Summary-
The revenue system of the Early Turkish rulers and
the Mamluk (Slave) Dynasty of the Delhi Sultanate was largely based on Islamic
fiscal principles and adapted to Indian administrative traditions. Their
primary objective was to ensure a stable source of income for maintaining the
army and the administrative machinery.
Key Features of the Revenue Policy
- The Iqta System
- The most important
feature of the revenue administration was the Iqta system.
- The Sultan assigned
territorial units called Iqtas to military officers and nobles known as Muqtis
or Iqtadars.
- Muqtis collected
revenue from their assigned territories and used a portion of it to
maintain troops and local administration.
- The surplus revenue
was remitted to the central treasury.
- Major Sources of Revenue
- Kharaj (Land Revenue): The principal source of state income,
levied mainly on agricultural land. Non-Muslim cultivators generally paid
this tax.
- Ushr: A land tax imposed on Muslim cultivators,
usually at a lower rate than Kharaj in accordance with Islamic law.
- Jizya: A poll tax imposed on non-Muslim adult males
in return for state protection and exemption from military service.
- Zakat: A religious tax collected from Muslims on
specified forms of wealth and property.
- Khums: One-fifth of war booty reserved for the state
treasury under Islamic practice.
- Customs and Trade Duties: Taxes were levied on
commercial activities and the movement of goods.
- Revenue Administration
- The Sultan exercised
ultimate control over revenue collection.
- Revenue officials were
appointed to supervise the assessment and collection of taxes.
- Periodic transfers of
Muqtis were carried out to prevent the emergence of independent regional
power centres.
- There was no uniform
system of land measurement or scientific assessment during the early
phase of the Sultanate.
- Agrarian Policy
- Agricultural
production formed the backbone of the revenue system.
- Village-level
officials and local intermediaries often assisted in the collection of
taxes.
- The administration largely retained pre-existing local practices where necessary to ensure continuity and efficient revenue collection.
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परिचय (Introduction)
भू-राजस्व दिल्ली सल्तनत की आय का सर्वाधिक महत्वपूर्ण व नियमित साधन था। दिल्ली सल्तनत की स्थापना के बाद भी उनकी सुरक्षा और सुदृढीकरण की समस्या बनी रही परिणामस्वरूप प्रारंभिक तुर्क सुल्तानों ने सुरक्षा एवं स्थायित्व पर अधिक बल दिया। राजस्व निर्धारण और एकत्रीकरण को उन्होने पिछले ढ़ंग पर ही रहने दिया। सुरक्षा के लिए सैन्य व्यवस्था आवश्यक थी और दिल्ली सल्तनत के अस्तित्व को बचाये रखने के लिए विजये जरूरी थी। अतः कम से कम ममलूक अथवा दास वंश के सुल्तानों ने तो अपना पूरा ध्यान इन्ही दो महत्वपूर्ण तत्वों पर ही केन्द्रित रखा। आय के प्रमुख साधन भू-राजस्व में उन्होने कोई हस्तक्षेप करना उचित नही समझा और इससे सम्बन्धित व्यवस्था पूर्ववत हिन्दू राजाओं के समय की ही बनी रही। प्रारंभिक तुर्क सुल्तानों ने बहुत सी परम्पराएॅ हिन्दू राजाओं से अपनाई थी जैसे- वेतन के बदले में भूमि देने की परम्परा तथा अनुदान में भूमि देना आदि। इन परम्पराओं को बाद के सुल्तानों ने भी अपना लिया।
राजस्व के निर्धारण के लिए सल्तनत काल में भूमि को चार भागों में विभक्त किया गया -
1. खालसा भूमि- वह भूमि जिसका प्रबंधन प्रत्यक्ष रूप से केन्द्रीय सरकार के नियंत्रण में होता था, उसे खालसा भूमि कहते थे। खालसा भूमि से होने वाली आय पर राज्य का पूरा अधिकार रहता था। इस भूमि पर लगने वाले कर की वसूली स्थानीय चौधरी, मुकद्दम, खूत आदि अधिकारियों के माध्यम से होती थी। खालसा भूमि से प्राप्त आय सीधे राजकोष में जमा की जाती थी। यही कारण है कि सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने राजकोष की आय बढाने के लिए खालसा भूमि में सबसे पहले वृद्धि करने का आदेश दिया। इसका राजस्व भी सुल्तान द्वारा तय किया जाता था। सल्तनत काल में खालसा भूमि का क्षेत्रफल या दायरा बताना तो मुश्किल है पर इतना अवश्य है कि खालसा भूमि से प्राप्त आय वेतन देने, सैनिक प्रशासन और शाही कल-कारखानों को चलाने में ही व्यय की जाती थी। खालसा भूमि से भू-राजस्व वसूल करने के लिए पृथक ‘आमिल‘ नियुक्त किये जाते थे जो केन्द्रीय प्रशासन के संरक्षण और निर्देशन में कार्य करते थे।
2. इक्ता में दी गई भूमि- यह भूमि सुल्तान समय-समय पर अपने सैनिकों और अमीरों को दिया करते थे। इक्ता का शाब्दिक अर्थ ‘भाग‘ या ‘खण्ड‘ है जिसे राज्य की ओर से कोई व्यक्ति प्राप्त करता था। निजामुल मुल्क तूसी ने अपने ग्रन्थ सियासतनामा में इक्ता के सम्बन्ध में वर्णन करते हुये कहा है कि - इक्तादार को अपनी भूमि से भू-राजस्व वसूल करना पडता था, वहॉं शान्ति और सुरक्षा का प्रबन्ध करना पडता था और जनता के जान-माल की रक्षा करनी पडती थी। आवश्यकता पडने पर वह केन्द्र को सैनिक सहायता भी देता था। इक्ता प्राप्त करने वाला अधिकारी सदैव इस प्रयत्न में रहता था कि वह अधिक से अधिक लगान वसूल कर सके और इसमें से सरकार का निश्चित भाग देकर शेष आय को अपने पास रख सके।
वजीर के परामर्श से सुल्तान प्रत्येक इक्ते के लिए ’ख्वाजा’ नामक एक पदाधिकारी को नियुक्त करता था जिसका कार्य राजस्व की वसूली की देखरेख करना और इक्तादरों पर आंशिक नियंत्रण रखना था। इक्तादार अपने क्षेत्र की भूमि की उपज का एक निश्चित हिस्सा सुल्तान को कर के रूप में दिया करते थे।
3. सुल्तान की अधीनता स्वीकार करने वाले हिन्दू सामन्तों की भूमि- सुल्तान की अधीनता स्वीकार कर लेने वाले हिन्दू शासक अपने-अपने राज्यों में पूर्ण स्वायत्तता का उपभोग करते थे। उन्हें केवल सुल्तान को समय से कर देना होता था।
4. ईनाम, मिल्क अथवा वक्फ के रूप में दी गई भूमि- सुल्तान मुसलमान विद्वान अथवा संतों को ईनाम, मिल्क अथवा वक्फ के रूप में भूमि दिया करते थे। सल्तनत काल में यह परम्परा बन गई कि सुल्तान प्रसन्न होकर भूमि का टुकडा इनाम में दे दिया करते थे। इस इनाम की भूमि को ‘मदद-ए-माश‘ कहते थे। ईनाम में दी गई भूमि एक प्रकार से पेंशन में दी गई भूमि होती थी। मिल्क वह भूमि होती थी जिसे सुल्तान उनके कार्य के बदले देता था, जबकि वक्फ धर्म सेवा के आधार पर प्राप्त भूमि होती थी। इस प्रकार की समस्त भूमियाँ राजस्व से मुक्त होती थी। इसके अधिकारी ही इससे प्राप्त आय का उपभोग करते थे।
उपर्युक्त चारो प्रकार की भूमि की व्यवस्था सल्तनत काल के विभिन्न सुल्तानों ने समय-समय पर अपनी सुविधा के अनुसार अपनाई थी। यह भी उल्लेखनीय है कि इस्लाम द्वारा प्रतिपादित नियमों का पालन सभी सुल्तानों ने अक्षरतः नही किया। मध्य एशिया से आये हुये प्रारंभिक तुर्क सुल्तानों ने भारतीय परम्पराएॅ और रीति-रिवाज भी अपनाये और मध्य एशियाई तौर तरीके भी। बलबन के समय तक आते-आते जब दिल्ली सल्तनत के प्रशासन में सुदृढता और स्िाईत्व आने लगा तब धीरे-धीरे खालसा भूमि में वृद्धि करने का प्रयास प्रारंभ हुआ और शरीयत में वर्णित अन्य कर भी लगाये जाने लगे। खिलजी और तुगलक वंश के काल में प्रशासन और राजस्व का एक स्पष्ट रूप मुखरित होने लगा था परन्तु उसके बाद ही सैयद और लोदी वंश के सुल्तानों के समय में अपनाई गई नीतियों ने इसे पतन की ओर अग्रसरित कर दिया।
लेकिन इन सब के बावजूद भी निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि दिल्ली सल्तनत के काल में भू-राजस्व व्यवस्था का एक स्पष्ट स्वरूप और आधार बन चुका था।
ममलूक वंश और भू-राजस्व व्यवस्था का प्रारंभिक स्वरूप -
दिल्ली सल्तनत के अन्तर्गत दास वंश कहा जाने वाला मामूलक वंश के सुल्तानों का योगदान इस सन्दर्भ में महत्त्वहीन रहा है। वास्तव में वे केवल विजेता थे और उनका अधिकांश समय विशेषकर कुतुबुद्दीन ऐबक का अपनी विजयों को स्थायी बनाने में ही व्यतीत हुआ। अतः समय की सबसे बड़ी आवश्यकता पर ही उनका ध्यान केन्द्रित रहा। यदि वे सुरक्षा एवं स्थायित्व पर अपना पूरा ध्यान न आकर्षित करते तो भारतीय हिन्दू शासक पुनः सत्ता प्राप्ति के लिए गतिशील हो जाते जैसा कि डा० अशोक श्रीवास्तव लिखते हैं कि वास्तव में यह हिन्दू शासकों के लिए एक सुनहरा मौका था। यदि इस समय वे एकजुट होकर तुर्की शासन को उखाड़ फेंकने का प्रयत्न करते तो सत्ता प्राप्ति की उनकी अभिलाषा पूरी हो सकती थी। परन्तु फिर भी सुरक्षा एवं विजय के साथ मुइजुद्दीन मोहम्मद गोरी की मृत्यु के साथ जब सल्तनत की बागडोर कुतुबुद्दीन ऐबक के हाथों में आई तो उसने शरीयत के अनुसार कर लगाने का प्रयत्न किया। उसके समय का भू-राजस्व सम्बन्धी विवरण हमें केवल मुबारक शाह द्वारा लिखित तारीख-ए-फखरुद्दीन मुबारक शाह से प्राप्त होता है। इसमें मुबारक शाह ने लिखा है कि कुतुबुद्दीन ऐबक ने सभी प्रकार के करों को समाप्त कर दिया, केवल शरीतय में वर्णित कर ही वसूल करने की अनुमति दी। अतः खालसा भूमि से खराज लिया जाता था, जो कि उत्पादन का 1/5 भाग होता था। उसी भूमि पर कहीं 1/10 तथा कहीं 1/10 का आधा भाग निश्चित किया गया था। भूमि करों में समानता नहीं थी, परन्तु आय का मुख्य स्रोत भू-राजस्व ही था। लगान एकत्रीकरण में भारतीय साधनों को ही अपनाया गया था। सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक अपने अल्पकालीन शासन काल में कर ब्यवस्था में कोई नवीनता लाने में समर्थ नहीं हो सका।
भू-राजस्व के अतिरिक्त अन्य ’शरई’ कर लगाए गये थे या नहीं, इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता लेकिन चूंकि सुल्तान ने शरीयत के अनुसार कर लगाने का आदेश दिया था, अतः यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अन्य कर भी लगाये गए होंगे, क्योंकि जकात एक धार्मिक कर था, जिसे देना मुसलमान अपना कर्त्तव्य समझता था। खुम्स विजयोपरान्त होने वाली आय थी जो सुल्तान के समय में भी लूट के माल के रूप में अवश्य प्राप्त हुई होगी। जहां एक अन्य कर जजिया का प्रश्न है, हम कह सकते है कि पराजित राजाओं तथा जमींदारों का एक समुदाय ऐसा भी था जिनकी स्वतंत्रता सुल्तान ने विजय के बाद उन्हीं के पास रहने दी थी। उनकी स्वतंत्रता के बदले में उनसे वार्षिक कर लिया जाता था। यह कर जजिया का ही एक रूप था। यद्यपि करों में समानता नहीं थी, फिर भी कुतुबुद्दीन ऐबक ने जो दरें निश्चित की थीं, वे खिलजी सुल्तान अलाउद्दीन से निश्चित ही कम थीं।
सुल्तान शमसुद्दीन इल्तुतमिश का समय सल्तनत के स्थायित्व एवं विस्तार का समय था। दिल्ली सल्तनत को एक स्वतंत्र एवं स्थायी स्वरूप देने का श्रेय सुल्तान इल्तुतमिश को दिया गया है। प्रो० खलीक अहमद निजामी लिखते हैं कि इल्तुतमिश मध्यकालीन भारत का एक श्रेष्ठ शासक था। यही नहीं डा० रामप्रसाद त्रिपाठी दिल्ली सल्तनत का वास्तविक श्रीगणेश उससे ही करते हैं। स्वतंत्र राजधानी, राजतंत्रीय शासन और शासक वर्ग उसने ही प्रदान किया। उसने भारत में गोरियों द्वारा अधिकृत दुर्बल प्रदेश को एक सुसंगठित राज्य अर्थात दिल्ली सल्तनत में परिवर्तित कर दिया। इस सुसंगठित राज्य के संस्थापक होने के नाते उसके प्रशासनिक विकास में इल्तुतमिश का योगदान ठोस और महत्त्वपूर्ण था।
इतुतमिश ने इक्ताएं, सेना, मुद्रा प्रणाली संगठित कीं, जो बाद में जाकर दिल्ली सल्तनत के साम्राज्यवादी ढांचे के महत्त्वपूर्ण अंग बन गए। महत्वपूर्ण सफलताओं के होते हुए भी सुल्तान को पिछली परम्परा को ही स्वीकार करना पड़ा। खालसा भूमि से प्राप्त आय के अतिरिक्त इक्ता देने की परम्परा भी चलती रही बल्कि इस सन्दर्भ में सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक से भी आगे बढ़ गया। ऐसा प्रतीत होता है कि इस्तुतमिश के समय में राजस्व व्यवस्था में कोई नवीन परिवर्तन नहीं किया गया था और न ही इस प्रकार का कोई प्रमाण उपलब्ध है। उसके समय में मुख्य चार विभाग थे दीवाने-विजारत, दीवान- ए-आरिज, दिवान-ए-रसालत एवं दीवान-ए-इंशा । इन्हीं के द्वारा सल्तनत का पूरा प्रशासन किया जाता था।
बलबन के शासन के आरम्भ के साथ-साथ सल्तनत में विस्तार के स्थान पर संगठन की नीति का पालन आरम्भ किया गया। सीमाओं की सुरक्षा के लिए सैनिक व्यवस्था को शक्तिशाली बनाना था, मंगोलों का खतरा बढ़ रहा था। अतः महत्त्वाकांक्षी होते हुए भी सुल्तान को विजय योजनाओं का परित्याग करना पड़ा। सुरक्षा की योजनाओं के लिए धन को आवश्यकता थी। अतः सुल्तान बलबन ने गद्दी पर बैठते ही इस पर ध्यान दिया कि आय के साधनों में वृद्धि की जाये। भू-राजस्व आय का मुख्य साधन था और चूंकि अधिकांश जनसंख्या गांव में निवास करती थी और राज्य की खालसा भूमि का अधिकांश भाग उनके ही पास था। अतः ग्रामीण वित्त व्यवस्था में सुधार एवं वृद्धि आवश्यक थी।
दूसरी तरफ वे इक्ताएं थीं जो कि इल्तुतमिश के समय से ही इक्तादारों को दो गई थीं और अब उनके वास्तविक स्वामी जीवित नहीं थे। अतः वे इक्ताए सैनिकों या इक्तादारों के लड़के, विधवाओं अथवा दासों की आय का साधन बन गई थीं। यह व्यवस्था इस्लामी कानून के भी विरुद्ध थी और राज्य को इससे नुकसान भी पहुंच रहा था। बलबन ने निरीक्षण करवाने के बाद यह आज्ञा दी कि इस प्रकार की सभी इक्ताएं जिनके स्वामी जीवित नहीं हैं अथवा काम करने के योग्य नहीं हैं, उनको खालमा भूमि में परिवर्तित कर लिया जाय, परन्तु जो इक्तादार सैनिक सेवा के योग्य थे, उनकी इक्ताएं उन्हीं के पास रहने दी गई।
यद्यपि बलबन के समय में लगाए जाने वाले अन्य करों की जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन चूंकि पूर्ववर्ती सुल्तानों के समय में भी अन्य शरई कर लगाए गए थे अतः यह अनुमान लगाया जा सकता है कि सुल्तान बलबन के समय में भी ये कर वसूल किये जाते रहे होंगे। खराज बसूली के सम्बन्ध में बरनी एक जगह लिखता है कि - “सुल्तान बलबन के शासन के आरम्भ में सिराजुद्दीन नामक व्यक्ति की भूमि पर राजस्व लगाया गया था। इससे स्पष्ट होता है कि मुस्लिम तथा गैर मुस्लिम सभी से खराज वसूल किया जाता था। खराज की दर कितनी थी, यह भी स्पष्ट नहीं है। बरनी एक उद्धरण का हवाला देते हुये लिखता है जिसमें बलबन अपने पुत्र बुगरा खॉं को समझाते हुये कहता है कि खराज वसूल करने में मध्यम मार्ग का अनुसरण करना, कर न तो इतना ले लेना कि प्रजा दरिद्र हो जाए और न इतना कम लेना कि सम्पत्ति की अधिकता से विरोधी बन जाए। इससे निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यद्यपि कि शरई कर लगाए गए थे परन्तु उनकी दर निश्चित नहीं थी।
इक्ता व्यवस्था -
यहॉ यह उल्लेखनीय हैं कि इक्ता देने की परम्परा भारतवर्ष में इस्लामी शासन के आरम्भ के साथ आरम्भ हो गई थी। 11वीं शताब्दी में निजामुलमुल्क तुसी ने अपने ग्रंथ सियासतनामा में इक्ता के सम्बन्ध में लिखा है कि इक्तादारों को अपने आबंटन क्षेत्र में भू-राजस्व वसूल करना पड़ता था। वहां शांति एवं सुरक्षा का प्रबन्ध करना पड़ता था और जनता के जान-माल की रक्षा करनी पड़ती थी। अतः इस्लामी शासन के आरम्भ के साथ यह प्रथा भारतवर्ष में भी आरम्भ हो गई। 1191 से 1210 तक भारतीय इतिहास गोरी परम्पराओं से ही प्रभावित रहा। यहीं से इक्ता देने की परम्परा शुरू हुई। प्रारंभिक चरण में इक्ता प्रणाली ही एक ऐसा विकल्प था जिससे सुल्तान अपने कर्मचारियों, सैनिकों, अमीरों को इक्ता देकर उनके वेतनादि के दायित्व से मुक्त हो जाता था। इक्ता में प्रान्तों को देकर सुल्तान दूरस्थ प्रदेशों के प्रत्यक्ष प्रशासन से भी बच जाते थे। इक्तादार केन्द्र को निश्चित धनराशि देकर बाकी स्वयं रख लेते थे। उनका यह प्रयास होता था कि अधिक राजस्व वसूल करें और तत्पश्चात एक निश्चित राशि केन्द्र को भेजकर अतिरिक्त घन स्वयं अपने पास रख लें।
इल्तुतमिश के समय में इक्ताएं देने का विस्तृत विवरण हमें मिलता है। प्रो० खलीक अहमद निजामी लिखते हैं कि दिल्ली सल्तनत के प्रारंभिक सुल्तानों, विशेषकर इल्तुतमिश ने भारतीय सामंतशाही का विनाश करने के लिए तथा साम्राज्य के सुदूर स्थित प्रदेशों को एक केन्द्र से जोड़ने के लिए इस संस्था का सहारा लिया। सुल्तान ने वास्तव में नवीन विजयें की थीं, अतः उसके लिए कोई ऐसा विकल्प आवश्यक था, जिसके द्वारा नए अधिकृत प्रदेशों को प्रशासन के नियन्त्रण में रखा जा सके। स्थानीय समस्याओं तथा राजस्व वसूली से निपटने के लिए इक्ता प्रणाली ही एक ऐसा तरीका था जिसके द्वारा दूर स्थित प्रदेशों पर काबू पाया जा सकता था। इन प्रदेशों की शान्ति तथा सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी इक्तादार पर होती थी। साथ ही वह कर वसूल करके निश्चित धनराशि भी केन्द्र को भेजता था। इलतुतमिश ने तुर्कों को भारी संख्या में इक्ताएं प्रदान की थीं। यद्यपि वह सामंतीय व्यवस्था का अन्त चाहता था परन्तु यदि वास्तव में देखा जाय तो इक्ता प्रणाली में भी सामंती विशेषताए मौजूद थीं। बाद में ये इक्तादार अपनी सम्पत्ति के मालिक बन बैठे थे। यही कारण है कि बलबन ने इनकी समाप्ति का आदेश दिया था।
इल्तुतमिश के समय में दो प्रकार की इवताएं थीं। एक तो वे गांव थे जो सैनिकों को उनके वेतन के बदले में दिए जाते थे। यह इक्ता खालसा भूमि में से दी जाती थी और इसके स्वामी को किसी प्रकार का प्रशासनिक दायित्व नहीं सौंपा जाता था। दूसरी में वे प्रान्त आते थे, जिनके इक्तियों को राजस्व वसूली एवं प्रशासनिक दोनों प्रकार की जिम्मेदारी निभानी पड़ती थी और सैनिक भी रखने पड़ते थे। इसके अन्तर्गत दूर स्थित प्रान्त भी आ जाते थे, जो सल्तनत के लिए समस्या बने रहते थे। मंगोल आक्रमण से सुरक्षा के लिए भी स्थानीय प्रबन्ध जरूरी था। सुल्तान इल्तुतमिश के समक्ष एक और समस्या थी जिसने उसे बड़ी संख्या में इक्ताएं देने पर विवश किया। वास्तव में हिन्दू जागीरदार एवं पराजित राजा सदैव ही सल्तनत का जुआ उतार फेंकने की कोशिश में रहा करते थे। अतः इक्ता के रूप में प्रान्तीय व्यवस्था करके सुल्तान इस समस्या का समाधान कर सका।
बलबन के समय में भी इक्ता देने की परम्परा चलती रही। सुल्तान बनने पर बलबन ने भी इक्ताएं दी थीं। उसने इतिहासकार मिनहाज सिराज को कुछ गांव दिए थे, जिनसे बीस हजार जीतल की आय होती थी। बलबन के शासनकाल में कुल 20 सूबे थे, जिन्हें सम्बोधित करने के लिए साधारणतया इक्ता तथा बिलायत शब्दों का प्रयोग किया गया है। इक्तादारों की नियुक्ति सुल्तान स्वयं करना था। बलबन के समय में इन इक्तादारों में हस्तान्तरण का भी विधान था ताकि एक ही स्थान पर रहकर यह वर्ग अधिक शक्तिशाली न बन जाय।
राजगद्दी पर बैठने के बाद जब सुल्तान बलबन ने राजस्व विभाग का निरीक्षण किया तो उसे पता चला कि अलाउद्दीन मसूद शाह के अयोग्य उत्तराधिकारियों के समय में बहुत से इक्तादार भूमि के स्वतन्त्र मालिक बन गए थे और वे केन्द्र को निश्चित धनराशि भी नहीं देते थे, जिससे राज्य की आय में पर्याप्त कमी आ गई थी। सुल्तान ने दीवान-ए-आरिज को आदेश दिये कि इस सम्बन्ध में पूरी जानकारी उसे दी जाए। जांच करने से पता चला कि अनेक शम्सी इक्तादारों के वंशजों ने दीवान-ए-आरिज में घूस देकर दो अरब तथा आस-पास की इक्ताएं अपने नाम करवा ली हैं। समस्त जानकारी प्राप्त करने के पश्चात सुल्तान ने इक्ताओं को कुछ मुआवजा देकर भूमि वापस ले लेने का आदेश दे दिया। चूंकि सुल्तान अब पिछली व्यवस्थाओं को लागू नहीं करना चाहता था और समय की आवश्यकता भी यही थी कि प्रशासन को चुस्त किया जाय ताकि सल्तनत को बाहरी आक्रमणों से बचाया जा सके। बलबन के समय में मंगोल आक्रमण एक बड़ी समस्या थी। सल्तनत के लिए वे खतरा बने हुए थे। इनसे बचने के लिए सैनिक सुधार आवश्यक थे। अतः सुल्तान ने यह निश्चय किया कि वह इक्तादारों से उनकी भूमि उन्हें कुछ मुआवजा देकर वापस ले लेगा जिससे राज्य की खालसा भूमि में वृद्धि हो सके। ऐसा करने के लिए उसने इक्तादारो की तीन श्रेणियाँ बनाई - प्रथम श्रेणी में वे इक्तादार थे जो पूर्णतः वृद्ध तथा निर्बल थे और काम करने के योग्य न थे, उनको बीस से तीस टंके पेन्शन निर्धारित की गई थी और उनके गाँव खालमा भूमि में मिला लिए जाने का आदेश दिया। दूसरी श्रेणी में युवा एवं वयस्क इक्तादार थे। सुल्तान ने उनका वेतन निर्धारित कर दिया और उनकी इक्ताएं वापिस लेने तथा उन्हें सेना में भर्ती होने का आदेश दिया। तीसरी श्रेणी में वे इक्तायें थी जो विधवायें तथा अनाथों के पास थीं, उनके लिए आदेश दिया कि उनके भोजन तथा वस्त्र का प्रबन्ध करके उनका भू-राजस्व दीवान-ए-आरिज में जमा कर दिया जाय।
उपर्युक्त आदेशों से इक्ताओं का उपभोग करने वाले परेशान हो गये। लोग फखरुद्दीन के पास गए, जो शहर का कोतवाल और सुल्तान का मित्र था। इस प्रकार फखरुद्दीन की प्रार्थना पर सुल्तान ने वृद्ध इक्तादारों के सम्बन्ध में जो आदेश जारी किया था, उसे रद्द कर दिया। अतः बलबन इक्ता व्यवस्था में कोई परिवर्तन न कर सका। इतना अवश्य किया कि उसने इक्ता देने की परम्परा समाप्त कर दी।
महत्त्वपूर्ण इक्ताओं में बलबन ने ख्वाजा नामक अन्य अधिकारी की नियुक्ति करना शुरू किया। ख्वाजा का मुख्य काम इक्ता से प्राप्त आय एवं व्यय पर दृष्टि रखना होता था। इसके पश्चात बलबन ने महत्त्वपूर्ण इक्तायें समाना, मुल्तान, अवध, बंगाल आदि को अपने पुत्रों को देना आरम्भ कर दिया। इतिहासकार बरनी लिखता है कि सुल्तान बलबन का ज्येष्ठ पुत्र शाहजादा मोहम्मद (खान-ए-शहीद) जो सिन्ध तथा मुल्तान की इक्तादार था, प्रत्येक वर्षं मुल्तान से खजाना और साजो-सामान लेकर अपने पिता की सेवा में उपस्थित हुआ करता था। बलबन के पश्चात मामलूक वश अधिक समय तक दिल्ली की गद्दी पर न रह सका। तीन वर्ष बाद ही ममलूक वंश का नामोनिशान समाप्त हो गया और ममलूक वंश के स्थान पर दिल्ली के राजसिंहासन पर खिलजी वंश आसीन हुआ।
