window.location = "http://www.yoururl.com"; The Advent of modernity in Europe | यूरोप में आधुनिकता की दस्तक

The Advent of modernity in Europe | यूरोप में आधुनिकता की दस्तक

 


The Beginning of Modern Era in Europe-

The practice of marking the beginning of the modern era with the Renaissance is merely a matter of convenience for the study of history. Attempting to delineate historical periods—ancient, medieval, and modern—by establishing specific dates as boundaries is inherently flawed. At any given point in time, different nations may exist at varying stages of development. Similarly, within a single country, different social groups may evolve in distinct ways and at different rates. Consequently, drawing generalizations about an entire nation based on the circumstances of a single social group or the achievements of one specific region cannot lead to accurate conclusions.

The advent of modernity in Europe was a gradual historical process that brought significant changes in political, social, economic, scientific and cultural life. It began with the Renaissance (14th–16th centuries), which encouraged humanism, individualism and a spirit of scientific inquiry. People gradually moved away from medieval religious traditions and developed a rational and critical approach towards life.

The Reformation in the 16th century challenged the authority of the Catholic Church and encouraged religious freedom and individual thinking. The Scientific Revolution of the 16th and 17th centuries, led by thinkers such as Copernicus, Galileo and Newton, transformed people's understanding of nature and the universe. The Enlightenment of the 18th century further promoted reason, liberty, equality and individual rights.

The Industrial Revolution, beginning in Britain during the 18th century, introduced machines, factories and modern methods of production. It encouraged urbanisation, capitalism and the growth of the middle class. Politically, the American and French Revolutions spread ideas of democracy, nationalism and popular sovereignty.

Thus, the advent of modernity transformed European society from a traditional, feudal and religiously dominated system into a more rational, industrial, scientific and democratic society. It also laid the foundation for the development of the modern world.

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भूमिका -

आधुनिक काल का प्रारंभ पुनर्जागरण से मानने का आधार इतिहास के अध्ययन की सुविधामात्र है। इतिहास को प्राचीन, मध्ययुग और आधुनिक काल में बांटने के लिए किसी तिथि को सीमा बनाना बड़ा त्रुटिपूर्ण है। काल की दृष्टि से विभिन्न देश एक निश्चित समय में उन्नति के विभिन्न स्तरों पर पाए जाते हैं। इसी तरह एक ही देश में विभिन्न वर्गों का अलग-अलग ढंग से अलग-अलग विकास होता है। इसीलिए किसी एक वर्ग की स्थिति या किसी एक क्षेत्र की उपलब्धियों को आधार मानकर संपूर्ण देश के बारे में साधारणीकरण किया जाए तो सही नतीजे नहीं निकल सकते।

कुछ उदाहरणों से बात स्पष्ट हो सकती है। आज हम आधुनिक युग में रह रहे हैं लेकिन सबसे उन्नत देश अमरीका के मुकाबले में अफ्रीका के पिछड़े देश अंगोला और मोजांबिक रखे जा सकते हैं क्या ? यदि एक ही देश भारत को ही लें तो दिल्ली वालों और बस्तर के आदिवासियों को एक साथ कैसे रखा जा सकेगा ? इतिहास पर नजर डालें तब भी यही समस्या उठ खड़ी होगी। जिस समय सिंधु घाटी की सभ्यता उन्नति के शिखर पर थी, बाद के आर्य विजेता खानाबदोश जिंदगी बिताते थे। जिस समय यूनान में ’सुकरात’ और ’अफलातून’ की दुंदुभि बज रही थी, यूरोप के अधिकांश क्षेत्रों के लोग सभ्यता की न्यूनतम शर्तें भी पूरी नहीं करते थे। यूनान और रोम की सभ्यताओं का अंत करने वाले लोग बर्बर कहे जाते हैं। ऐसे में आधुनिकता को कालक्रम से जोड़ना कहां तक उपयुक्त होगा ?

अधिकांशतः हर देश और काल में प्राचीन, मध्ययुगीन और आधुनिक स्थितियां एक साथ विद्यमान रहती हैं, जैसे बस्तर के गांव, गंगा-जमुना के मैदान के गांव और नई दिल्ली के मुहल्ले तीन युगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये तीन स्थितियां दिल्ली में ही एक साथ मिल सकती हैं। यह यदि सच है तो इतिहास का कालानुसार विभाजन एकदम दोषपूर्ण है। इतिहास के क्रम को यदि समझना ही है तो सारी मानवता के संदर्भ में हमें विकासक्रम को समझना पड़ेगा कि कैसे भौतिक संघर्षों के सहारे मनुष्य निरंतर प्रगति करता रहा है। इस प्रगति का स्वरूप सार्वभौमिक और सर्वव्यापी नहीं रहा है। इसलिए एक साथ ही प्रगति के भिन्न चरण दिखलाई पड़ जाते हैं।

लेकिन इस दृष्टि से यूरोप का अध्ययन करने पर निर्धारित पाठ्यक्रम से बंधे हुए विद्यार्थी के साथ न्याय नहीं हो सकेगा। जिस पुनर्जागरण को अधिकांशतः आधुनिक युग का आरंभ माना जाता है उसे ही बहुत से इतिहासकार प्रतिक्रियावादी या प्रतिगामी मानते हैं। धर्म-सुधार को भी आधुनिक आंदोलन मानना उन्हें स्वीकार्य नहीं है। सांस्कृतिक इतिहास का समर्थक और स्वयं ‘आधुनिक संस्कृति के स्रोत’ (व्तपहपद व िडवकमतद ब्नसजनतम) के लेखक प्रीजवर्ड स्मिथ ने अपनी पुस्तक ’लूथर’ की भूमिका में स्पष्ट लिख दिया है कि कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट दोनों चर्च हमेशा विकास के विरोधी रहे हैं चाहे सामाजिक विकास हो या वैज्ञानिक। इसीलिए वह आधुनिक युग की शुरुआत कुस्तुनतुनिया के पतन (1453) से नहीं, बल्कि कोपरनिकस की विभिन्न ग्रहों की गति सबंधी क्रांतिकारी पुस्तक, जिसमें उसने धरती द्वारा सूरज का चक्कर लगाने की बात की थी, के प्रकाशन (1543) से मानता है। बहरहाल हमें यहॉं इस विवाद में पड़ने की जरूरत नहीं है। इसलिए हमें इस दोषपूर्ण विभाजन के सहारे ही हमें यूरोप का अध्ययन करना पड़ेगा।

पुनर्जागरण के बाद आधुनिक काल के प्रारंभ होने की बात से यह स्पष्ट होता है कि उसके पहले यूरोप अंधकार में था, उसकी शक्तियां सो गई थीं और पंद्रहवीं शताब्दी में कई कारणों से यूरोप जागा। चूंकि पहले भी यूनान और रोम की सभ्यता के समय यूरोप को जागा हुआ मानते हैं अतः इस जागरण को पुनर्जागरण कहा गया। इससे पहले कि हम पुनर्जागरण से आधुनिकता की शुरूआत करें, हमें पुनर्जागरण के पहले के यूरोप का संक्षेप में सर्वेक्षण करना होगा। इससे न केवल पुनर्जागरण से पूर्व युरोप की धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक स्वरूप का ज्ञान होगा अपितु स्वयं पुनर्जागरण और आधुनिक काल को समझने में भी आसानी होगी।

प्राचीन काल के यूरोप की जब याद की जाती है तो जो बातें उभरकर सामने आती हैं, वे हैं यूनान की विविध उपलब्धियां-सुकरात और सिकंदर के नामों के सहारे; जूलियस सीजर, क्लियोपेट्रा, सिसरो और नीरो का रोम जिसने सारे दक्षिणी यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और मध्यपूर्व पर अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया था। और अंत में, जेरूसलम में जन्मे ईसाई धर्म का यूरोप में पहुंचकर स्थाई और व्यापक हो जाना। इसके बाद वर्बर जातियों के हमले हुए और यूरोप पर अंधकार छा गया। केवल नगरों और राज्यों का ही नहीं, चेतना का भी हुआ। पांचवीं से पंद्रहवीं शताब्दी तक के काल को यूरोप का मध्ययुग मानते है। वास्तविकता यह है कि इस समय भी अजेय मानव-शक्ति निरंतर कार्यरत रही।

धार्मिक स्वरूप -

अपनी सादगी, मानव सेवा और लगन के साथ ईसा मसीह के शिष्य संत पीटर ने जिस धर्म की स्थापना की थी, वह रोमन सम्राट के अनुयायी हो जाने के कारण सारे यूरोप में मान्य हो गया। चर्च द्वारा एक अत्यन्त जटिल लेकिन कारगर संगठन बनाया गया और युरोप ‘ईसा का राज्य‘ कहलाने लगा। इस धार्मिक साम्राज्य की राजधानी रोम थी और पीटर के उत्तराधिकारी सारे चर्च में एकछत्र शासक के रूप में रहता था। कालान्तर में ईसाई धर्म एकदम एकांतिक हो चला था और उसने अपने सारे दरवाजे बन्द कर लिये थे। इस धार्मिक साम्राज्य के सबसे बडे पद पर पोप, उसके बाद कार्डिनल, आर्च विशप, विशप, पादरी और ऐसे ही अनेक पद धारित अधिकारी गॉव तक में फैले हुये थे। व्यक्ति पैदा होते ही चर्च की शरण में चला जाता था जहॉं से मृत्यु के बाद भी मुक्त नही होता था क्योंकि जीता था चर्च-निर्धारित संस्कारों में बंधकर और मुक्ति पा सकता था चर्च-निर्धारित सत्कर्मों के सहारे। पोप के मरने के बाद कार्डिनल लोग अपने में से ही एक को पोप चुन लेते थे और जीवन भर उसे धरती पर ‘ईश्वर की छाया‘ कहते थे। इसलिए यह निर्विकार और अंतिम निर्णायक के रूप में प्रतिष्ठित था। पोप की शक्ति अपार थी और धर्म ही नहीं राजनीति में भी उसकी इच्छा के विरुद्ध सम्राट तक नहीं जा सकते थे। जाने पर अंत में उन्हें घुटने टेकने पड़ते थे। 

लेकिन जैसे-जैसे पद और सत्ता की धाक बडती गई वैसे-वैसे चर्च में बुराइयां आने लगीं और शीध्र ही सारा तंत्र भ्रष्ट हो गया। वैचारिक स्वतंत्रता और संवाद के अभाव में मान्य बातों से अलग बात कहने वाले को मौत तक की सजा दे दी जाती थी। पूर्वी यूरोप में इसी चर्च का एक थोड़ा-सा बदला हुआ रूप ग्रीक आर्थोडॉक्स चर्च के रूप में जाना जाता था। इसका केंद्र कुस्तुनतुनिया (ब्वदेजंदजपदवचसम) था। ऐसा होने पर भी मठों में अनेक संत व्यक्तिगत रूप से मानवता को समर्पित होकर सेवारत थे या फिर अध्ययन-मनन में लगे थे। यह सच है कि अधिकतर पादरी और भिक्षु यथार्थ से कटकर अपनी ही दुनिया में खोए रहते थे लेकिन उनका चिंतन ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

इस तथ्य को थोडा और विस्तार से समझने का प्रयत्न करते है। मध्ययुगीन युरोप में ईसाई धर्म की प्रधानता थी और समस्त युरोप में ईसाई धर्म व्याप्त था और जीवन के हर क्षेत्र में ईसाई धर्म का प्रभाव सुप्रतिष्ठित था। 15वीं शताब्दी से पूर्व पिछले 4 शताब्दियों तक पूरे युरोप पर चर्च का प्रभुत्व कायम रहा। 8वीं शताब्दी में शार्लेमन और आटो महान के सतत प्रयासों से समस्त पश्चिमी और मध्य युरोप को एक राजनीतिक और धार्मिक एकतायुक्त संस्था के रूप में परिणत किया गया जो ‘पवित्र रोमन साम्राज्य‘ ;भ्वसल त्वउंद म्उचपतमद्ध के नाम से विख्यात हुआ। लगभग 16वीं शताब्दी के अन्त तक समस्त पश्चिमी ईसाईयत पर पवित्र रोमन साम्राज्य की सत्ता मान्य थी। कालान्तर में सत्ता पर पकड ढीली होने के कारण पश्चिमी युरोपीय राज्य स्वतंत्र होते चले गये। सर्वाधिकार प्राप्ति हेतु ईश्वर के आध्यात्मिक प्रतिनिधि रोम के पोप और भौतिक प्रतिनिधि पवित्र रोमन सम्राट के बीच संघर्ष आरंभ हुआ जिसमें अन्ततोगत्वा रोम के पोप को विजय प्राप्त हुई। इस प्रकार सम्पूर्ण युरोप पर कैथोलिक चर्च की सत्ता सर्वोपरि हो गयी। 

युरोप में कैथोलिक चर्च और पोप की सार्वभौमिक सत्ता की स्थापना के अनेक कारण थे। इस समय तक ईसाईयों का यह दृढ विश्वास हो चला था कि चर्च के और पोप के बिना मोक्ष असंभव है। कैथोलिक चर्च के विशाल और सुनियोजित संगठन के कारण समस्त पश्चिमी युरोप में चर्च का विस्तृत प्रभाव था। कैथोलिक लोग कैथोलिक चर्च के प्रधान पोप को ईसा मसीह के सर्वोच्च प्रतिनिधि एवं संत पीटर के उत्तराधिकारी मानते थे। धार्मिक मठों, चर्च और अनेक धर्माधिकारियों के माध्यम से समस्त युरोप के ईसाईयों के धार्मिक, नैतिक एवं राजनीतिक जीवन को नियंत्रित किया जाता था। इसके अतिरिक्त अनेक आत्म-त्यागी, निःस्वार्थ सेवी और भिक्षु-भिक्षुणी थे जो ब्रह्मचारी एवं पोप के आज्ञापालन के व्रत को अपनाते हुये समाज सेवा एवं जनकल्याण के कार्यो में सतत संलग्न थे। ईसाई धर्मशास्त्र और सप्त-संस्कार के सिद्धान्त ;ैंबतंउमदजेद्ध भी कैथोलिक चर्च की सार्वभौमिकता के प्रमुख कारण थे। ईसाई धर्म के उद्देश्यों, शिक्षाओं और गूढ रहस्यों का प्रतिपादन कर धार्मिक विद्वानों द्वारा धर्म के मौलिक सिद्धान्तों का संग्रह व संकलन किया गया जिसे सप्त संस्कार के नाम से जाना जाता है। इन सप्त-संस्कारों के सिद्धान्त के माध्यम से ईसाईयों के जीवन में जन्म से लेकर मृत्यु तक चर्च की प्रधानता सुप्रतिष्ठित हो गयी। सप्त संस्कार पद्धति के अनुसार निम्नलिखित संस्कारों का पालन किया जाता है - जन्म संस्कार ;ठंचजपेउद्धए प्रमाणीकरण ;ब्वदपितउंजपवदद्धए प्रायश्चित ;च्मदंदबमद्धए पवित्र यूकारिष्ट ;भ्वसलम्नबींतपेजद्धए मान्यता-प्रदान ;व्तकपदंजपवदद्धए विवाह-संस्कार ;डंजतपउवदलद्धए और अन्तिम संस्कार ;म्गजतमउम निदबजपवदद्ध ।

जन्म संस्कार के अनुसार चर्च के माध्यम से प्रत्येक नवजात शिशु को समस्त जन्मपूर्व पापों से मुक्त कर ईसाई धर्म का सदस्य बना दिया जाता है। प्रमाणीकरण-संस्कार के अनुसार ईसाई नवयुवकों को चर्च की सदस्यता एवं ईसा मसीह की सेवा हेतु मान्यता दी जाती थी। प्रायश्चित का संस्कार ईसाइयों में बड़ा महत्वपूर्ण समझा जाता है। इसके द्वारा जन्म-संस्कार के पश्चात् किये गये समस्त पापों से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। पापों से मुक्ति पाने के लिए ईसाइयों को प्रायश्चितस्वरूप अनुताप, ईश्वर के विरुद्ध पुनः आचरण न करने का दृढ़ संकल्प, चर्च की सेवा, प्रार्थना, पुण्य कार्य, दान एवं लोक-सेवा इत्यादि करने पड़ते हैं। ये प्रायश्चित प्राप्ति हेतु ’सत्कर्म’ कहलाते हैं। मध्ययुग में प्रायश्चित एवं तत्सम्बन्धी ’सत्कर्म’ सभी पापों से मुक्ति के साधन बन गये थे एवं इन पर अत्यधिक महत्व दिया जाता था। पवित्र यूकारिष्ट का तात्पर्य स्वतकष्े स्नचचमत से है। इसके अनुसार चर्च के माध्यम से पवित्र पूजा हेतु रखी हुई रोटी एवं शराब का क्रमशः ईसा मसीह के मांस और रक्त में  रूपान्तर हो जाता है। प्रसाद के रूप में ईसाइयों में इनका वितरण होता है। वस्तुतः कैथलिक धर्म का मूल रहस्य स्वतकष्े ैनचचमत ही है। अतः ईसाइयों में सामूहिक प्रार्थना (ज्ीम डंेे) सुगन्धित धूप, दीप, मोमबत्ती तथा गीत-संगीत सहित धूमधाम से पूरी की जाती है। इस हेतु विशाल गिरजाघरों की स्थापना की गयी है।

मान्यता-प्रदान का संस्कार सिर्फ पुरोहितों एवं धर्म-सेवकों के निमित्त होता है। इसके अनुसार बिशपों, पुरोहितों एवं उपासकों को ईसाई धर्म की दीक्षा दी जाती है एवं उन्हें ईसाई धर्म के विविध संस्कारों एवं कर्तव्यों के सम्पादन हेतु अधिकृत किया जाता है।

विवाह-संस्कार के अनुसार चर्च द्वारा ईसाई पुरुष-स्त्री का धर्म-संगत विवाह सम्पादित किया जाता है। यह विवाह-सम्बन्ध बड़ा पवित्र एवं मृत्यु तक अविच्छेद माना जाता है। ईसाई धर्म के अन्तर्गत समस्त संस्कारों, धार्मिक अनुष्ठानों एवं कार्यों का सम्पादन केवल पुरोहितों द्वारा ही सम्भव माना जाता है। ईसाइयों का यह दृढ़ विश्वास है कि चर्च की सहायता से ही उन्हें मोक्ष प्राप्त हो सकता है। परिणामस्वरूप वे चर्च की दया और सहानुभूति के पात्र बन गये हैं। मध्ययुग में यह धारणा प्रचलित थी कि मनुष्य राजनीतिक सत्ता की भले ही उपेक्षा कर सके, परन्तु चर्च की उपेक्षा कर सकना असम्भव था, क्योंकि बिना चर्च की सहायता से उनकी आत्मा को मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता था।

अन्तिम या मृत्यु-संस्कार के अनुसार मरणासन्न ईसाइयों को पुरोहित द्वारा आत्मा की चिरशान्ति एवं ईश्वर से मिलने के लिए शक्ति प्रदान की जाती है।


मध्ययुगीन कैथलिक चर्च को सुदृढ़ आर्थिक स्थिति, अपार साधन, विस्तृत धार्मिक एवं राजनीतिक अधिकार इत्यादि कैथलिक चर्च की सार्वभौमिकता एवं विस्तृत प्रभाव के कारण थे। चर्च के पास यूरोप में असंख्य जागीरें, जायदादें और अतुल सम्पत्ति थी। यूरोप के समस्त ईसाइयों पर विविध प्रकार के करारोपण के अधिकार चर्च को प्राप्त थे। चर्च राजनीति से सर्वथा पृथक एवं स्वतन्त्र संस्था थी। इसके स्वतन्त्र एवं पृथक कानून और न्यायालय थे। चर्च के धर्माधिकारियों के मुकदमों का निर्णय इन्हीं न्यायालयों में होता था। वे राजनीति के अधिकार-क्षेत्र से सर्वथा स्वतन्त्र थे। साथ ही चर्च के न्यायालयों में जनसाधारण के विवाह, विवाह-विच्छेद, वसीयत और सम्पत्ति सम्बन्धी सभी मुकदमों का फैसला किया जाता था। संक्षेप में, कैथलिक चर्च के राजनीतिक, आर्थिक एवं धार्मिक अधिकारों की परिधि बड़ी विस्तृत एवं सुदृढ़ थी।

चर्च न केवल विविध प्रकार के अधिकारों से अधिकृत था, वरन् वह साथ ही विविध प्रकार के कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों से युक्त था। ईसाइयों के नैतिक तथा धार्मिक जीवन को समुन्नत करना, शिक्षा पर नियन्त्रण रखना, प्रारम्भिक शिक्षा से लेकर उच्चतम शिक्षा का संचालन करना, समाज-सेवा एवं लोक-कल्याणकारी कार्यों को करना, धर्म के आदर्शों एवं शिक्षाओं की रक्षा करना, इत्यादि चर्च के मुख्य उत्तरदायित्व थे। संक्षेप में, समस्त यूरोप में अपने धर्माधिकारियों की सेना, विस्तृत नैतिक, धार्मिक, आर्थिक तथा राजनीतिक अधिकारों से सम्पन्न कैथलिक चर्च समस्त ईसाई जगत की एकता के लिए महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली संस्था बन गयी थी। मध्ययुगीन यूरोपीय समाज में चर्च सर्वोच्च वर्ग था और ’प्रथम वर्ग’ के नाम से प्रख्यात था। 

उत्तर-मध्ययुगीन यूरोप से चर्च बाह्यरूप से सर्वशक्ति सम्पन्न एवं साधन-सम्पन्न होता हुआ भी अपनी आभ्यान्तरिक कमजोरियों के कारण, धीरे-धीरे गौरवहीन होने लगा था। चर्च की अतुल सम्पत्ति एवं व्यापक प्रतिष्ठा ही उसके अधःपतन का कारण बनीं। चर्च के धर्माधिकारियों में भ्रष्टाचार आरम्भ हो गये, अतः उनके विरुद्ध आरोप लगने प्रारम्भ हो गये। यद्यपि समय-समय पर पोप एवं अन्य उच्च धर्माधिकारियों ने चर्च के दोषों के निराकरण की चेष्टा की, परन्तु वे विफल हुए। चर्च के धर्माधिकारियों में मौलिक सिद्धान्तों के प्रति उपेक्षा, पवित्र एवं त्यागमय जीवन का परित्याग, आध्यात्मिक कर्तव्यों की उपेक्षा इत्यादि दुर्बलताएँ उत्पन्न हो गयीं। अब वे भव्य प्रासादों में रहकर सांसारिक भोग-विलासिताओं में निमग्न हो गये। चर्च के विविध पदों के क्रय-विक्रय होने लगे, धार्मिक अवसरों पर जनता का अधिकाधिक आर्थिक शोषण होने लगा। संक्षेप में, चर्च का नैतिक स्तर बहुत नीचे गिर गया, अतः चर्च की कटु आलोचना होने लगी एवं चर्च के विरुद्ध आरोप एवं आक्षेप होने लगे। यद्यपि प्रारम्भ में चर्च ने आलोचकों या विरोधियों को नास्तिक कहकर धर्म से निष्कासित किया तथा उन्हें समाज-शत्रु कहकर मृत्युदण्ड प्रदान किया, परन्तु चर्च के विरुद्ध आलोचनाएँ बढ़ती ही गयीं। अन्ततः धर्म-सुधार-आन्दोलन आरम्भ हुआ। वस्तुतः चर्च के विरुद्ध आलोचनाएँ आधुनिक युग के आगमन एवं मध्ययुग की समाप्ति की सूचक थीं। 

सामाजिक स्वरूप -

मध्ययुगीन यूरोपीय समाज का मूलाधार सामन्तवाद था। मध्ययुगीन यूरोपीय समाज मुख्यतया सामन्तशाही व्यवस्था पर आधारित था। सामन्तवादी व्यवस्था के माध्यम से तत्कालीन अप्रगतिशील तथा अविकसित समस्त आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक संस्थाओं के विकास का प्रयत्न होता था। रोमन साम्राज्य के अधःपतन से जनित बाह्य आक्रमणों एवं आन्तरिक उपद्रव व अशान्ति के परिणामस्वरूप यूरोप में सामन्तवाद का प्रारम्भ हुआ। अतः प्रत्येक क्षेत्र में छोटे-बड़े सामन्त स्वतः बनते गये। सामन्तवाद के अन्तर्गत शीर्ष स्थान में ’राजा’ और निम्नतम स्थान में सभी प्रकार के अधिकारों से वंचित गुलाम या किसान थे। सामन्तों की विभिन्न कोटियाँ थीं। मध्ययुग की राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सामन्तवाद का प्रचलन हुआ था, परन्तु कालान्तर में सामन्तवाद अपनी उपयोगिता को खो बैठा और समाज के स्वस्थ विकास के लिए अभिशाप बन गया। मध्ययुग के प्रारम्भिक भाग में सामन्तवाद के माध्यम से बाह्य आक्रमणों एवं आन्तरिक अराजकताओं से स्थानीय सुरक्षा, खेती का विकास, न्याय की यथोचित व्यवस्था तथा सामाजिक सेवा कार्य इत्यादि सम्पन्न हुए। परन्तु कालान्तर में सामन्तवाद की अवनति या विकृति होने लगी। सामन्तों के व्यक्तिगत स्वार्थों एवं संघर्षों का प्राबल्य हो गया तथा समाज के लिए यह संस्था अभिशाप बन गयी।

सामन्तवादी व्यवस्था के अनुसार समाज मुख्यतया दो भागों में विभक्त था - अधिकारों से युक्त राजा व सामन्त तथा अधिकारों से वंचित किसान या दास। राजा समस्त भू-खण्ड का स्वामी था। समस्त भू-खण्ड विविध श्रेणी के सामन्तों एवं किसानों में बँटा हुआ था। मध्ययुगीन यूरोप मुख्यतया कृषकों का यूरोप था। भूमि ही धन और शक्ति का एकमात्र साधन समझी जाती थी। सामन्तगण किसानों की रक्षा करते थे, अतः इसके बदले में किसानों को अनिवार्य रूप से सामन्तों की सेवा एवं खेती करनी पड़ती। कृषकों की दरिद्रता, उनकी असहाय एवं दयनीय सामाजिक और आर्थिक स्थिति, इनके विपरीत सामन्तों की प्रभुता एवं शक्ति उनकी सम्पन्नता और विलासिता इत्यादि मध्ययुगीन यूरोपीय समाज की मुख्य विशेषताएँ थीं। सामन्तगण आराम और ऐश का जीवन बिताते थे, वे शस्त्रधारी सैनिक रखते थे एवं असहाय किसानों पर उनका आतंक था। किसान सामन्तों या राजा के दास या सेवक थे, उन्हें खेती करनी पड़ती थी, उन्हें अपने स्वामी के लिए अनेक प्रकार के कर और उपहार देने पड़ते थे एवं उन्हें अपने स्वामी लिए जीना या मरना पड़ता था। उन्हें सामन्तों की बेगार करनी पड़ती थी एवं सामन्तों की अनुमति प्राप्त किये बिना वे न तो उत्तराधिकार पा सकते थे और न विवाह ही कर सकते थे। संक्षेप में, किसानों का सम्पूर्ण जीवन सामन्तों के अधीन था। सामन्तों को शिकार के समय हर प्रकार की सुविधाएँ एवं सामग्रियाँ जुटाना भी किसानों के कर्तव्य थे।

मध्ययुग में मनुष्य सामान्यतः समूह का एक अंग था, अतः उसका कोई स्वतन्त्र व्यक्तित्व या अस्तित्व न था। इस प्रकार सर्दियों से यूरोप में सामन्तों की प्रधानता और किसानों की दरिद्रता चली आयी थी। पन्द्रहवीं सदी के अन्त में यूरोप की सामाजिक दशा बड़ी दयनीय थी। शोषित किसान शोषक सामन्तों के शोषण एवं अत्याचारों से पीड़ित थे, राजा भी सामन्तों के षड्यन्त्रों और परस्पर विरोध से तंग आ गये थे। परन्तु मध्ययुग के उत्तरार्द्ध में व्यापार और कला-कौशल की उन्नति हुई, नये-नये शक्तिशाली और साधन-सम्पन्न नगरों का उत्थान हुआ, मध्यम वर्ग का प्रभाव बढ़ने लगा, बारूद का आविष्कार हुआ, राजा की शक्ति अत्यधिक बढ़ गयी तथा यूरोप में नयी राजनीतिक जागृति एवं राष्ट्रीयता की भावना पल्लवित हुई। संक्षेप में, अब समाज में नवचेतना, नयी स्फूर्ति एवं उत्साह था। इन सब परिवर्तनों के कारण सामन्तवाद का क्रमशः पतन एवं विलयन होने लगा।

राजनीतिक स्वरूप -

राजनीतिक दृष्टि से रोमन साम्राज्य की याद में एक पवित्र रोमन साम्राज्य (भ्वसल त्वउंद म्उचपतम) की स्थापना हुई थी। शार्लमन द्वारा स्थापित यह साम्राज्य सारे मध्य यूरोप, विशेषकर जर्मन भाषी क्षेत्र में व्याप्त था। धीरे-धीरे इसका भी पतन हो रहा था। फ्रांस के प्रसिद्ध. लेखक वोल्तेयर ने बाद में इस पर व्यंग्य किया था: ’यह न पवित्र है, न रोमन, न साम्राज्य’ (नाइदर होली, नार रोमन, नार एंपायर) जो सर्वथा सच था ।

वास्तव में यह साम्राज्य राज्यों का एक समूह था। आधुनिक आस्ट्रिया और हंगरी के अतिरिक्त इटली के उत्तरी क्षेत्र आदि पर ही राजधानी वियेना का सीधा शासन था। अन्य राज्य प्रायः पूरी तरह स्वतंत्र थे। इस क्षेत्र के सात प्रमुख शासक-मैंत्स, ट्रायर और कोलाने के आर्च विशप तथा बोहेमिया, ब्रेडेनबर्ग (बाद में इसे प्रशा कहा जाने लगा) पैलेटाइन और सेक्सनी के शासकों को सम्राट चुनने का अधिकार था। इन्हें ’इलेक्टर’ कहते थे। इनकी संख्या बाद में बढ़ा दी गई थी। लेकिन यह नाममात्र का चुनाव होता था क्योंकि प्रायः ’हेप्सवर्ग’ परिवार के ही शासक सम्राट चुने जाते थे। पूरे जर्मन क्षेत्र संबंधी नीतियों का निर्धारण जर्मन क्षेत्रों की प्रतिनिधि संस्था ’डायट’ (जर्मन पार्लियामेंट) के हाथ में था। इस ’डायट में ’इलेक्टर’ लोगों के अतिरिक्त बड़े सामंत और धर्माधिकारी तथा स्वतंत्र राज्यों के प्रतिनिधि होते थे। लेकिन प्रमुखता सम्राट की ही थी। उसकी बातों का प्रायः विरोध नहीं होता था। लेकिन स्वयं सम्राट सामंतों और अन्य राजाओं की मदद पर निर्भर था। इसलिए वह साम्राज्य की वास्तविक शक्ति नहीं बल्कि एकता का प्रतीक था। पुनर्जागरण के साथ जब राष्ट्रीय भावनाओं और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का विकास हुआ तो जहां अन्य यूरोपीय राज्यों में संगठन बढ़ा वहीं पवित्र रोमन साम्राज्य में विघटन प्रारंभ हो गया क्योंकि इस साम्राज्य की विभिन्न इकाइयों के शासक राष्ट्रीय एकता के समर्थक वन गए। परिणाम यह हुआ कि सम्राट को राष्ट्रवाद का विरोध करते रहना पड़ा। 

सिद्धान्ततः सोलहवीं शताब्दी के अन्त तक समस्त ’पश्चिमी ईसाईयत’ पर पवित्र रोमन साम्राज्य की सत्ता मान्य थी, परन्तु वस्तुतः अपनी आन्तरिक दुर्बलताओं के कारण इनकी सत्ता अत्यन्त सीमित हो गयी थी एवं मध्य यूरोप के कतिपय छोटे-छोटे राज्य ही इसके अन्तर्गत रह गये थे। अन्य सभी पश्चिमी यूरोपीय राज्य इससे स्वतन्त्र हो गये थे। पवित्र रोमन साम्राज्य में अधिक दिनों तक राजनीतिक तथा धार्मिक समन्वय न टिक सका, क्योंकि कालान्तर में समस्त पश्चिमी ईसाईयत पर सर्वोच्च सत्ता एवं सर्वाधिकार प्राप्ति हेतु ईश्वर के आध्यात्मिक प्रतिनिधि रोम के पोप और भौतिक प्रतिनिधि पवित्र रोमन सम्राट के बीच संघर्ष आरम्भ हुआ। इस संघर्ष में अन्ततोगत्वा रोम के पोप को विजय प्राप्त हुई। अतः पवित्र रोमन सम्राट तथा अन्य सभी राजागण पोप के अधीन हो गये। मध्ययुग में समस्त यूरोप की राजभाषा लैटिन थी। राजनीतिक संगठन का मूल आधार सामन्तवाद था। उन दिनों यूरोप में राष्ट्रीयता के आधार पर राजनीतिक संगठन, जातीयता, भाषा, धर्म या सांस्कृतिक एकता का अभाव था।

मध्ययुग के अन्तिम चरण में यूरोप के राजनीतिक स्वरूप में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन आरम्भ हो गये। पन्द्रहवीं सदी के अन्त तक पश्चिमी यूरोप में कई सुदृढ़ राजतन्त्रों की स्थापना हुई जिसके फलस्वरूप मध्ययुगीन यूरोपीय राजनीतिक व धार्मिक एकता लुप्त हो गयी। फ्रांस, स्पेन और इंग्लैण्ड के शासकों ने पवित्र रोमन सम्राट से अपना सम्बन्ध-विच्छेद कर तथा रोम के पोप के नियन्त्रण से मुक्त होकर अपने-अपने देशों में सुदृढ़ राजतन्त्रों की स्थापना की। इस काल में यूरोप के विविध राज्यों में राजभक्ति, देशभक्ति एवं राष्ट्रीयता की भावना की वृद्धि हुई। अतः यूरोप के विविध राज्यों में राष्ट्रभाषाओं एवं राष्ट्रीय साहित्य का सृजन प्रारम्भ हुआ। पश्चिमी यूरोप के विविध स्वतन्त्र एवं शक्तिशाली राष्ट्रों के उत्थान के साथ-साथ औपनिवेशिक साम्राज्य की स्थापना प्रारम्भ हुई, जैसे अमेरिका और पूर्वी देशों में यूरोपीय उपनिवेशों का स्थापना। मध्ययुग में राजनीतिक इकाई एक समूह या मण्डली मानी जाती थी, एवं निश्चित सार्वजनिक उद्देश्य और पारस्परिक सहयोग के उद्देश्य से इसकी स्थापना की जाती थी। राजनीति का सम्बन्ध मुख्यतया समुदायों से था, न कि व्यक्तियों से। आधुनिक काल के आरम्भ में यूरोप के प्रत्येक देश में पोप के हस्तक्षेप तथा प्रभुता का विरोध हो रहा था। इंग्लैण्ड और फ्रांस जैसे राष्ट्र में तो पोप के अधिकारों पर अंकुश लगाये जा चुके थे। राजाओं द्वारा पोप के प्रति विरोध के परिणामस्वरूप ही सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में धर्मानुसार आन्दोलन का प्रारम्भ हुआ।

होली रोमन साम्राज्य के अलावा पश्चिम में अन्य राज्य भी विकसित हो रहे थे। अभी राष्ट्र का स्वरूप स्पष्ट नहीं हुआ था, फिर भी एक विचारधारा, जिसका बाद में इटली के प्रख्यात लेखक मैकियावेली ने अपनी पुस्तक ’द पिं्रस’ में विश्लेषण किया, पनप रही थी कि शासक में एक क्षेत्र विशेष के लोग अपनी सारी आकांक्षाओं को प्रतिष्ठित कर दें। इस भावना से राष्ट्रीय शासक का जन्म हुआ।

स्वयं इटली अपनी रोमन साम्राज्य की गरिमा खो चुका था। एक जमाना था जब रोम से सारे दक्षिणी यूरोप, पश्चिमी एशिया के भूमध्यसागरीय किनारे और उत्तरी अफ्रीका का शासन होता था। लेकिन मध्ययुग में इटली विघटित हो गया था और उसके बड़े भाग पर पवित्र रोमन साम्राज्य का कब्जा हो गया था। पंद्रहवीं शताब्दी में जब इटली ही में पुनर्जागरण के बीज प्रस्फुटित हुए तो उसके नगर फ्लोरेंस, मिलान, नेपल्स, वेनिस और रोम आदि नई सभ्यता के केंद्र बन गए। दक्षिणी इटली प्रायः स्वतंत्र हो गया लेकिन अब भी वह विभाजित था। दक्षिण में सिसली द्वीप सहित नेपल्स का राज्य था। उत्तर में स्थित मिलान में स्फोर्जा परिवार का प्रभुत्व था। इटली में उत्तर-पूर्व में स्थित वेनिस के राज्य ने अपनी प्रारंभिक प्रजातांत्रिक परंपराएं छोड़ एक धनिकतंत्र का सहारा लिया था। लेकिन यहां विकसित हो रहे मध्यवर्ग ने वेनिस को सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध करना शुरू कर दिया था। तस्कनी प्रांत में फ्लोरेंस नगर पुनर्जागरण का प्रमुख केन्द्र बन गया। वहां का शासक ’मेडिची’ परिवार एक नवधनाढ्य कलाप्रेमी परिवार था। इस राजपरिवार का शासक लोरेंजो वास्तव में कला का महान संरक्षक था। पश्चिम में सवाय का राज्य था जिसके अधीन सार्डीनिया का द्वीप भी था। उस समय का यह महत्वहीन और पिछड़ा हुआ राज्य बाद में इटली के एकीकरण का नेतृत्व करने में समर्थ हो गया। मध्य इटली में पोप की रियासत थी। यहां पोप धार्मिक ही नहीं राजनीतिक प्रशासन भी करता था।

इटली के नगर और राज्य अलग विकासशील थे लेकिन उनको एक सूत्र में बांधे बिना विकास संभव नहीं था। इन शासकों में आपस में अनेक अंतर्विरोध थे; मूल्यों और संस्थाओं के। इसीलिए सांस्कृतिक रूप से सारे यूरोप में अग्रणी होने पर भी इटली राजनीतिक रूप पडोसियों का अखाडा बना हुआ था। प्रख्यात इटैलियन लेखक मैकियावेली ने इटली के इसी सांस्कृतिक और राजनीतिक अन्तराल का भरने के लिए अपनी पुस्तक ‘द प्रिन्स‘ की रचना की।

स्पेन मध्युग में अरबों के बढ़ते ज्वार में डूब गया था। सारे उत्तरी अफ्रीका पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने के बाद ये लोग, जिन्हें यहां ’मूर’ कहते थे, स्पेन पर अपना अधिकार स्थापित करने में सफल हो गए थे। ईसाई लोग उत्तर की पहाड़ियों में सिमटते गए थे। तेरहवीं शताब्दी से ईसाई राज्यों का फिर उत्कर्ष शुरू हुआ। मूरों का प्रभुत्व दक्षिण के ग्रेनाडा प्रांत तक सीमित रह गया था। पंद्रहवीं शताब्दी में स्पेन के राष्ट्रीय उद्भव का प्रारंभ दो राज्यों के पारस्परिक विलय से शुरू हुआ। ’मूरों’ के प्रति विरोध के कारण एक राष्ट्रीय भावना तो स्पेन में व्याप्त थी ही, लेकिन उसका स्वरूप प्रायः धार्मिक था। जब कास्तील की शासिका इसाबेला और अरागान के शासक फर्डिलेंड का विवाह हो गया तो स्पेन का राजनीतिक एकीकरण शुरू हो गया। धीरे-धीरे स्पेन की सीमाएं बढ़ने लगीं और उत्तर पूर्व में स्थित पिरेनीज की पहाड़ियों के अधिकांश हिस्से उनके कब्जे में आ गये। स्पेन ने इटली में और भौगोलिक आविष्कारों के बाद अमरीका में भी अपने राज्य स्थापित कर लिए। स्पेन की राजधानी मेड्रिड यूरोप का प्रमुख नगर बन गया।

आधुनिक युग की प्रारंभिक शताब्दी तक स्पेन यूरोप का सबसे शक्तिशाली राज्य प्रतीत होता था लेकिन उसकी शक्ति और गरिमा अस्थाई और सतही थी। वहां न व्यवसाय बढ़ रहा था न नए मूल्यों का संवाहक मध्यवर्ग। स्पेन का भूगोल उसके प्रतिकूल था। वहां के आर्थिक-सामाजिक जीवन में वह उर्वरता नहीं थी जहां आधुनिकता पनप जाती। परिणाम यह हुआ कि स्पेन का ज्यों-ज्यों विस्तार हुआ त्यों-त्यों उसका आवरण गुब्बारे की तरह क्षीण होता गया। एक समय आया जब अपने विस्तार और निराधार शक्ति के कारण ही स्पेन पतनोन्मुख हो गया। आधुनिकता के प्रस्फुटन और विकास के लिए अनुकूल-अनिवार्य स्थितियां जरूरी हैं। इतिहास साक्षी है कि पंद्रहवीं शताब्दी के स्पेन में न ऐसी स्थितियां विद्यमान थीं और न ही निकट भविष्य में उनकी संभावना थी।

स्पेन का पश्चिमी पड़ोसी था पुर्तगाल। यह विडंबना ही तो है कि आज यूरोप के सबसे महत्वहीन देश पुर्तगाल में पंद्रहवीं शताब्दी में नाविक अभियानों और अन्वेषणों का अग्रणी पिं्रस हेनरी नामक शासक हुआ था। उसने अफ्रीका के ’गिनी’ प्रदेश की खोज करवाई और अफ्रीका से सोना, हाथी दांत और गुलामों के व्यापार का मार्ग खोल दिया। यह एक ऐसी शुरुआत थी जिसने इस छोटे से देश को अफ्रीका और लैटिन अमरीका में बहुत बड़े-बड़े उपनिवेश दिए। लेकिन देश में आर्थिक ढांचा इस लाभ को गति और स्वरूप प्रदान करने में सक्षम नहीं था। इसलिए आधुनिक युग के प्रारंभ में पुर्तगाल की सफलताएं चार दिन की चॉदनी सिद्ध हुई।

यूरोप के उत्तर में स्कैंडेनेविया प्रायद्वीप में डेनमार्क, नार्वे और स्वीडन के राज्य थे यहां के लोगों ने मध्ययुग में पश्चिमी यूरोप को त्रस्त किया था लेकिन वहीं घुल-मिलकर रह गए थे। इसलिए इनका जीवन भौगोलिक सीमाओं के कारण अधिकतर अपने में सम था। डेनमार्क की इस पूरे क्षेत्र पर प्रभुता क्षीण होने लगी थी। पहले स्वीडन और फिर नावें में राष्ट्रीय चेतना के विकास के कारण राष्ट्रीय राजतंत्र की स्थापना हुई। वहां धर्म के क्षेत्र में भी परिवर्तन हुए लेकिन इस क्षेत्र का आर्थिक जीवन अभी आधुनिक बनने के लिए तैयार नहीं था। वैज्ञानिक विकास के बाद के दौर में ही इस क्षेत्र का वास्तविक आधुनिकीकरण संभव हो सका। सत्रहवीं शताब्दी में स्वीडन की सामरिक सफलता इसीलिए स्थाई महत्व नहीं प्राप्त कर सकी।

अधिकांशतः फ्रांस की सीमाएं मध्ययुग में ही निश्चित हो चली थीं। उत्तर-पश्चिम में इंगलिश चैनेल, पश्चिम में अटलांटिक महासागर, दक्षिण-पश्चिम में पिरेनीज के पहाड़, दक्षिण में भूमध्य सागर, पूरब में आलप्स पर्वत की श्रृंखलाएं और उत्तर-पूरब में राइन नदी को घाटी से घिरे अधिकांश क्षेत्र पर फ्रांसीसी राजवंश ’कापे’ का राज्य था। राजा का अधिकार सामंतों द्वारा सीमित था। पूरे देश में कानून की समानता नहीं थी। सामंतों की प्रतिनिधि सभा स्टेट्स जनरल का वह महत्व नहीं था जो धीरे-धीरे इंग्लैण्ड की पार्लियामेंट को प्राप्त होता जा रहा था। तेरहवीं शताब्दी में सैंलूई के शासनकाल में पहली बार देश की व्यवस्था संगठित होनी शुरू हुई। लेकिन मूलतः फ्रांसीसी सामंत अपनी रूमानी दुनिया में ही खोए थे। पश्चिम के ईसाई देशों ने जब एशिया में स्थित ईसाई तीर्थस्थानों की पुनर्प्राप्ति के अभियान (क्रूसेड) शुरू किए तो उनमें फ्रांसीसियों की प्रमुखता थी। फ्रांस के मध्य-पूर्व के देशों से अंतरंग संबंधों का प्रारंभ तभी हुआ था।

फ्रांस अपेक्षतया स्वयं में पूर्ण देश था। उसका आर्थिक जीवन कृषि और व्यवसाय के संतुलन के कारण औरों के मुकाबले बेहतर था। सामंतों के संरक्षण में कला जीवित थी। चर्च का महत्व सर्वव्यापी था लेकिन भिक्षु भी ज्ञानार्जन की परंपरा बनाए हुए थे। मध्ययुग के ’गोथिक’ शैली में बने विख्यात गिरजाघरों का निर्माण इस बात का प्रमाण है कि फ्रांस में कला का स्रोत शुष्क नहीं हुआ था। इस प्रकार पंद्रहवीं शताब्दी का फ्रांस शक्तिशाली राष्ट्रीय राजतंत्र और व्यापक व्यावसायिक उपलब्धियों की ओर उन्मुख था।

यूरोप महाद्वीप से इंगलिश चैनेल द्वारा विभाजित द्वीप-समूह में आयरलैंड एक अलग द्वीप था। दूसरे बड़े द्वीप पर वेल्स, स्काटलैंड और इंग्लैंड तीन अलग-अलग देश थे। इनकी भाषाएं, परंपराएं और शासनतंत्र भी अलग थे। इनमें इंग्लैंड सबसे सक्षम और संभावना संपन्न देश था। मध्ययुग में ही दो समानांतर स्थितियां स्पष्ट हो रही थीं। एक ओर सामंत शक्ति का प्रदर्शन कर रहे थे और उन्होंने पादरियों तथा नगर के धनिकों के साथ मिलकर अपनी 1215 में इंग्लैण्ड के शासक जान की ’सामंती, धार्मिक और म्युनिसिपल’ विशेषाधिकार देने पर मजबूर कर दिया था। राजा की स्वेच्छाचारिता पर इस चार्टर ने, जिसे ‘मैग्नाकार्टा’ कहते हैं, इंग्लैंड में ऐसा अंकुश लगाया कि वहां जन प्रतिनिधित्व का प्रशासन में महत्व बढ़ता ही गया और वहां की पार्लियामेंट संसदीय व्यवस्था के क्षेत्र में अग्रणी और सर्वप्रमुख बन गई। दूसरी ओर राजा की शक्ति राष्ट्रीय एकता के माध्यम और प्रतीक के रूप में बढ़ने लगी। इंग्लैंड में 1455 से 1485 के बीच यॉर्क और लैंकेस्टर के दो राजवंशों के बीच युद्धों की एक श्रृंखला चली थी। इन दोनों राजवंशों का प्रतीक गुलाब था, इसलिए इस युद्ध को गुलाबों का युद्ध कहा जाता है। यॉर्क के घराने का प्रतीक सफ़ेद गुलाब था, जबकि लैंकेस्टर के घराने का प्रतीक लाल गुलाब था। पंद्रहवीं शताब्दी में दो सामंत परिवारों में वर्षों से चले आ रहे इस युद्ध के अंत के बाद ट्यूडर वंश के हाथ में सत्ता आ गई। इसी वंश के शासनकाल में इंग्लैंड ने राष्ट्रीय चेतना, विकासोन्मुख मध्यवर्ग, धार्मिक परिवर्तन और प्रगतिशील दृष्टिकोण के आधुनिक युग में प्रवेश किया।

पूर्वी यूरोप की दुनिया कई अर्थों में भिन्न थी। आधुनिक मास्को के आस-पास फैली छोटी-सी मस्कोवी की रियासत केवल भौगोलिक स्थिति के कारण यूरोप में समझी जा सकती थी। यहां के लोग और यहां का शासनतंत्र पूरी तरह मध्य एशियाई लगते थे लेकिन इनका सैनिक संगठन बहुत शक्तिशाली था और यही बाद में इनके विस्तार का आधार बना। अठारहवीं शताब्दी आते-आते यह छोटा-सा राज्य रूसी साम्राज्य के रूप में पूरे उत्तरी यूरोप और एशिया पर छा गया। फिर भी यह यूरोप के पिछड़े देशों में ही गिना जाता रहा क्योंकि यहां आधुनिकता के तत्व अनुपस्थित थे। 1917 की क्रांति के बाद ही रूस का सही अर्थों में आधुनिकीकरण हो सका।

पोलैंड एक विस्तृत राज्य था लेकिन वहां सामंतों की आपसी कलह और प्राकृतिक सीमा का अभाव निरंतर कमजोरी का कारण बना रहा। इसीलिए वहां का विघटित राज्य और परंपराबद्ध जनता आधुनिकता को स्वीकार नहीं पाई और बाद में महात्वाकांक्षी पड़ोसियों ने उसे एकदम से हड़प डाला।

पूर्वी यूरोप का सबसे महत्वपूर्ण राज्य था ’बाइजेंटाइन साम्राज्य’ जिसका आधिपत्य एशिया तक फैला हुआ था। रोमन साम्राज्य और रोमन कैथोलिक चर्च की परंपराओं को पूरब का पुट देकर यहां के शासकों ने मध्ययुग में पश्चिमी यूरोप से इस क्षेत्र को अधिक जीवंत बना रखा था। इस साम्राज्य के शासक अपने को प्राचीन रोमन साम्राज्य का गौरवशाली उत्तराधिकारी मानते थे- पवित्र रोमन साम्राज्य से भी अधिक श्रेष्ठ। इसी प्रकार इस क्षेत्र का धर्म भी ’ग्रीक आर्थोडॉक्स चर्च’ था जो उसी प्रकार अपने को कैथोलिक चर्च से अधिक श्रेष्ठ और मौलिक मानता था जैसे बौद्ध धर्म की हीनयान शाखा के लोग महायानियों से अपने को अधिक सही और बेहतर मानते रहे हैं। इस चर्च के सर्वोच्च अधिकारी ’पैट्रिआर्क’ को वही दर्जा प्राप्त था जो रोम के पोप को। पैट्रिआर्क और सम्राट दोनों की राजधानी कुस्तुनतुनिया थी जो मध्ययुग में निश्चित ही यूरोप का सबसे भव्य, गरिमामय और बड़ा नगर था। यहां के विद्वानों ने यूनान और रोम का सारा ज्ञान संजोकर रखा था और पूरब, विशेषकर अरब जगत से संपर्क के कारण उसे और समृद्ध किया था। लेकिन इस साम्राज्य में भी स्थिरता के साथ गतिहीनता आ गई थी। विकास की अपेक्षा सुरक्षा पर बल देने के कारण समाज अनुदार हो गया था। यही कारण है कि यह साम्राज्य पड़ोस के एशिया में तुर्कों की बढ़ती शक्ति का मुकाबला नहीं कर पाया और धीरे-धीरे परास्त होता गया। 1453 में स्वयं राजधानी पर तुर्कों का कब्जा हो गया और साम्राज्य विघटित तथा समाप्त हो गया। ग्रीक चर्च का केंद्र भी रूस हो गया। यह एक विडंबना है कि जहां मध्ययुग तक आधुनिक युग के स्रोत सुरक्षित थे वहीं आधुनिक युग के प्रारंभ के साथ ही सब कुछ समाप्त हो गया।

यूरोप की कहानी एशिया के हस्तक्षेप के बिना अधूरी रह जाती है। आधुनिक युग की पूर्व संध्या पर यूरोप का परिचय एशियाई तुर्की की भूमिका से परिचित हुए बिना अधूरा रह जाएगा। एशिया के पश्चिम में स्थित तुर्किस्तान के पहाड़ी और पठारी क्षेत्रों में चौदहवीं शताब्दी में एक ऐसी शक्ति का उदय हुआ जिसने सौ वर्षों से ही पश्चिमी यूरोप तक के क्षेत्र को आक्रांत कर अपने प्रभुत्व में ले लिया। कठोर सैनिक संगठन और इस्लाम के प्रचार के सहारे उन्होंने संख्या में कम होते हुए भी एक विशाल सेना बना ली और उसके द्वारा अभूतपूर्व साम्राज्य की नींव रख दी। जबरदस्ती विवाह, गुलामी और प्रसिद्धि का लालच उनके विस्तार का आधार बने। बचपन से ईसाई लड़कों को छीनकर उन्हें उस तरह शिक्षित किया जाता था कि उन्हें अपना व्यक्तिगत जीवन, पत्नी, परिवार, घर आदि, भूल जाना होता था। कट्टर मुसलमानों की तरह ये लोग जिन्हें ’जैनिसरी’ कहते थे, अल्लाह और अपने सुल्तान के नाम पर संहार और विस्तार के वाहक बने तुर्क साम्राज्य का विस्तार करते फिरते थे। इनका तंत्र कितना खोखला था यह तब सिद्ध हुआ जब पंद्रहवीं शताब्दी के प्रारंभ में (1402) ’तैमूरलंग’ ने इनके शासक ’बायाजिद’ को न केवल परास्त किया बल्कि उसे कैद भी कर ले गया। एशिया का साम्राज्य छिन-भिन्न हो गया। लेकिन इससे इनकी दिशा यूरोप की ओर निर्धारित हो गई।

इन पचास वर्षों में उनका प्रभाव बढ़ता गया और अंत में बाइजेंटाइन साम्राज्य इसलिए ध्वस्त हो गया क्योंकि राज्यशक्ति सक्षम नहीं थी और धर्म की शक्ति का प्रयोग इसलिए नहीं हुआ क्योंकि ईसाई स्वयं विघटित थे। यहां के लोग तूर्कों से अधिक रोमन लोगों से घृणा करते थे। तुर्कों और बाइजेंटाइन साम्राज्य के बीच का संघर्ष कभी धर्मयुद्ध नहीं बन पाया। उल्टे इटली के ईसाई व्यापारी इस ताक में थे कि तुर्क साम्राज्य में व्यापार बढ़ाने का अवसर मिल सकता था। और इस तरह 1453 में तुर्कों ने कुस्तुनतुनिया को हड़पकर एक नई धारा बहा दी।

यूरोप में भीतर तक घुस जाने के बावजूद तुर्क मध्ययुगीन बने रहे। यह एक दिलचस्प बात है कि यूरोप में आने से यूरोप का आधुनिक युग प्रारंभ होता है और बीसवीं शताब्दी में तुर्कों के यूरोप से निकाले जाने के बाद ही स्वयं तुर्की का आधुनिक काल प्रारंभ हो पाया।

यूरोप के विभिन्न राज्यों के इस संक्षिप्त सर्वेक्षण से यह स्पष्ट हो गया होगा कि पूरे यूरोप में हर कहीं स्थ्तिियॉं असमान थी और आधुनिक युग में प्रवेश की तैयारी एक जैसी नही थी। 

आर्थिक स्वरूप -

मध्ययुगीन यूरोप के आर्थिक संगठन की नींव ’गिल्ड’ (ळनपसके) नामक व्यापारिक संस्थाएँ थीं। इन्हीं संस्थाओं के हाथों में समस्त व्यापार-वाणिज्य एवं कला-कौशल का संचालन तथा नियन्त्रण था। कालान्तर में गिल्ड (ळनपसके) नामक संस्थाओं के अतिरिक्त कारीगरों एवं कलाकारों ने भी अपनी संस्थाएँ स्थापित कीं। मध्ययुगीन गिल्ड एवं कारीगरों की संस्थाओं के कार्य-क्षेत्र एवं साधन अत्यन्त सीमित थे। उन दिनों व्यापार-वाणिज्य, कला-कौशल, उत्पादन, वितरण एवं क्रय-विक्रय सभी इन संस्थाओं के निश्चित एवं कठोर नियमों से संचालित तथा नियन्त्रित थे। सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में अपनी आन्तरिक दुर्बलताओं तथा पारस्परिक प्रतिद्वन्द्विता के परिणामस्वरूप इन व्यापारिक एवं कारीगरों की संस्थाओं का ह्रास हो रहा था। यूरोप एवं पूर्वी देशों का व्यापारिक सम्बन्ध सदैव बना रहा। मध्ययुग में इटली के कुछ प्रमुख नगर-राज्यों, जैसे वेनिस, जिनेवा एवं पिसा इत्यादि के माध्यम से यूरोप तथा एशिया एवं पूर्वी देशों के बीच व्यापार होता था। तुर्की के विरुद्ध धर्म-युद्ध (ब्तनेंकमे) के परिणामस्वरूप वेनिस वालों के हाथों में समस्त व्यापारिक एकाधिकार आ गये थे।

मध्ययुग में यूरोप तथा पूर्वी देशों के बीच व्यापार का मुख्य केन्द्रस्थल कुस्तुनतुनिया का राज्य था। यूरोप के व्यापारी एवं सुदूर-पूर्वी देशों से मिर्च, मसाले, बहुमूल्य हीरे, जवाहरात, सिल्क, रेशमी कालीन, शक्कर, सुगन्धित वस्तुएँ, औषधियाँ इत्यादि मँगवाते थे। दूसरी ओर वे पूर्वी देशों से ऊनी कपड़े, टीन, तांबा और सीसा इत्यादि का निर्यात करते थे। मध्ययुग के उतरार्द्ध में यूरोपीय व्यापार-वाणिज्य की तेज गति से उन्नति होने लगी। मध्ययुग के अन्त में भारत एवं चीन का माल सामुद्रिक मार्ग से फारस की खाड़ी तक आता था एवं तत्पश्चात् स्थलमार्ग द्वारा कुस्तुन्तुनिया के माध्यम से यूरोप पहुँचता था। उन दिनों व्यापारिक मार्ग बड़े कष्टदायक एवं आपत्तिपूर्ण थे। व्यापारी जहाजों एवं काफिलों को लुटेरे प्रायः लूटते थे। इसके अतिरिक्त मार्ग में अनेक प्रकार की चुंगियाँ ली जाती थीं। इटली के प्रमुख व्यापारिक राज्य व्यापार की सुरक्षा के लिए प्रबन्ध करते रहते थे। इसी युग में उत्तरी अफ्रीका के अरबों के साथ फ्रांस, इंगलैण्ड एवं इटली के नगर-राज्यों का व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित हुआ।

पन्द्रहवीं सदी के मध्य में कुस्तुन्तुनिया के पतन एवं पूर्वी यूरोप की ओर विनाशकारी तुर्कों की प्रगति के परिणामस्वरूप यूरोप एवं पूर्वी देशों के बीच व्यापारिक सम्बन्धों का विच्छेद हो गया। अतः अब पूर्वी देशों के साथ व्यापार-सम्बन्ध पुनः स्थापित करने एवं यूरोपीय उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु नये व्यापारिक मार्गों की खोज बड़े वेग एवं उत्साह से होने लगी। इसी खोज के परिणामस्वरूप सन् 1492 में कोलम्बस ने अटलाण्टिक महासागर की खतरनाक यात्रा के उपरान्त अमेरिका की खोज की एवं सन् 1498 में वास्को-डि-गामा उत्तमाशा-अन्तरीप का चक्कर काटकर भारतीय बन्दरगाह कालीकट आ पहुँचा। इन नवीन भौगोलिक खोजों एवं व्यापारिक मार्गों के कारण अरबों एवं वेनिस के व्यापारिक एकाधिकार को बड़ा धक्का लगा। मध्ययुग के उत्तरार्द्ध में इन नये व्यापारिक मार्गों, नये व्यापार-क्षेत्र, नये आर्थिक साधन एवं नयी व्यापारिक वस्तुओं के परिणामस्वरूप व्यापारियों एवं कारीगरों की श्रेणियाँ सर्वथा पतनोन्मुख हो गयीं। अब बड़े पैमाने पर, अपार साधनों द्वारा एवं व्यवस्थित, सुनिश्चित तथा वैज्ञानिक आधारों पर आधारित व्यापार-वाणिज्य, उद्योग-धन्धे, उत्पादन, वितरण, क्रय-विक्रय की आवश्यकता हुई। अतः बैंकों की स्थापना हुई, ज्वॉइण्ट-स्टॉक कम्पनियाँ खोली गयीं, बड़े पैमाने पर उत्पादन, वितरण, क्रय-विक्रय होने लगे, बड़े-बड़े कल-कारखाने स्थापित हुए एवं राष्ट्रीय व्यापार तथा उद्योग-धन्धों के विकास एवं सुरक्षा के लिए राजकीय नियम और विधान बनने लगे। इस प्रकार पूँजीवाद का प्रारम्भ हुआ। नये व्यापारिक मार्गों की खोज और उनके परिणामस्वरूप जो व्यावसायिक तथा व्यापारिक परिवर्तन हुए, उन्हें ’व्यापारिक क्रान्ति’ कहते हैं। इन नये परिवर्तनों के परिणामस्वरूप ही यूरोपीय राज्यों द्वारा सुदूरस्थ देशों में उपनिवेश स्थापित किये जाने लगे। अतः कालान्तर में साम्राज्यवाद का विकास होने लगा ।

मध्ययुग के अन्त में नये-नये एवं शक्ति तथा साधन-सम्पन्न नगरों का उत्थान बड़ा महत्वपूर्ण माना जाता है। मध्ययुग के प्रारम्भ में, सामन्तों एवं जागीरदारों के दुर्गों या मठों के समीप छोटे-छोटे नगर बसे हुए थे। प्रारम्भ में ये नगर सामन्तों के अधीन थे और नगर के निवासियों से सामन्तगण अनेक प्रकार के कर लिया करते थे। परन्तु मध्ययुग के उत्तरार्द्ध में, नवीन भौगोलिक खोजों, व्यापारिक उन्नति, कला कौशल की वृद्धि, उद्योग-धन्धों के विकास एवं तत्जनित व्यावसायिक परिवर्तनों के परिणामस्वरूप इन नगरवासियों की सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक स्थिति बड़ी सुदृढ़ एवं प्रभावपूर्ण हो गयी। अब नगरवासी, व्यापारी एवं मध्यम वर्ग के लोग सामन्तों के नियन्त्रणों से सर्वथा स्वतन्त्र हो गये। धीरे-धीरे, सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में यूरोप में अनेकानेक नगर स्थापित हुए। मध्ययुग के उत्तरार्द्ध में कृषि-प्रधान समाज का रूप बदल गया, सामन्तों की अवनति होने लगी एवं नगरवासियों ने एक नये समाज की स्थापना कर ली। नगरवासियों के इस नये समाज में नवचेतना, नवीन स्फूर्ति एवं उत्साह था।

मध्ययुग के उत्तरार्द्ध में नये, शक्तिशाली तथा प्रभावशाली नगरों के उत्थान के कई महत्वपूर्ण परिणाम हुए। राजनीतिक दृष्टि से सर्वथा जागरूक एवं चैतन्यशील नगरवासियों ने सामन्तों के नियन्त्रण से स्वतन्त्रता-प्राप्ति हेतु प्रयास आरम्भ कर दिये क्योंकि राजाओं और सामन्तों की आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति नगरवासियों द्वारा ही हो सकती थी, अतः धीरे-धीरे जर्मनी और इटली में कई स्वतन्त्र नगर-राज्य स्थापित हो गये। दूसरी ओर, फ्रांस एवं इटली के नगरवासियों ने व्यापार-वाणिज्य की उन्नति एवं आन्तरिक शान्ति स्थापना के उद्देश्य से सामन्तों के विरुद्ध राजाओं का साथ दिया। अतः फ्रांस और इंगलैण्ड में सामन्तशाही व्यवस्था की समाप्ति एवं शक्तिशाली राजतन्त्रों की स्थापना होने लगी। सामाजिक दृष्टि से यूरोपीय समाज के संगठन एवं स्वरूप में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। व्यापार और वाणिज्य की उन्नति एवं धन की वृद्धि के कारण अब नगर के मध्यम वर्ग के लोग समाज में काफी महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली समझे जाने लगे। अब कृषि-प्रधान समाज का स्वरूप बदल गया और उसका स्थान धन-सम्पन्न नवीन चेतनायुक्त और शिक्षित मध्यम वर्ग ने ग्रहण कर लिया। आर्थिक दृष्टि से भी नगरों के उत्थान के कई परिणाम हुए। नगरवासियों ने अपने हितों एवं उद्देश्यों के रक्षार्थ अपनी श्रेणियाँ स्थापित कर लीं। इनके माध्यम से उत्पादन एवं वितरण की व्यवस्था, क्रय-विक्रय के नियम तथा व्यापारिक हितों की सुरक्षा की व्यवस्थाएँ की जाती थीं। परिणामस्वरूप, यूरोप के विविध देशों में व्यापार, धन और कला-कौशल की वृद्धि हुई।

सांस्कृतिक स्वरूप -

मध्ययुग के उत्तरार्द्ध में यूरोपीय संस्कृति का स्वरूप मुख्यतया धार्मिक था। शिक्षा का नियन्त्रण रूढ़िवादी एवं अप्रगतिशील चर्च के हाथों में था। प्राथमिक से उच्चतम, समस्त शिक्षा पर चर्च का पूर्ण नियन्त्रण था। शिक्षा मुख्यतया धर्म-प्रभावित थी। उन दिनों शिक्षा के क्षेत्र में कोई विचार-स्वातन्त्र्य या वैज्ञानिक शिक्षण-पद्धति न थी। विचार-स्वातन्त्र्य के अभाव एवं विज्ञान के अध्ययन की उपेक्षा के कारण मनुष्य का मानसिक विकास पूर्णतया अवरुद्ध था और उसमें गति या क्रियाशीलता न थी। 

लेकिन इन सब के बावजूद सांस्कृतिक गतिविधियॉं रूकी नही थी। इस दिशा में सीमित क्षेत्र में ही सही, निरन्तर कुछ न कुछ हो रहा था। यह समझा जाता है कि यूनान का साहित्य और दर्शन विस्मृति के गर्त में दब गयी थी और पुनर्जागरण से उनका उद्धार हुआ, सही नही है। यूनान का पतन होने से पूर्व ही अरबों ने यूनान की सारी विद्या अपने पास संजो ली थी। उसे उन्होने पूरब, विशेषकर भारत की विद्याओं से समन्वित करके और धनी बनाया था और मध्यपूर्व से स्पेन तक फैले अपने राज्य में सुरक्षित रखा था। उनके द्वारा स्पेन में स्थापित सारागोसा विश्वविद्यालय के अरब और यहूदी विद्वान प्राचीन विद्याओं में पारंगत थे। यूरोप में 13वीं शताब्दी में महत्वपूर्ण विश्वविद्यालय खोले गये जिनमें सारबान्न (फ्रांस), आक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज (इंग्लैण्ड), और लाइपत्सिंग (जर्मनी) आज भी अग्रगण्य है। लेकिन ये विश्वविद्यालय धर्म के प्रभाव से आक्रान्त थे इसलिए यहॉं उतना विकास नहीं दिखाई पडता जितना कि चौदहवींंंंंंंंं शताब्दी के अरब विचारक इब्नखल्दून की पुस्तक ‘मुकद्दमा में दिखाई पडता है। यदि हम संत टामस एक्वीनास और इब्नखल्दून की तुलना करें तो यूरोप का पिछडापन स्पष्ट हो जायेगा। 

कला के क्षेत्र में भी कुछ उपलब्ध्यिॉं उल्लेखनीय है। यह बात सही है कि पुनर्जागरण के बाद जिस शैली का विकास हुआ उसके उदाहरण आज भी हमें आकर्षित करते है परन्तु तेरहवीं और चौदहवीं शताब्दी में आकाश की ऊॅचाइयों को नापते खूबसूरत मेहराबों में वृक्षों द्वारा बनाये गये प्राकृतिक मेहराबों का अनुकरण करते और अपनी दीवारों पर बाइबिल की कथाओं और ईसाई संत परम्पराओं को मूर्त किये गोथिक शैली के विशाल गिरजाघर किसी भी तरह कम सुन्दर कलाकृति नही है। पेरिस, रैंस और कोलोन के गिरजाघर मध्ययुग की कला चेतना के साक्षी है। इस शैली में बनी ब्रिटिश पार्लियामेण्ट दुनिया की सबसे सुन्दर इमारतों में गिनी जाती है। 

कालान्तर में, नगरों के उत्थान के परिणामस्वरूप यूरोप के सांस्कृतिक जीवन में अनेक परिवर्तन हुए। अब लोग स्वतन्त्र रूप से चिन्तन एवं प्रकाशन करने लगे, धर्म और दर्शन के बीच गठबन्धन क्षीण होने लगा तथा कला एवं साहित्य की उन्नति हुई। लैटिन भाषा का परित्याग होने लगा और लोक-भाषाओं एवं राष्ट्रीय साहित्यों का विकास होने लगा। फलस्वरूप यूरोप के नगर संस्कृति और प्रगति के केन्द्र बन गये तथा चित्रकला एवं संगीत की भी उन्नति होने लगी। 

आधुनिकता के दरवाजे पर खडे यूरोप के समाज-संस्कृति, धर्म, राजनीति और अर्थव्यवस्था का सर्वेक्षण करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि मध्ययुग में भी यूरोप का व्यक्ति क्रियाशील था, उसकी चेतना विभिन्न क्षेत्रों में अभिव्यक्ति पाती थी। हॉं, यह जरूर सच है कि धर्म और सामंतवाद से समाज इतना आक्रान्त था कि व्यक्ति अपने को पूरी तरह मुक्त नही पाता था। चर्च और राज्य, पोप और राजा की मिलीभगत से साधारण जनता का व्यापक शोषण होता था और एक प्रकार से सामाजिक-आर्थिक घुटन बढ रही थी। रचनात्मक शक्तियों की अभिव्यक्ति के मार्ग में अवरोध उत्पन्न किये जाते थे। समाज असहिष्णुता, अंधविश्वास, चमत्कार में आस्था और जडता का शिकार था। जिज्ञासा, चेतना, संघर्ष अपवाद थे, नियम नहीं। पुनर्जागरण ने इन अपवादों का विस्तार किया और मनुष्य समाज का केन्द्र बनने लगा। समाज के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में मूलभूत परिवर्तन हुये। नये जीवनमूल्य अस्तित्व में आने लगे जिससे लोग अधिक से अधिक जिज्ञासु और चेतनशील होने लगे। इस प्रकार बन्धनों से मुक्ति का एक नया दौर प्रारंभ हुआ जो आजतक अनवरत किसी न किसी रूप में जारी है।


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