासकीय अक्ता पर नियंत्रण बनाए रखने या मुक्ता के अन्याय अथवा विद्रोह को रोकने के लिए कोई उपयुक्त व्यवस्था नहीं की गई। सिद्धांत रूप में तो उत्पीड़ित व्यक्ति सीधे सुल्तान से न्याय-याचना कर सकता था किंतु व्यवहार में सुल्तान के उस इलाके से गुजरने तथा उस व्यक्ति का दरबार या राजधानी के किसी प्रभावशाली व्यक्ति से परिचय होने पर ही सुल्तान से सीधा संपर्क होना संभव था। इसके अतिरिक्त इस प्रथा में एक अन्य दोष यह भी था कि यद्यपि इसके अंतर्गत अधिकार का केंद्रीकरण या केंद्रीय सरकार की सत्ता में रिआयत की कोई व्यवस्था विकसित नहीं हुई थी और प्रबल शासक के अंतर्गत यह प्रथा राज्य की शक्ति बढ़ाने तथा उसके एकीकरण में सहायक रही, निर्बल शासक के काल में यही व्यवस्था राजनीतिक विघटन तथा आर्थिक दुर्व्यवस्था के लिए उत्तरदायी भी सिद्ध हुई।

 

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