असम में गदाधर सिंह का विद्रोह प्रारम्भिक ब्रिटिश-विरोधी अहोम प्रतिरोध की एक महत्वपूर्ण कड़ी था। हालांकि इसे कई बार “1828-30 का गदाधर सिंह विद्रोह” कहा जाता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि -
असम पर लंबे समय तक अहोम राजवंश का शासन रहा। 1820 के दशक में बर्मी आक्रमणों और आंग्ल-बर्मी युद्ध के कारण असम की राजनीतिक स्थिति अत्यंत अस्थिर हो गई। प्रथम आंग्ल-बर्मी युद्ध के बाद 24 फरवरी 1826 की यांडाबू संधि के द्वारा बर्मा ने असम पर अपने दावे छोड़ दिए और अंग्रेजों का प्रभाव स्थापित हुआ।
आंग्ल-बर्मी युद्ध (1824 ) के आरंभ में अंग्रेजों ने घोषणा की थी कि वे ब्रह्मपुत्र उपक्षेत्र का कोई भी अंश अपने राज्य में मिलाना नहीं चाहते। इसलिए उत्तर असम के सामंत सरदारों ने आशा की थी कि बर्मियों को असम से निकाल कर विजय के बाद अंग्रेजों इसे यहाँ के राजवंश को सौंप कर वापस चले जायेंगे ।
लेकिन युद्ध में विजय प्राप्त करते ही अंग्रेज साम्राजी अपना वादा भूल गये। वे ब्रह्मपुत्र की घाटी पर कब्जा कर बैठ गये। यह यहाँ के सामंतों की आशा पर कुठाराघात था। उन्होंने समझ लिया कि ये परदेशी बिना युद्ध के वापस न जायेंगे। इसलिए उन्होंने अंग्रेजों को भगाने की योजना बनायी। आंग्ल-बर्मी युद्ध में अंग्रेजों की विजय के दो साल बीतते न बीतते ये सामंत सरदार विदेशी साम्राजियों से भिड़ गये। दो बार उन्होंने अंग्रेजों को मार भगाने के प्रयत्न किये। अवश्य ही ये दोनों ही असफल हुए ।
उत्तर असम के सामंतों का अंग्रेजों की हुकूमत के खिलाफ पहला विद्रोह गदाधर सिंह का विद्रोह कहलाता है। यह 1828 से 1830 तक रहा। गदाधर सिंह अपने को असम के भूतपूर्व राजा ( 1810-18) चन्द्रकांत का भतीजा और जोगेश्वर सिंह का निकट संबंधी बताते थे। वे असम में 1603-41 तक राज करने वाले मेरू को अपना पूर्वज बताते थे । इस तरह वे अपने को अहोम राजवंश के संस्थापक सुखाफा का वंशज सिद्ध करते थे।
इनका पूर्व इतिहास अज्ञात है। कहा जाता है कि उनके पिता धुतूवा गोहाई 1818 में अपने निकट संबंध की एक सुंदरी कुमारी के साथ बर्मा की तत्कालीन राजधानी आवा गये थे। राजा जोगेश्वर सिंह ने, जिन्हें बर्मा के राजा ने चन्द्रकांत को हटा कर उसी साल उत्तर असम का राजा बनाया था, इस कुमारी को बर्मा के राजा के पास उपहार के रूप में भेजा था। इस कुमारी का ब्याह बर्मा के युवराज बागयीदा के साथ हुआ जो 1819 में बर्मा का राजा बना ।
डा. भुइयाँ द्वारा सम्पादित श्पाड्य बुरुंजीश् में कहा गया है कि यह कुमारी जोगेश्वर सिंह की बहन थी और चन्द्रकांत ने उसे बर्मा के राजा के पास उपहार-स्वरूप भेजा था। लेकिन इस अंचल के उस वक्त के प्रधान अंग्रेज अधिकारी स्काट ने लिखा है कि उसे जोगेश्वर सिंह ने भेजा था। उसका कोई भी संबंध उनसे न था। वह राजवंश की कुमारी भी न थी, लेकिन वर्मा के राजा को प्रसन्न करने के उद्देश्य से उसे राजकुमारी बताया गया था। धुतूवा गोहाईं को आवा दरबार में उच्च स्थान मिला। बर्मा के राजा ने गदाधर सिंह को असम भेजा यह जाँच करने के लिए कि असम से अंग्रेजों को हटाकर गदाधर को राजा बनाने की योजना में वहाँ के सामंत सरदार साथ देंगे या नहीं। साथ ही यह भी जानने के लिए कि असम में अंगरेजों की सेना कितनी है । बर्मा का राजा असम से अंगरेजों को मार भगाना चाहता था, पर खुल कर सामने आना न चाहता था ।
इसी बीच असम के सामंत सरदार अपनी शक्ति इकट्ठा कर अंग्रेजों को मार भगाने की तैयारी कर रहे थे। यह 1828 की बात है। कंपनी सरकार का पोलिटिकल एजेंट बहुत दिनों से सदिया से अनुपस्थित था। 54वीं रेजीमेंट की तीन कंपनियाँ पूर्वी असम से हटा ली गयी थीं, और अफवाह फैल रही थी कि उत्तर असम से कंपनी की सारी सेना जल्दी हटा ली जायगी। इसलिए सामंत सरदार इसे अंगरेजों को मार भगाने का सुनहरा अवसर समझते थे।
इसी अवसर पर खामती पुरोहित के भेष में गदाधर सिंह असम आये । पहले उन्होंने उत्तर असम में कंपनी सरकार के पोलिटिकल एजेंट कैप्टेन न्यूफविल के पास पत्र लिख कर अनुरोध किया कि कंपनी असम का राज उन्हें दे दे। उदाहरण के तौर पर उन्होंने दिखाया कि कैप्टेन वेल्स ने मोआमारियाओं को निकाल बाहर कर राजा गौरीनाथ को वहाँ का राज्य सौंप दिया था। अब चूँकि बर्मी असम से निकाल बाहर किये जा चुके हैं, इसलिए वहाँ का राज्य कंपनी उन्हें दे दे। उन्होंने वादा किया कि वे राजकाज अंग्रेजों की मरजी के अनुसार चलायेंगे ।
यह कदम उन्होंने अंग्रेजों का संदेह दूर करने के लिए उठाया था, क्योंकि इसी के साथ ही उन्हें कंपनी सेना के सिपाहियों को अंग्रेजों की हत्या के लिए भड़काते और अपने राज में उन्हें ज्यादा वेतन देने का वादा करते पाया जाता है।श् इसी समय उनकी मुलाकात असम के सामंत सरदारों से हुई । सरदारों ने अपने राजनीतिक उद्देश्य की सिद्धि के लिए उन्हें अच्छा अस्त्र समझा।
राजगुरु बुलाये गये और गदाधर सिंह को राजा बनाया गया। दाहा फूकन, मंत्री धर्माधार और खामती बूढ़ा गोहाई उनके प्रधान सहायक बने। उनकी सलाह से गदाधर ने बड़ बडुवा, बड़ फूकन और पुराने राज्य दरबार के अन्य अधिकारियों के पास पत्र लिखे। इनमें उन्होंने सहायता और सहयोग माँगा। भूतपूर्व बूढ़ा गोहाई ने उन्हें फूँक-फूंक कर कदम आगे रखने की सलाह दी। उनका बरावर सम्पर्क कर्नल कपूर और कैप्टेन न्यूफविल से था । फिर भी वे गुप्त रूप से गदाधर सिंह से सम्पर्क रखते थे। उन्होंने जल्दी में कदम न उठाने की सलाह दी, उनकी सफलता की कामना की और वादा किया कि सफलता सुनिश्चित मालूम होगी तो वे खुल कर उनके साथ मिल जायेंगे।
खुद ईस्ट इंडिया कंपनी के उत्तर असम में पोलिटिकल एजेंट के दरबार में ऐसे आदमी थे जो गदाधर सिंह की सफलता की कामना करते थे ।श् गदाधर ने बड़ बडुवा के पास एक पत्र में लिखाः मैं मातृभूमि के मंदिरों और गृहों की रक्षा करने आया हूँ। आनादि काल से हमारे पूर्वज बड़ बडुवों के हाथ से राज पाते रहे हैं। ऐसे अवसर पर मैं आपकी सहायता का अनुरोध करता हूँ। इसी तरह का पत्र उन्होंने बड़ फूकन को भी लिखा। दोनों ने वादा किया कि जिस दिन गदाधर को सफलता मिलेगी, उसके दूसरे दिन ही वे खुल कर उनके आदमी हो जायेंगे। यह भी कहा जाता है कि गदाधर ने चन्द्रकांत का भी आशीर्वाद प्राप्त किया था ।
अपने को असम का राजा घोषित कर गदाधर ने राजचिह्न धारण किये और कंपनी का राज उखाड़ फेंकने के लिए सब लोगों का आह्वान किया। उन्होंने छोटी-मोटी सेना भी इकट्ठा की। असम की आम जनता की हमदर्दी इस राजा के साथ थी और वह अंगरेजों के राजा का अंत देखना चाहती थी। अगर किसी तरह रंगपुर पर उनका कब्जा हो जाता, तो फिर असम को गुलाम बनाना अंग्रेजों के लिए बड़ा मुश्किल होता। खुद स्काट ने स्वीकार कियाः "फिर से शांति व्यवस्था स्थापित करने में बहुत ही बड़ी असुविधा का सामना करना पड़ता और बहुत बड़ी क्षति उठानी पड़ती।“
विद्रोही सरदार मोहियानू में इकट्ठा हुए जो जोरहाट के दक्षिण में है । उनका नेतृत्व खामती बूढ़ा गोहाईं, बड़ बडुवा, डाहा फूकन आदि कर रहे थे। रंगपुर (असम) पर चढ़ाई का एक शुभ दिन निश्चित किया गया । गदाधर का विश्वास था किं ज्योंही उनकी सेना रंगपुर के पास पहुँचेगी, हिन्दुस्तानी सिपाही उनके पक्ष में आ मिलेंगे ।
जब गदाधर की सेना रंगपुर पर चढ़ाई के लिए एकदम तैयार थी, तभी कैप्टेन न्यूफविल वहाँ आ पहुँचा। उसके आगमन की कोई भी पूर्व सूचना उनके मातहत काम करने वाले गदाधर के समर्थकों को न मिल सकी थी। इसलिए उन्हें मौका न मिल सका कि गदाधर को समाचार भेज खुले विद्रोह से उस वक्त रोक सकें । जिस पोलिटिकल एजेंट की अनुपस्थिति से वे लाभ उठा लेना चाहते थे, वह उनकी छाती पर आ बैठा था । ऐसी हालत में बड़ गोहाईं और बड़ फूकन घबरा गये । उन्हें अपनी गर्दन फँस जाने का डर लगा । इसलिए उन्होंने अपने पास लिखे गये गदाधर के पत्रों को न्यूफविल को दे दिया और सारी योजना जाहिर कर दी।
न्यूफविल ने तुरन्त कार्रवाई की। उसने लेफ्टिनेंट रदरफोर्ड के नेतृत्व में एक बड़ी सेना को विद्रोहियों पर हमला करने भेजा। इस सेना ने देवरापार में विद्रोहियों को परास्त किया । राजा गदाधर अपने बाकी बचे साथियों को लेकर नागा पहाड़ियों में चले गये । रदरफोर्ड उनका पीछा करता हुआ हुनबाल तक गया और नागा सरदारों के पास चिट्ठियाँ भेज विद्रोहियों को पकड़ने में मदद माँगी। इसी बीच असम मिलिशिया गदाधर की माँ, पत्नी और बहनों को पकड़ने में सफल हुई। रदरफोर्ड ने गदाधर की माँ से मुलाकात की और उनसे अनुरोध किया कि वे गदाधर को आत्मसमर्पण करने को समझायें और वादा किया कि अगर वे अपने मन से आत्मसमर्पण कर देंगे तो उनके साथ नरमी का बर्ताव किया जायगा ।
गदाधर काफी दिनों तक जंगलों में छिपते और बचते रहे। इस बीच उनके अधिकांश समर्थकों ने, यहाँ तक कि उनके प्रधान मित्र खामती बूढ़ा गोहाईं ने भी साथ छोड़ दिया । ऐसी हालत में न्यूफविल के वादे पर निर्भर कर उन्होंने अपने साथियों के साथ 10 नवम्बर 1828 को आत्मसमर्पण कर दिया। उनके पास पाये गये पत्रों के आधार पर कुछ लोग गोहाटी में गिरफ्तार किये गये ।
गदाधर, दाहा फूकन, धर्माधार मंत्री, खामती बूढ़ा गोहाईं, भूतपूर्व बड़ गोहाईं और उनके पुत्र पर मामला चलाया गया। गदाधर को मृत्यु की सजा सुनायी गयी, लेकिन न्यूफविल ने उसे 7 वर्ष के निर्वासन में बदल दिया और कंपनी सरकार ने इसकी पुष्टि की। दूसरों को भी मृत्यु दंड मिला था, लेकिन उसे भी बदल दिया गया ।
जेल से गदाधर निकल भागे, किन्तु फिर पकड़ लिए गये। फिर उन्हें कारारक्षकों के साथ साजिश करते देखा गया। इसलिए उन्हें बंगाल के रंगपुर जेल में ले जाकर नजरबंद कर दिया गया। इस तरह अंगरेजों के खिलाफ असम के सामंतों का पहला विद्रोह समाप्त हुआ।
ऐतिहासिक महत्व:
गदाधर सिंह का विद्रोह सैन्य दृष्टि से सफल नहीं हुआ, लेकिन इसका ऐतिहासिक महत्व काफी बड़ा है। यह ब्रिटिश सत्ता स्थापित होने के तुरंत बाद हुए उन आंदोलनों में था जिनका स्पष्ट उद्देश्य विदेशी सत्ता को चुनौती देना था। इस विद्रोह में असम की पुरानी राजसत्ता को पुनर्जीवित करने की आकांक्षा स्पष्ट दिखाई देती है। इसने दिखाया कि ब्रिटिश सत्ता का प्रारम्भिक विरोध असम में काफी हद तक अपदस्थ राजपरिवार और पुराने कुलीन वर्ग से आया। बर्मा से सहायता लेने का प्रयास बताता है कि उस समय असम के विद्रोही ब्रिटिश सत्ता को केवल स्थानीय स्तर पर नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन के संदर्भ में भी देख रहे थे। 1828-30 के अहोम विद्रोहों ने असम में ब्रिटिश-विरोधी राजनीतिक चेतना की प्रारम्भिक नींव रखी। बाद में असम में खासी, सिंगफो, कामती और अन्य समुदायों के प्रतिरोध भी सामने आए।
