Khasi Revolt (1829–1833)
The Khasi Revolt was an important tribal resistance against British expansion in the Khasi Hills of present-day Meghalaya. The revolt was led by Tirot Singh, the chief (Syiem) of Nongkhlaw. The British planned to construct a road connecting Brahmaputra Valley with Sylhet, which required them to establish control over Khasi territory. This interference threatened the political independence and traditional rights of the Khasi chiefs.
Initially, Tirot Singh permitted the British to undertake the road project, but tensions increased when the British attempted to strengthen their military and political presence in the region. In April 1829, Khasi warriors attacked a British military party at Nongkhlaw, marking the beginning of open resistance.
The Khasi forces used guerrilla warfare, taking advantage of the difficult mountainous terrain. Several Khasi chiefs and their followers joined the struggle against British authority. Despite their courage and knowledge of the local environment, the Khasi fighters lacked modern weapons and military resources. The British gradually gained the upper hand through military operations and strategic measures.
Tirot Singh continued the resistance for several years but was eventually captured in 1833 and taken to Dhaka, where he died in captivity in 1835.
The revolt is remembered as a significant example of tribal resistance to British colonial expansion and as a symbol of Khasi courage, political autonomy, and defence of traditional rights.
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खासी विद्रोह (1829-33)
पूर्व में जयन्तिया और पच्छिम में गारो पहाड़ियों के बीच 70 मील लम्बा और 50 मील चौड़ा अर्थात 3,500 वर्गमील का पहाड़ी अंचल है जहाँ बहादुर और लड़ाकू खासी जनजाति के लोग रहते थे। अंग्रेजों के अधिकार के पहले यहाँ खसियों के 30 राज्य थे। इन खसिया राज्यों के प्रधान या सरदार असीम शक्ति सम्पन्न राजा न थे। वे हर गणतंत्र के चुने हुए प्रधान थे। हर राज्य की एक परिषद थी जिसकी स्वीकृति लिए बगैर राजा अर्थात प्रधान कोई भी महत्त्वपूर्ण काम नही कर सकता था। ये सब राज्य मिल कर गणतंत्रों के संघ की तरह कार्य करते थे, हालाँकि इस संघ का कोई अध्यक्ष न था।
जब भी कोई प्रश्न या विवाद, चाहे वह उत्तराधिकार का हो या अन्य मामलों पर, उठ खड़ा होता, उनकी परिषद में वह पेश होता, उस पर बहस होती। हर सदस्य को बोलने और वोट देने का अधिकार होता। डेविड स्काट का सहायक कैप्टेन हाइट उनकी परिषद की एक ऐसी ही बैठक में उपस्थित था। उनकी व्यवस्थित, औचित्य और अनुशासनपूर्ण दो दिन की बहस और फिर निर्णय को देख कर उसने स्वीकार किया कि ‘‘किसी यूरोपीय समाज में इससे उत्तम पद्धति उसने नहीं देखी।‘‘ खसिया स्वायत्त शासन की कला में कितने आगे थे, व्हाइट कि स्वीकारोक्ति इसका प्रमाण है।
उनके जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जनतंत्र की पावनता और प्रत्येक साँस में स्वतंत्रता की भावना थी। इसलिए जब ब्रिटिश साम्राजियों ने ऐसी जाति को पराधीन बनाने की तरफ कम उठाये तो उसका विद्रोही बन जाना, मरने-मारने को तैयार हो जाना बिलकुल स्वाभाविक था। खसिया विद्रोह का मूल कारण भी यही था।
1824 में जब दक्षिण असम ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ आ गया, तो डेविड स्काट के मस्तिष्क में असम और सिलहट के बीच सीधी सड़क बनाने का विचार आया, क्योंकि जयंतिया से होकर जाने वाली सड़क बर्मिओं का कब्जा हो जाने के कारण काम में नही आ रही थी। असम और सिलहट को खासी पहाड़ियों से होकर जोड़ने वाली सड़क का बड़ा भारी सैनिक महत्त्व था। इससे दूरी कम हो जाती थी, तीन महीने की यात्रा तीन सप्ताह की हो जाती थी। इस सामरिक आवश्यकता के अलावा स्काट के दिमाग में और भी बातें शामिल थीं। उसका खयाल था कि इस अंचल में अंग्रेजों का प्रभाव स्थापित हो जाने से सिलहट की सीमा पर अशांति पैदा करने वाले खासी सरदार डर जायेंगे, उन पर ब्रिटिश सरकार का आतंक छा जायेगा। उसका यह भी मानना था कि इस सड़क के बन जाने से खासी जनजाति के लोग मैदान के बाजारों में जा सकेंगे और इस तरह खसिया अंचल की सम्पन्नता बढ़ जायगी। स्पष्ट है कि इसके पीछे कई योजनाएॅ और लक्ष्य निर्धारित थे।
यह सड़क दक्षिण असम के सामने बारदुआर से आरंभ होने वाली थी। ब्रिटिश सरकार ने इस अंचल की जमींदारी छत्तर सिंह को दे रखी थी इसलिए उस के पास आवेदन पत्र भेज कर सड़क बनाने की इजाजत माँगी गयी। उसने फौरन इजाजत दे दी और वादा किया कि जरूरत की चीजों को देने की वह भरसक कोशिश करेगा लेकिन पहाड़ी अंचल में छत्तर सिंह का कोई अधिकार न था, वहाँ तो हुकूमत तीरथ सिंह की चलती थी और तीरथ सिंह छत्तर सिंह के साथ-साथ अंग्रेजों के भी विरोधी थे। पहाड़ी अंचल में सड़क बनाने वाले मजदूरों को भी मार डालने की धमकी दी जाती। इसी बीच छत्तर सिंह की मृत्यु हो गयी और सड़क निर्माण का काम कुछ समय के लिए बंद हो गया।
मृत्यु के बाद छत्तर सिंह की जमींदारी के उत्तराधिकार को लेकर झमेला खड़ा हो गया। उसके लिए कितने ही लोग दावेदार थे। खसिया जाति के मुखियों की सभा नंकलो में बुलायी गयी जो तीरथ सिंह के अंचल की राजधानी थी। स्काट भी इस सभा में गया। वह इस सभा में क्यों गया ? डा0 रेवती मोहन लाहिड़ी ‘‘द एनेक्सेशन आफ आसाम‘‘ (असम पर अधिकार) नामक पुस्तक में लिखते हैं कि आपसी मतभेद दूर करने में सहायता के लिए खुद खसिया लोगों ने उसे इस सभा में निमंत्रित किया था और इसके लिए वे सरकार के एक अप्रकाशित गुप्त दस्तावेज का हवाला देते हैं लेकिन स्काट ने क्या सहायता की, इसका उल्लेख वे नहीं करते। इसके विपरित वे लिखते हैं कि दो दिन की स्वस्थ और तर्कपूर्ण बहस के बाद उन लोगों ने एक मत से फैसला किया कि छत्तर सिंह के पाँचवर्षीय भाई रज्जन सिंह को राजा नहीं बनाया जा सकता। रज्जन के बाद छत्तर सिंह के उत्तराधिकारी तीरथ सिंह होते हैं। इसलिए तीरथ सिंह को वहाँ का राजा चुना जाना चाहिए और उनकी मृत्यु के बाद रज्जन सिंह को राज मिलना चाहिए। वे यह भी लिखते हैं कि उनकी परिषद की बैठक देख कर स्काट ने मुक्त कंठ से स्वीकार किया कि सबसे ज्यादा सभ्य देशों में भी इतनी उत्तम संसदीय पद्धति नहीं देखी जाती।
लगता है कि स्काट खुद अंग्रेजों के स्वार्थ के लिए इस बैठक में शामिल होने गया था। वह खसिया सरदारों से अपनी सेना के जाने के रास्ते के लिए इजाजत ले लेना चाहता था। हो सकता है कि अंग्रेज समर्थक कुछ खसिया सरदारों ने उसे इस बैठक में शामिल होने को निमंत्रित किया हो। बहरहाल स्काट ने अपना अनुरोध पेश किया कि राजा अपनी भूमि से होकर ब्रिटिश सेना जाने दे, किन्तु सरदारों ने इसकी स्वीकृति तुरंत देने से इनकार किया क्योंकि उन्हें डर था कि ऐसा करने से पड़ोसी नाराज हो जायेंगे।
लेकिन इसके बाद तीरथ सिंह और अंग्रेजों के बीच एक समझौता हुआ। अपने संबंधियों और परिषद की बैठक में आये सरदारों की सम्पत्ति से तीरथ सिंह ने कंपनी सरकार की प्रजा बनना और उसके संरक्षण में आना स्वीकार कर लिया। उन्होंने ब्रिटिश सेना को अपने राज्य से होकर जाने देने की स्वीकृति दी और उसके लिए रसद-पानी का इंतजाम करने का भी वादा किया। कंपनी सरकार की तरफ से स्काट ने विदेशी शत्रुओं से राजा तीरथ सिंह के राज्य की रक्षा करने का वादा किया। उसने यह भी वादा किया कि अगर किसी पहाड़ी राजा ने उनके राज्य पर बिना किसी उकसावे के आक्रमण किया, तो कंपनी सरकार तीरथ सिंह का हर तरह समर्थन करगी। तीरथ सिंह ने स्काट से वादा करवाया कि उनके राज्य के आंतरिक प्रशासन में ब्रिटिश सरकार किसी भी तरह का हस्तक्षेप न करेगी और खुद वादा किया कि कालियाबार के पड़ोस में कंपनी को कोई युद्ध करना पड़ा तो वे अपने आदमी लेकर कंपनी सरकार की मदद करने जायेंगे।
स्काट सड़क के निर्माण में राजा तीरथ सिंह का ज्यादा सक्रिय सहयोग चाहता था, लेकिन सरदारों के मस्तिष्क में 1825 की घटना काम कर रही थी। उस वक्त सिलहट जिले में ब्रिटिश अफसरों ने बहुत से भिखारियों को पकड़ कर ब्रिटिश सेना में कुली का काम करने को बाध्य किया था। इसलिए मजदूर जुटाने का कोई लिखित समझौता कंपनी सरकार के साथ करने से उन्होंने इनकार किया ।”
फिर भी देखा गया कि संधि में सड़क बनाने में मदद वाली धारा जोड़ दी गयी; लेकिन इस संबंध में सरदारों की स्वीकृति नहीं ली गयी। इससे उनमें असंतोष बढ़ा और उसी का परिणाम नकलो का हत्याकांड हुआ। राजा तीरथ सिंह के स्वाधीन राज्य की सीमा असम के मैदानी हिस्से तक जाती थी। सेमांग मापलुंग, और चेरापुंजी के राजाओं के अंचल से बाकी सड़क जाती थी। चूँकि ये राजा अपने अंचल से होकर सड़क ले जाने की इजाजत पहले ही दे चुके थे, इसलिए तीरथ सिंह के साथ समझौते के बाद उसके निर्माण की सारी बाधाएँ दूर समझी गयीं। इस समझौते पर बड़े लाट ने अपनी मुहर लगायी और सम्मान प्रदर्शन के लिए राजा तीरथ सिंह को असमिया राज्य की पालकी भेंट की। यह उस वक्त बहुत बड़ा सम्मान माना जाता था । सड़क का बनना आरंभ हो गया। स्काट की योजना के अनुसार नेकलो में एक सैनीटोरियम बन गया जहाँ जाकर अंग्रेज स्वास्थ्य लाभ करने लगे। अंग्रेजों के और भी बँगले बने किन्तु इस ऊपरी शांति के नीचे कौन सा ज्वालामुखी धधक रहा है, इसका अनुमान अंग्रेज अधिकारी न लगा सके। उन्हें होश तब आया जब नंकलो में अंग्रेज और कंपनी के चाकर बंगाली बाबू काट कर रख दिये गये। छत्तर सिंह के राज्य को पाने के बाद ही तीरथ सिंह ने देखा कि उसकी आय नाकाफी है और कंपनी सरकार ने राजस्व इतना ज्यादा लगा दिया है कि उसका देना असंभव है। अहोम राज में उन्हें एक पाई भी नियमित वार्षिक राजस्व न देना पड़ता था इसलिए कंपनी सरकार का राजस्व उन्हें भार मालूम होने लगा।
इसी समय अंग्रेजों से उनके चिढ़ जाने के और भी कारण सामने आ गये। तीरथ सिंह और रानी के राजा बलराम सिंह के बीच झगड़ा चल पड़ा और उसने क्रमशः उग्र रूप धारण किया। तीरथ सिंह ने संधि की चौथी धारा के अंतर्गत अंग्रेजोेें से मदद माँगी, किंतु स्काट ने यह मदद देने से इनकार कर दिया। इसका कारण बताया गया कि रानी के राजा के राज्य में हत्याकांड और लूटपाट की क्षतिपूर्ति का निर्देश स्काट ने तीरथ सिंह को दिया था, किंतु यह निर्देश पूरा नहीं किया गया। यानी यह सिद्ध किया गया कि लड़ाई तो खुद तीरथ सिंह उकसा रहे हैं, इसलिए कंपनी सरकार उनकी मदद नहीं कर सकती।
दिसंबर 1828 में एक घटना और घटी। राजा तीरथ सिंह ने असम की घाटी में रानी के राजा की जमीन पर आक्रमण के लिए सेना इकट्ठा की लेकिन दक्षिण असम के भारप्राप्त कैप्टेन ह्वाइट ने उसकी रक्षा के लिए अपने कुछ सिपाही भेज दिये। यह खुल कर तीरथ सिंह का विरोध और रानी के राजा का समर्थन था। स्वभावतः तीरथ सिंह ने इसे अपने साथ विश्वासघात समझा ।
तीरथ सिंह की नाराजगी का एक कारण और भी था। उनके राज्य में अंग्रेज ने इमारतें बनवायी थीं। कंपनी सरकार के अधिकारी यहाँ अपने वैभव और अधिकार का बड़ा प्रदर्शन करने लगे। वे तीरथ सिंह को खसियों की ही नजर में गिराने की चेष्टा करने लगे। कंपनी के नौकर-चाकर खासी जनजाति के लोगों पर रोआव गाँठने लगे। वे धमकाने लगे कि सड़क बन जाने पर उन पर टैक्स लादे जायेंगे। इन सबसे तीरथ सिंह के साथ-साथ सरदारों और आम खसियों का नाराज होना बिलकुल स्वाभाविक था। उनके ही राज्य में उनकी इजाजत से आकर ये परदेशी उनके साथ अपमानजनक व्यवहार करें, यह खसियों के लिए बर्दाश्त के बाहर की बात हो गयी और ये अंग्रेजों को मार भगाने की योजना बनाने लगे।
मोलिम एक खसिया राज्य था। उसके राजा बार मानिक ने अन्य पहाड़ी राजाओं से सलाह लेकर अंग्रेजों को मार भगाने की योजना बनायी तथा तीरथ सिंह और उनके संबंधियों की इसमें शामिल होने को निमंत्रित किया। उनका लक्ष्य असम से अंग्रेजों को भगा कर यहाँ पुराने राजवंश के किसी आदमी को राजा बनाना था। वे उम्मीद करते थे कि मदद के बदले उन्हें इस राजा से कलंग नदी तक का अंचल मिल जायगा। वे इस तरह अपनी स्वाधीनता की रक्षा कर सकेंगे और अपना राज्य भी बढ़ा सकेंगे। मार्च 1829 के अंत में चेरापुॅजी जाते समय स्कार नकलो पहुंचा तो उसे इस खतरे का आभास मिल गया। उसे पता चल गया कि अगस्त्रों को दक्षिण असम से निकाल बाहर करने के लिए बार मानिक ने आसपास के सभी पहाड़ी राजाओं के पास दूत भेजे हैं और युद्ध के लिए अपने सैनिक भेजने का अनुरोध किया है। बार मानिक के ब्रिटिश विरोधी कार्यों की रिपोर्ट कंपनी सरकार के पास पहुँच चुकी थी। गवर्नर जनरल ने उनके खिलाफ कड़ी कार्यवाही का आदेश स्काट को दिया था। इसलिए वह तेजी से चेरापुंजी की ओर निकल गया। उसकी योजना थी कि सिलहट की सेना लेकर वह बार मानिक को धर दबोचेगा और ऐसा करने से दूसरे पहाड़ी सरदार भी डरकर चुप हो जायेंगे लेकिन उसके आघात करने के पहले ही विद्रोहियों ने आघात किया ।
4 अप्रैल 1829 को नंकलो हत्याकांड हुआ जिसे खसियों के एक जत्थे ने गारो लोगों के साथ मिल कर किया। उस वक्त नंकलो में तीन अंग्रेजों- लेफ्टिनेन्ट बेडिंगफील्ड, लेफ्टिनेन्ट बर्लटन और मि0 बोमैन की उपस्थिति का जिक्र मिलता है। इनके अलावा कुछ हिन्दुस्तानी सिपाही, बंगाली बाबू और ठेकेदार भी वहाँ पर थे। अंग्रेज इतिहासकारों के अनुसार, लेफ्टिनेंट बेडिंगफील्ड को एक सम्मेलन के लिए बुलाया गया और ज्योंहि वह पहुँचा, उसे मार दिया गया। बर्लटन संदेहवश उस सम्मेलन में नहीं गया था। उसने अपने चार सिपाहियों के साथ रात भर अपने बंगले की रक्षा की और सबेरे असम की तरफ भाग जाने की चेष्टा की। शाम तक वे भागते रहे, लेकिन विद्रोहियों ने उन्हें जा पकड़ा और मौत के घाट उतार दिया। सिर्फ एक सिपाही बच कर जा सका। नंकलो में जितने भी बंगाली मिले, मारे गये; लेकिन असमिया अमलाओं को छोड़ दिया गया।
कैप्टेन पेम्बर्टन के अनुसार नंकलो के हत्याकांड का फौरी कारण एक बंगाली चपरासी की बातें थीं। खसियों के साथ उसका झगड़ा हो गया तो उसने धमकाया कि स्काट इसका पाई-पाई बदला चुकायेगा। खसियों पर वही टैक्स लगाया जायगा, जो समतल भूमि के लोगों पर लगाया जाता है। कंपनी के नौकरों-चाकरों के उद्दण्ड व्यवहार से असंतुष्ट खसिया इससे भड़क उठे। इसके कारण पर प्रकाश डालते हुए विल्सन ने लिखा है कि - ‘‘यूरोपियनों की उपस्थिति और पहाड़ियों से होकर उनका आवागमन सभी वर्गों को एकदम नापसंद था। खसिया लोगों के साथ देशी छोटे अफसरों की जबर्दस्ती और उद्दण्डता ने खसियों की, जिन्हें वे सड़कों और छावनियाँ बनाने में मजदूरी करने को बाध्य करते, इस भावना को बढ़ा दिया।“
नंकली के सरकारी बंगले को उसके सारे माल असबाब समेत खसियों ने जला कर खाक कर दिया, जिन्हें पकड़ कर सड़क बनाने के काम में लगाया गया था, उन्हें मुक्त कर दिया। इसके बाद वे स्काट की तलाश में चेरापुंजी की तरफ चले। इस तरह यह विद्रोह आरंभ हुआ। यह सारे खसिया अंचल में विद्रोह का झण्डा बुलंद करने का संकेत था। इस विद्रोह के प्रधान नेता तीरथ सिंह, बार मानिक और मोसिंग के मुकुंद सिंह थे। इन्हीं मुकुंद सिंह के पूर्वज आबू सिंह थे जिनका आक्रमण 1790 में खसिया युद्ध का तात्कालिक कारण बना था। उस युद्ध के परिणामस्वरूप खसियों को सिलहट के मैदान से हट आना पड़ा था। मुकुन्द सिंह की आँख इस मैदान पर गड़ी हुई थी।
विद्रोही नेताओं ने सिर्फ खसिया जाति की शक्ति पर ही निर्भर न कर अन्य मित्र भी इकट्ठा करने की चेष्टा की। प्राप्त दस्तावेज बताते हैं कि तीरथ सिंह ने अंग्रेजों को मार भगाने की व्यापक तैयारी की थी। जिस सजगता और राजनीतिक जागरूकता का परिचय उन्होंने दिया, उन जैसे शासक से आशा भी न की जा सकती थी। नंकलो के कैदियों में जो सबसे बुद्धिमान थे, उन्हें चुनकर उन्होंने गारो सैनिकों की संरक्षता में राजा चन्द्रकांत, भूटियों और सिंगफो लोगों के पास भेजा। उनके पास उचित उपहार भेज कर उन्होंने उनका आह्वान अंग्रेजों के जुएँ को उतार फेंकने के लिए किया। उन्होंने चन्द्रकान्त के पास विशेष संदेश भेजा और लिखा कि अंग्रेज पहाड़ियों से मार भगाये गये हैं, आप आगे बढ़िए और हमारी सहायता कीजिए। उन्होंने गुप्त रूप से गारो का एक अन्य दस्ता गोहाटी भेजा ताकि यह पता लगाया जा सके कि वहाँ अंग्रेजों की सेना कितनी है। उनका गुप्तचर विभाग विस्तार के साथ जानकारी प्राप्त कर रहा था जिससे संदेह किया जाता था कि कुछ मुहर्रिर और असमिया तीरथ सिंह के गुप्तचरों की सहायता कर रहे थे। यह विद्रोह सिर्फ खसियों तक ही सीमित नही रहा। यह पच्छिम की तरफ भी फैला और गारो भी मैदान में कूद पड़े। ग्वालपाड़ा जिले पर खतरा आ गया और मजिस्ट्रेट ने कैप्टन ह्वाइट के पास फौरन मदद भेजने को लिखा। असम में आम जनता और सामंतों के अंदर बड़ा असंतोष काम कर रहा था। अगर इस विद्रोह में अंग्रेजों की कहीं बड़ी हार होती तो सारे प्रांत में विद्रोह का ज्वालामुखी फट सकता था। तीरथ सिंह की योजना एक व्यावहारिक व्यक्ति की योजना थी, कल्पनालोक में विचरण करने वालों की नहीं। अंगेंजों को सर्वनाश से बचाने का श्रेय कर्नल लिस्टर के अधीन सिलहट लाइट इन्फैन्ट्री को दिया जाना चाहिए जो अपूर्व वीरता और सामयिक चतुराई दिखा कर खसिया विद्रोह की पहली लहर को रोकने में समर्थ हुई ।
ऐसी हालत में अफवाह फैली कि गारो बड़ी संख्या में पहाड़ियों से उतर कर गोहाटी पर, जो उस वक्त असम की राजधानी थी, आक्रमण करने आ रहे हैं। सिर्फ नागरिकों में ही नहीं, सरकारी अधिकारियों में भी इतना आतंक फैल गया कि उन्होंने नावों में आश्रय लिया और गारो सेना को देखते ही भाग जाने को तैयार हो गये। असम के सामन्त सरदारों में असंतोष इतना फैला हुआ था कि कंपनी के सहायक एजेंट ह्वाइट को दो प्रभावशाली असमिया न मिल रहे थे, जिनकी विश्वासपरायणता पर वह निर्भर कर सकता। चूंकि सामन्त सरदारों के पास हथियार न थे, इसलिए विद्रोह में उनके सक्रिय हिस्सा लेने की आशा न थी, लेकिन फिर भी अंग्रेजों को भय था कि वे कंपनी सरकार के सिपाहियों को फोड़ सकते हैं और विद्रोहियों को सेना संबंधी मूल्यवान समाचार दे सकते हैं।” इसलिए इसे रोकने के लिए अंग्रेज अधिकारियों ने फौरन कदम उठाये।
राजधानी गोहाटी की हालत सँभाल कर ह्वाइट ने खसियों पर एक साथ तीन तरफ से हमला करने की योजना बनायी- एक हमला सिलहट की तरफ से जयन्तिया होकर, और दो हमले असम की तरफ से सिंगमारी और गोहाटी को आधार बना कर। गोहाटी और नंकलो के बीच दूरी लगभग 55 मील थी। गोहाटी से रामरी गाँव की दूरी 18 मील थी और मैदानी रास्ता होने के कारण किसी तरह की कठिनाई न थी । लेकिन कठिन रास्ता रामरी गाँव से नंकलो का था, जिसकी दूरी प्रायः 37 मील थी । कितनी ही पहाड़ियों, घाटियों, जंगलों और नदियों को पार करना पड़ता था । इसके विपरीत सिलहट की तरफ से रास्ता आसान था। सिलहट के पाण्डुआ से चेरापुँजी का एक दिन का रास्ता था और चेरापुँजी से नंकलो 30 मील की दूरी पर था। इधर चढ़ाइयाँ भी कठिन न थी। इसके अलावा असम की तरफ के रास्तों में और भी मुसीबत थी। खसियों ने सड़कों के पुल तोड़ दिये थे। दरख्त गिरा कर सड़कों की नाकेबंदी कर दी थी। इसलिए इधर से हाथियों पर लाद कर रसद लड़ाई का सामान ले जाना मुश्किल था। इसलिए ह्वाइट ने योजना बनायी कि जयन्तिया की तरफ से किया गया आक्रमण मुख्य होगा, गोहाटी और ग्वालपाड़ा की तरफ से आक्रमण सिर्फ खसियों का ध्यान मुख्य आक्रमण से हटाने के लिए होंगे।
वह चढ़ाई तो जल्दी नहीं कर सका, लेकिन उसने खासी पहाड़ियों के चारों तरफ आर्थिक घेरा डाल दिया और उनके साथ व्यापार तथा आवागमन बंद कर दिया। उसने राजनीतिक दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण कदम उठाया। असम के दो भूतपूर्व राजा चन्द्रकांत और पुरन्दर सिंह क्रमशः कालियाबार और गोहाटी में रहते थे। उन्हें देख कर लोगों को पुरानी बातें याद आती थीं और सब असंतुष्ट और विद्रोही उनके झण्डे के नीचे इकट्ठा होने को प्रस्तुत जान पड़ते थे। इसलिए उसने इन दोनों को वहाँ से हटा कर दूर ले जाने की व्यवस्था की।
लेकिन ठीक इसी समय सिलहट की तरफ से बढ़ने वाले कैप्टेन लिस्टर और उसकी सेना ने बड़े मौके की मदद स्काट को पहुँचाई। नंकलो की घटना के दूसरे ही दिन तीरथ सिंह ने 4000 गारो योद्धाओं को स्काट और उसके साथियों को पकड़ने की गरज से चेरापुंजी की तरफ रवाना किया। उनके आक्रमण से स्काट अपने साथियों के साथ चेरापुंजी से भाग कर मौसमी जाने की तैयारी कर रहा था कि तभी लेफ्टिनेन्ट एगरटन और कैप्टेन लिस्टर अपनी सेना के साथ वहाँ जा पहुँचे। अगर ये ऐन मौके पर न पहुँच पाते तो स्काट और उनके साथियों की मृत्यु निश्चित थी और स्काट मर जाता तो ब्रिटिश सम्मान को इतना धक्का लगता कि सारे असम में विद्रोह की अग्नि प्रज्वलित हो उठती और ब्रिटिश राज के अवशेष कहीं खोजे भी न मिलते।
इसके बाद कैप्टेन लिस्टर अपनी सेना के साथ मामलू की तरफ आगे बढ़ा। चेरापुंजी से तीन मील पर स्थित यह स्थान बड़ा महत्त्वपूर्ण था। तीरथ सिंह अपने बहुत से साथियों के साथ यहाँ पर ठहरे थे। अचानक धावा बोल कर कंपनी सेना ने इस स्थान पर कब्जा कर लिया और घरों में आग लगा दी। तीरथ सिंह और उनके साथी पास के जंगल में चले गये। अंग्रेजों की इस सफलता का असर यह हुआ कि मुरांग के सरदार तीरथ सिंह का साथ छोड़ कर अंग्रेजों से मिल गये। चेरापुंजी के राजा दीवान सिंह और खाइरिम के मानिक सिंह पहले ही से अंग्रेजों का साथ दे रहे थे। राजा दीवान सिंह ने तीरथ सिंह से स्काट को बचाने में मदद की थी और फिर मामलू पर कब्जा करने के लिए अंग्रेजों के साथ अपने 100 आदमी भेजे थे।
नंकलो की घटना का समाचार जब कंपनी सरकार की राजधानी कलकत्ता पहुँचा तो सब छोटे-बड़े अंग्रेज अधिकारी आगबबूला हो गये। गवर्नर जनरल ने स्काट को विद्रोहियों को कुचलने के लिए कठोर से कठोर कार्यवाही करने का आदेश दिया। संधि के अनुसार तीरथ सिंह पर कोई भी मुकदमा चलाने का अधिकार अंग्रेजों को नही था लेकिन गवर्नर जनरल ने आदेश दिया कि अगर तीरथ सिंह पकड़े जायें तो उनके साथ युद्ध में पराजित शत्रु की तरह नहीं, बल्कि वह व्यवहार किया जाय जो मृत्युदंड पाने योग्य, खून के प्यासे हत्यारे के साथ किया जाता है। अवश्य ही मोलिम के राजा बार मानिक के साथ व्यवहार स्काट की मर्जी पर छोड़ दिया गया क्योंकि वह स्वाधीन राजा था और उसके साथ कंपनी सरकार की कोई भी संधि न थी। यह आदेश देते समय अंग्रेजों ने विद्रोहियों की शक्ति कम कर आँकी थी। उन्होंने उस वक्त न सोचा था कि आखिर में इन लोगों के साथ उन्हें समझौता करना पड़ेगा।
लिस्टर मामलू से तीरथ सिंह का पीछा करता हुआ आगे बढ़ा, लेकिन उन्हें पकड़ पाना टेढ़ी खीर साबित हुआ। रास्ते के खसिया गाँवों को जलाता हुआ वह नकलो पहुँचा। 2 मई को उस पर कंपनी सेना का कब्जा हो गया। मई के दूसरे सप्ताह असम की तरफ से कैप्टेन ह्वाइट के नेतृत्व में 54वीं पल्टन का एक हिस्सा आ पहुँचा। इस तरह तीरथ सिंह के राज पर कब्जा कर मार्शल ला जारी कर दिया गया। उन्हें पकड़ने के लिए 1000 रु0 के इनाम की घोषणा की गयी। असम हिल इन्फैन्ट्री का लेफ्टिनेंट वेंच इस अंचल का प्रशासक बनाया गया। यह सब करने के बाद 16 मई 1829 को कैप्टेन लिस्टर सेना लेकर बार मानिक की राजधानी मोलिम की तरफ बढ़ा, लेकिन चिड़िया पहले ही उड़ गयी थी। बार मानिक के राज्य पर भी कब्जा किया गया और उनकी भी गिरफ्तारी के लिए 1000 रु0 के पुरस्कार की घोषणा की गयी। लेकिन तीरथ सिंह बड़ी जीवट के आदमी थे। एक हार होती तो वे कमर कसकर फिर लोहा लेने को तैयार हो जाते। बार मानिक और वे बिजली की रफ्तार से एक जगह से दूसरी जगह पहुँचते, नयी सेना इकट्ठा करते और फिर अचानक अंग्रेजों पर टूट पड़ते। सितंबर के मध्य में बार मानिक सिलहट लोकल कोर के एक दस्ते के हाथ पड़ गये। उन्हें हथकड़ी बेड़ी पहना कर मुकदमे के लिए गोहाटी भेज दिया गया। पराजित शत्रु का सम्मान भी साम्राजियों ने उन्हें न दिया। अवश्य ही बाद में उन्हें मुक्त कर दिया गया था और उनका राज्य उन्हें वापस कर दिया गया था, पर उनकी क्षमता कम कर दी गयी थी। तीरथ सिंह अब भी खसिया पहाड़ियों, घाटियों और जंगलों में अंग्रेज साम्राज्यवादियों को चुनौती देते घूम रहे थे।
देशद्रोहियों को अपने देशवासियों के ही खिलाफ संग्राम और भी जोर से चलाने का प्रोत्साहन देने के लिए स्काट ने मई 1830 में खसिया अंचल की कुछ भूमि अपने मित्र सरदारों के बीच बाँटी। इस तरह भारतीयों को भारतीयों के ही खिलाफ लड़ा कर अंग्रेज शासकों ने अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहा और खसियों को गुलामी का पट्टा पहनाना चाहा लेकिन उनके ये सारे प्रयास असफल हुए। स्काट को स्वीकार करना पड़ा कि- "अब तक अविजित जाति को उस जुएँ के, जिसे उसने एक तरह से अपने ऊपर लाद लिया है, अनुकूल बनाने में साधारण से ज्यादा कठिनाइयों का अनुभव करना पड़ेगा। "
इसी बीच पूर्व असम में अंग्रेजों के खिलाफ सामंत सरदारों का दूसरा विद्रोह आरंभ हो गया। प्राप्त रिपोर्ट बताती है कि तीरथ सिंह ने अपना कार्यक्षेत्र बदल दिया था। वे सिंगफो अंचल में चले गये थे और सामंत सरदारों के साथ मिल कर अंग्रेजों के खिलाफ संग्राम चलाने लगे थे। पहाड़ी अंचल में अंग्रेजों के खिलाफ संग्राम पुरजोर जारी रखने का भार उनके एक अन्य योग्य सहायक मानभोट पर आ पड़ा। मानभोट ने युद्ध की नयी शैली अपनायी। उन्होंने सब खसियों को गाँव छोड़कर जंगल में चले जाने का आदेश दिया, ताकि दुश्मन को किसी भी प्रकार रसद न मिल पाये। स्काट ने बड़े वादे कर खसियों को गाँवों में वापस लाने की कोशिश की, लेकिन उसे कोई सफलता नही मिली। जो उसके वादों के चक्कर में पड़ कर आना भी चाहते थे, वे मानभोट के डर से नही आये। बल प्रयोग से काम निकलता न देख स्काट ने विद्रोही सरदारों में फूट डालने का रास्ता अपनाया। उसने ऐलान किया कि अगर बागी सरदार आत्मसमर्पण कर देंगे तो उन्हें माफ कर दिया जायगा। पहाड़ी सरदारों की परिषद ने स्काट के इस प्रस्ताव पर कई हफ्ते तक बहुत बहस की। प्रबल बहुमत ने उसकी शर्तें मानने से इनकार कर दिया, लेकिन कुछ उन्हें मान कर शांति खरीदने को तैयार हो गये। प्रबल बहुमत के सरदारों ने जरा भी ढील न देकर, अपना आक्रमण और भी तेज कर दिया।
जनवरी 1831 के तीसरे सप्ताह में अंग्रेजों की हालत बड़ी नाजुक हो गयी। अपने सरदारों के नेतृत्व में खसियों और गारो ने मिल कर बहुत बड़ी संख्या में आक्रमण किया और अंग्रेजों के हाथ से दक्षिण असम का पच्छिमी हिस्सा छीन लेना चाहा। उन्होंने कई अफसरों को मौत के घाट उतारा, सरकारी आफिसों को नष्ट कर दिया और असम लाइट इन्फैंट्री के दस्ते को, जिसे उनसे लड़ने भेजा गया था, मार भगाया। इसके बाद वे असम के अंदर घुसे। उनकी इस सफलता से दुआर के अंगरेजपरस्तों के मन में आतंक छा गया, वहाँ की रैयत में खुशी छा गयी। बहुत से लोगों ने विद्रोहियों के दल में शामिल हो कर अंग्रेजों पर हमला किया। तभी ग्वालपाड़ा से भेजी गयी सिहबन्दी कोर आ पहुँची। यह विद्रोहियों की अग्रगति रोकने और उन्हें पीछे हटाने में सफल हुई। विद्रोही पीछे हट कर बार दुआर की तरफ चले गये।
विद्रोहियों ने बार दुआर पर कब्जा कर लिया जो सैनिक दृष्टि से बड़ा महत्त्वपूर्ण था। यहाँ से वे मैदानी हिस्से पर किसी भी वक्त टूट पड़ सकते थे। यहाँ की रैयत ने विद्रोहियों का साथ दिया। उसने उन्हें राशन-पानी दिया और उनके साथ मिल कर अंग्रेजों को निकाल बाहर करने का वादा किया। विद्रोहियों की शक्ति देख कर सिहबन्दी का भार प्राप्त अधिकारी कैप्टेन हालसैम उनसे लोहा लेने का साहस न कर सका। कुछ मदद आ जाने के बाद उसने घोषणा कर रैयत को जंगल से अपने गाँव वापस आने का अनुरोध किया और मदद के वादे किये। इसका कुछ परिणाम अंग्रेजों के अनुकूल हुआ और कुछ समय बाद गारो बार दुआर से हट गये। लेकिन कैप्टेन हालसैम की सेना को आगे बढ़कर खसिया विद्रोहियों से भिड़ने की हिम्मत न पड़ी। और भी पच्छिम में असम दुआर की तरफ की गारो पहाड़ियों में एनसाइन ब्रोडी विद्रोही गारों सरदारों का दमन करने में व्यस्त था। उसे काफी सफलता मिली। कंपनी सरकार के रिकार्ड के मुताबिक अपने 42 अंग्रेज सैनिकों के साथ तीन सप्ताह में उसने वह कर दिखाया जिसे सिपाहियों की कई कंपनियाँ तीन महीने में पूरा न कर पातीं। लेकिन एनसाइन ब्रोडी शीघ्र ही अस्वस्थकर जलवायु का शिकार हो गया।
खसिया पहाड़ियों में मानभोट कुछ दिन और लड़ते रहे, लेकिन उनके साथी एक-एक कर उनका साथ छोड़ते गये। कंपनी की सेना उनका पीछा कर रही थी। बड़ी मुश्किल में पड़ कर उन्होंने अक्तूबर 1931 में लेफ्टिनेंट टाउनसेन्ड के हाथ आत्मसमर्पण किया। टाउनसेन्ड ने उनके साथ अच्छा बर्ताव किया और उन्हें खसियों की एक छोटी सी टुकड़ी का सेनाध्यक्ष बना दिया।
किन्तु फिर भी तीरथ सिंह लड़ते रहे। वे कहीं न कहीं से नयी सेना और रसद-पानी पा जाते। यहाँ तक कि अंग्रेजों के मित्रों से भी उन्हें ये चीजें मिल जातीं। कोई भी खसिया पहाड़ियों से होकर सुरक्षित न जा सकता था। इसी बीच खसियों ने छापामार युद्ध कला का सहारा लिया वे छिप कर कंपनी सेना के आने का इंतजार किया करते और ज्योंही आती उस पर यकायक टूट पड़ते। इस आक्रमण के बाद वे फिर गायब हो जाते। इन मुठभेडों में अंग्रेज अधिकारियों ने महसूस किया कि खसियों के पास अच्छी बंदूकें और लड़ाई का अच्छा सामान पहुँच रहा है। उन्हें पता लगा कि खसिया यह सामान सुसंग के राजा के कर्मचारियों के जरिए मैमनसिंह और ढाका से खरीद रहे हैं। उन्हें यह भी पता लगा कि तीरथ सिंह को खुद अंग्रेजों का गढ़ समझे जाने वाले चेरापूँजी से मदद मिल रही है। इन सबसे यह स्पष्ट हो गया कि तीरथ सिंह आत्मसमर्पण करने वाले नहीं है। इस बीच स्काट की मृत्यु अगस्त 1831 में हो गयी और उनका स्थान राबर्टसन ने सँभाला। उसने इस युद्ध को बंद करने के लिए नयी नीति अपनानी चाही। उसने विनम्रता और मैत्रीपूर्ण कार्रवाइयों से खसियों को अपने पक्ष में मिलाना चाहा। उसे उम्मीद थी कि अगर खसियों को विश्वास हो गया कि अंग्रेज सारे खसिया अंचल को गुलाम बनाना नहीं चाहते तो वे आत्मसमर्पण कर देंगे और अंग्रेजों के हाथ खसिया पहाड़ियों का एक हिस्सा बना रहने देंगे। इसलिए उसने मिस्टर. टर्निक को मोसमी के भूतपूर्व राजा मुकुन्द सिंह के साथ समझौते की वार्ता चलाने का आदेश दिया। वार्तालाप चला, लेकिन फल न निकला। राबर्टसन जल्दी ही इस निष्कर्ष पर पहुँच गया कि जब तक तीरथ सिंह जिन्दा या मुक्त रहेंगे, यह विद्रोह न दबेगा। खसिया तीरथ सिंह का साथ देते रहेंगे। उसने देख लिया था कि जो गाँव और सरदार अंग्रेजों के मित्र समझे जाते थे, वे भी तीरथ सिंह की सहायता कर रहे थे, धन और अत्र देकर उनकी मदद कर रहे थे।
जब राबर्टसन ने देखा कि शांतिपूर्ण फैसला उसके मन के अनुकूल न हो सकेगा तो उसने विद्रोह को कुचलने की पूरी तैयारी की। ग्वालपाड़ा में सिहबंदी सेना को जल्दी बुलाया गया। नंकलो में स्थित कैप्टन लिस्टर की शक्ति बढ़ाई गयी। मानों (बर्मी बंदूकधारियों) की एक अतिरिक्त सेना और मनीपुरी घुड़सवारों का एक दस्ता पहाड़ी रास्तों की हिफाजत के लिए फौरन बुलाया गया। सैनिक महत्त्व के स्थानों पर ‘‘पिल बाक्स‘‘ बनाये गये। इसके अलावा राबर्टसन ने आर्थिक घेरा भी मजबूत किया जिसे ह्वाइट ने आरम्भ किया था। उसने सब बाजार बंद कर दिये और सब प्रमुख गाँवों पर कब्जा कर लिया ताकि विद्रोहियों के शिविर में रसद-पानी न पहुँच सके। इस तरह उसने विद्रोहियों को मार भगाने की योजना बनायी। यही नहीं, उसने खसिया पहाड़ियों को अंग्रेजों का उपनिवेश बनाने की योजना भी तैयार की। बर्मा से भागे यूरोपीयनों को वह यहाँ बसाना चाहता था।
चूँकि अंग्रेजी प्रतिनिधियों को यह वादा करने का अधिकार न था, इसलिए वे वापस आने लगे। लेकिन दूसरे दिन जब ये प्रतिनिधि अपने सदर दफ्तर लौटने वाले थे, तभी तीरथ सिंह का दूत आया और उसने एक बैठक का प्रस्ताव दिया। इस बैठक में तीरथ सिंह के दो मंत्री नान सिंह और जीत राय ने हिस्सा लिया। लिस्टर ने प्रस्ताव किया कि अगर खसिया तीरथ सिंह के नाबालिग भतीजे को अपना प्रधान बनाने को तैयार हों, तो उनकी बातों पर कंपनी सरकार विचार कर सकती है। तीरथ सिंह और उनके साथियों को इस प्रस्ताव पर विचार करने का अवसर देकर अंग्रेज प्रतिनिधि अपने अधिकारियों से राय-मशविरा करने वापस आये। इस प्रकार मानिक सिंह की सहायता से 20 सितम्बर 1832 को दूसरा समझौता सम्मेलन हुआ। इस बार तीरथ सिंह को अलग रखा गया और छोटे खसिया सरदारों ने वार्तालाप में हिस्सा लिया। राबर्टसन ने निम्नलिखित शर्तें लिख कर लिस्टर को दीं -
इन प्रस्तावों को राबर्टसन ने बहुत विनम्र बताया। उसने कर्नल लिस्टर को यह भी कहा कि विद्रोही सरदारों को लालच देना कि असम के मैदान में जो भी अंचल उनके हाथ में पहले थे, उन्हें दे दिये जायेंगे। उसने लिस्टर को आदेश दिया कि तीरथ सिंह को अलग रख कर छोटे सरदारों से मिलना। कैप्टन लिस्टर इन प्रस्तावों को लेकर 25 सितम्बर 1832 को खसिया सरदारों से मिला। तीरथ सिंह तबियत खराब होने के कारण, इसमें हिस्सा न ले सके। इन प्रस्तावों पर विस्तार पूर्वक बात हुई। लेकिन अंत में तीरथ सिंह को सौंपने के सवाल पर बात टूट गयी। खसिया सरदार उन्हें अंग्रेजों के सामने उपस्थित करने को तैयार थे, लेकिन सौंपने को नहीं। युद्ध विराम संधि समाप्त होने ही वाली थी कि फिर मानिक सिंह कंपनी सरकार के एजेंट राबर्टसन से मिले और युद्ध न आरंभ करने का अनुरोध किया। उनके अनुरोध पर राबर्टसन 21 अक्तूबर तक युद्ध रोक रखने को तैयार हुआ। चूँकि तीरथ सिंह के आत्मसमर्पण को लेकर बातचीत बार-बार टूट जाती थी, इसलिए राबर्टसन इस परिणाम पर पहुँचा कि एक व्यक्ति के प्रश्न को लेकर युद्ध जारी न रखना चाहिए। दूसरी बातों पर समझौता हो जाय तो इस धारा को छोड़ देना चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ कंपनी सरकार के सर्वोच्च अधिकारियों को यह बात पसंद न आयी।
इस बीच राजा मानिक सिंह ने तीरथ सिंह को समझा-बुझा कर आत्मसमर्पण करने को तैयार कर लिया। इसलिए 9 जनवरी 1833 को तीरथ सिंह के एक मंत्री जीत राय कैप्टन इंगलिस से मिले और अपने नेता के आत्मसमर्पण के संबंध में बात चलायी, बशर्ते कि उनके जीवन की रक्षा की जाय। कैप्टन इंगलिस ने खसिया प्रथा के अनुसार फरसे के फलक से नमक खाकर सौगंध ली कि तीरथ सिंह के जीवन की रक्षा की जायगी। अन्य बातें तय हो जाने पर 13 जनवरी 1833 को तीरथ सिंह ने अंग्रेजों के हाथ आत्मसमर्पण किया। आत्मसमर्पण करते वक्त भी यह देशभक्त अपनी मातृभूमि को न भूला और अंग्रेज अफसर से अपने राज्य के प्रशासन की अच्छी व्यवस्था का अनुरोध किया। तीरथ सिंह गोहाटी ले जाये गये। राबर्टसन ने उन्हें निर्वासित कर बर्मा के तेनसरिम प्रांत में भेज देने का हुक्म दिया, लेकिन बड़े लाट की मंत्रिपरिषद कलकत्ता कौंसिल ने इस हुक्म को बदल दिया और उन्हें ढाका में नजरबंद करने का हुक्म दिया।
