window.location = "http://www.yoururl.com"; Revenue Policy during Sultunate Period. | सल्तनतकालीन राजस्व व्यवस्था

Revenue Policy during Sultunate Period. | सल्तनतकालीन राजस्व व्यवस्था

 


Summary -

The revenue policies of the medieval Indian dynasties, particularly the Delhi Sultanate, evolved significantly over time. A statistical (comparative and tabular) summary is given below:

Key Features of Alauddin Khilji's Revenue Policy

  • Land revenue was fixed at 50% of the agricultural produce.
  • The intermediaries such as Khuts, Muqaddams, and Chaudharis lost many of their fiscal privileges.
  • Revenue was collected directly from cultivators in important regions like the Doab.
  • House tax (Ghari) and grazing tax (Charai) were imposed.
  • Land measurement was introduced to prevent revenue evasion.
  • The policy strengthened the central treasury and financed a large standing army.

Comparative Analysis

  • The Khilji revenue system was the most stringent among the Delhi Sultanate rulers.
  • The Tughlaqs continued land measurement but faced administrative failures due to over-taxation and experimental policies.
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ममलूक वंश के अधीन शासकों की राजस्व नीति की चर्चा पिछले चैप्टर ममलूक वंश और राजस्व व्यवस्था में की जा चुकी है। इस चैप्टर में हम खिलजी वंश और दिल्ली सल्तनत के अन्तर्गत शेष राजवंशों के अधीन राजस्व नीति का उल्लेख करेंगे।

अलाउद्दीन खिलजी की राजस्व नीति : 

अलाउद्दीन खिलजी खिलजी वंश का महानतम सुल्तान था। वह पहला सुल्तान था जिसने राजस्व नीति और व्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन किये। उसकी नीति मुख्यतः दो सिद्धान्तों पर आधारित थी - 

1. राज्य की आय में अधिकाधिक वृद्धि करना और 

2. लोगों को आर्थिक अभाव की दशा में रखना जिससे वे विद्रोह अथवा सुल्तान की आज्ञा का उल्लंघन न कर सके।

राजस्व वृद्धि के लिए अलाउद्दीन ने तीन महत्त्वपूर्ण उपाय किए -

सबसे पहले उसने दोआब में प्रचलित भू-राजस्व की दर में वृद्धि की। अब किसानों से उपज का 1/2 लगान (भूमिकर या खिराज) के रूप में लिया गया। इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र की कर-मुक्त जमीन पर राजकीय नियंत्रण स्थापित किया गया। लगान-निर्धारण की व्यवस्था में भी सुधार लाया गया। भूमि की माप करवा कर उपज के आधार पर लगान तय किया गया। इतिहासकार बरनी के अनुसार नाप और प्रति “बिस्वा“ के आधार पर लगान निश्चित किया गया। वह मापन की पद्धति या “मसहत” की विस्तृत जानकारी नहीं देता है लेकिन अनुमान लगाया है कि जमीन की माप के लिए एकीकृत प्रणाली अपनाई गई। इस व्यवस्था में किसी को भी छूट नहीं दी गई। राजस्व नकद तथा अनाज दोनों रुपों में लिया जाता था। इन सुधारों से राजस्व में भी पर्याप्त वृद्धि हुई। इस प्रकार अलाउद्दीन दिल्ली का पहला सुलतान था जिसने वास्तविक उपज के आधार पर लगान की राशी निश्चित की। इस व्यवस्था के द्वारा राज्य ने किसानों से सीधा संबंध स्थापित किया तथा किसानों के बीच बिचौलियों का प्रभाव समाप्त कर दिया।

अलाउद्दीन का दूसरा आक्रमण खूत, चौधरी और मुकद्दमों पर हुआ जो पैतृक आधार पर लगान अधिकारी थे और सभी हिन्दू थे। इनपर नियंत्रण कायम करने के उद्देश्य से अलाउद्दीन ने एक अध्यादेश द्वारा मिल्क (सम्पत्ति), इनाम और वक्फ (उपहार) में दी गई भूमि को वापस लेकर उसे खालसा भूमि (राज्य की भूमि) में परिवर्तित कर दिया गया। व्यक्तिगत जमीन सिर्फ वैसे लोगों के पास ही बच गई, जो राज्य की सेना में कार्यरत थे और ठीक से उसका प्रबंध कर सकते थे। लगान वसूलनेवाले मुकद्दमों (मुखिया), खूत अर्थात जमींदार और चौधरी के विशेषाधिकारों को समाप्त कर उनसे लगान वसूली का काम वापस ले लिया गया। इससे उनकी स्थिति अत्यंत दुर्बल हो गई। बरनी के अनसार- “सुल्तान की आज्ञा का पालन इस कठोरता से किया गया कि राजस्व विभाग का एक सिपाही बीस खूतों, मुकद्दमों और चौधरियों की गर्दन एक साथ बांध कर और उन्हें लात और घूसे मार कर खिराज वसूल करता था। गांव के हिंदू (मुखिया) के लिए असंभव था कि वह अपना सर उठाए। हिन्दूओं के घरों में सोना-चाँदी, टंके, जीतल तथा अन्य फालतू सामग्री नहीं रह गई। दरिद्रता के कारण खूतों और मुकद्दमों की स्त्रियाँ मुसलमानों के घरों में नौकरियों के लिए जाया करती थीं।“ अब उनके स्थान पर आमिल (कर एकत्र करनेवाले) एवं गुमाश्ता (प्रतिनिधि) लगान वसूलने लगे। लगान वसूली से संबद्ध अन्य पदाधिकारी थे - मुहस्सिल (खराज वसूलनेवाला), ओहदा दाराने दफातिर (कार्यालय का अध्यक्ष) और नवीसिन्दा (लिपिक)। बड़ी संख्या में हिंदू कर्मचारियों को भी लगान व्यवस्था से जोड़ा गया। जियाउद्दीन बरनी के अनुसार - ‘‘यद्यपि पचास प्रतिशत कर वसूला जाना इस्लामी कानूनों के विरुद्ध नही था फिर भी इतना अधिक कर इससे पूर्व कभी भी वसूल नही किया गया था।‘‘ आधुनिक इतिहासकार के0एस0 लाल अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री आफ द खलजीज‘ में अलाउद्दीन की भू-राजस्व प्रणाली की प्रशंसा करते हुए लिखते है कि उसके लिए इतना कर निर्धारित करना समय की आवश्यकता थी क्योंकि राजकोष की स्थिति और सैनिकों के बोझ को देखते हुए इतना कर वसूल करना आवश्यक हो गया था।

तीसरा महत्वपूर्ण काम सुल्तान द्वारा कुछ नए कर भी लगाए गये जैसे आवास-कर एवं चराई-कर। राज्य को सिंचाई-कर, सीमा-शुल्क, करही, जजिया (हिंदुओं पर लगाया जानेवाला कर), जकात (धार्मिक कर, सिर्फ मुसलमानों से वसूला जानेवाला, और खुम्स (युद्ध में प्राप्त लूट का माल) से भी आमदनी होती थी। अलाउद्दीन से पूर्व खुम्स नामक कर में सैनिकों का हिस्सा 4/5 जबकि सुल्तान का हिस्सा 1/5 होता था। अलाउद्दीन ने इसका 4/5 भाग राज्य-कर के रूप में लिया। दुधारु पशुओं के लिए चारागाह निश्चित कर चराई-कर वसूला गया। फरिश्ता के अनुसार चार बैल, दो गाएँ, दो भैंसें और बारह बकरियाँ और भेड़ें कर से मुक्त थीं। करही संभवतः एक गौण कर था। स्त्रियों, बच्चों, विक्षिप्तों और अपंगों के अतिरिक्त सभी गैर-मुसलमानों को जजिया देना पड़ता था। जकात मुसलमानों की संपत्ति के 40वें भाग के रूप में वसूला जाता था। लगान-वसूली का काम कठोरता से होता था। अलाउद्दीन की राजस्व नीति को सफलतापूर्वक लागू करने का श्रेय उसके नायब वजीर शर्फ कायिनी को दिया जाता है।

अलाउद्दीन खिलजी ने राजस्व कठोरता से वसूल करने वाले अधिकारियों के नाम बकाया राशी की जॉच करने और वसूल करने के लिए एक अलग विभाग (दीवान-ए-मुस्तखराज) का निर्माण किया और फसल की किसी प्रकार की हानि होने पर राजस्व में छूट देने का नियम नही रखा। 

अलाउद्दीन के उत्तराधिकारियों की दृष्टि में उसकी राजस्व सम्बन्धी नीति कठोर थी अतः उनके द्वारा अनेक कठोर नियम त्याग दिये गये परन्तु उसके द्वारा निश्चित की गयी लगान की दर में परिवर्तन नही किया गया। 

तुगलक वंश के शासकों की राजस्व नीति :

तुगलक वंश के प्रथम शासक गियासुद्दीन तुगलक के काल में भू-राजस्व की दर पूर्ववत उपज का 1/2 कायम रही लेकिन उसने प्राकृतिक कारणों से फसल के नुकसान होने पर छूट देने के सिद्धान्त को स्वीकार किया। इसके अतिरिक्त उसने खूतों, मुकद्दमों और चौधरी लोगों को भूमिकर और चराई कर से मुक्त कर दिया। उसने यह भी नियम बना दिया कि किसी इक्ते में एक वर्ष में 1/10 भाग से अधिक राजस्व की वृद्धि न की जाय। गियासुद्दीन तुगलक ने अलाउद्दीन की भूमि पैमाइश की परिपाटी त्याग दी और सैनिक तथा असैनिक पदाधिकारियों को जागीर देने की प्रथा को पुनः प्रचलित किया। 

गियासुद्दीन तुगलक के बाद मुहम्मद बिन तुगलक शासक बना। उसने जैन सन्त जम्बूजी को भू-अनुदान प्रदान किया। वह पहला सुल्तान था जिसने फसलों को बदल-बदल कर बोने की पद्धति (सस्यावर्तन) का अनुमोदन किया। वह राजस्व विभाग को सुव्यवस्थित करने का इच्छुक था लेकिन उसके सभी प्रयोग असफल हो गये। उपज का 1/2 भाग भूमिकर वसूलने के कारण कृषकों ने उसके विरूद्ध विरोध प्रकट किया। इसी बीच अनावृष्टि के कारण उसके राज्य में दुर्भिक्ष पड गया जिसके कारण भयंकर विद्रोह उठ खडा हुआ किन्तु सुल्तान ने अपना आदेश वापस नहीं लिया। बाद में उसने तकावी ऋण बॉटा लेकिन तबतक बहुत देर हो चुकी थी और दोआब का सम्पूर्ण प्रदेश बरबाद हो गया। उसने अकाल ग्रस्त लोगों की सहायत के लिए “अकाल संहिता“ का निर्माण करवाया। रतन नाम के एक हिन्दू को मुहम्मद तुगलक के ही शासनकाल में राजस्व अधिकारी के रूप में नियुक्त किया। कालान्तर में उसने “दीवान-ए-अमीरकोही” नामक कृषि विभाग की स्थापना की जिसका उद्देश्य कृषि के क्षेत्र में विस्तार करना था किन्तु यह योजना भी निष्फल रही।

फिरोज तुगलक ने सुल्तान बनते ही तकावी ऋण तथा कृषि उपकर (अबवाव) माफ कर दिया। उसने 24 प्रकार के कर समाप्त करते हुए कुरान में बताए गए केवल 5 प्रकार के करों को ही अपने साम्राज्य में लागू किया। कृषि के विस्तार और राजस्व बढाने के उद्देश्य से उसने 4 नहरों का निर्माण करवाया, अनेक कुएँ खुदवाये, फलों के अनेकों बाग लगवाए और उत्तम फसालों की पैदावार बढाने के लिए प्रोत्साहन दिया। उसके द्वारा सिचाई व्यवस्था से सर्वाधिक लाम पंजाब क्षेत्र को प्राप्त हुआ। फिरोज तुगलक ने उसरी भूमि से 1/10 भाग भू-राजस्व के रूप में वसूल किया। फिरोज तुगलक वह पहला सुल्तान था जिसने सिचाई कर वसूल किया। उसके शासनकाल में जजिया कर अत्यधिक कठोरता से लागू किया गया। 

अन्त में जब लोदियों के हाथों में सत्ता आई तो उन्होने अपने राज्य की समस्त भूमि महत्वपूर्ण अफगान परिवारों में बॉट दिया। इससे खालसा भूमि का क्षेत्र और महत्व काफी कम हो गया। हालाँकि सिकन्दर लोदी ने भूमि की नाप करने की परिपाटी पुनः प्रचलित करते हुए ’सिकन्दरी गज’ का प्रयोग किया लेकिन वास्तव में इन छोटे मोटे प्रयासों का कोई प्रतिफल नही मिल सका। उसने राजस्व नियमों में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नही किया।


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