When Emperor Akbar ascended the throne in the 16th century, the Mughal Empire faced a significant challenge: how to efficiently collect land revenue without overburdening the farmers, who formed the backbone of the agrarian economy. The solution arrived in 1580 CE with the famous 'Zabt' (or 'Dahsala') system—a land revenue framework devised by his capable finance minister, Raja Todar Mal.
How did this system bring about a major transformation in medieval Indian history? Unlike traditional feudal methods that relied on arbitrary shares of the harvest, Akbar’s policy was grounded in scientific precision and data. Officials calculated a ten-year average of local crop prices and agricultural yields, ensuring that taxes were based on reality rather than the whims of local landlords. A significant departure from tradition was the stipulation that revenue be fixed in cash; this liberated farmers from the logistical burden of transporting grain and granted them the freedom to trade in the market.
Todarmal’s ingenuity did not stop there. He categorized agricultural land into four distinct classes based on fertility—'Polaj' (cultivated continuously), 'Parauti'( left fallow for a short period), 'Chachar' (left fallow for a long period), and 'Banjar' (least fertile or barren land)—enabling the state to adjust tax rates according to actual productivity. Perhaps most importantly, the system completely eliminated corrupt intermediaries (landlords) from the tax collection process, allowing government officials to deal directly with the farmers.
The results were remarkable: the imperial treasury swelled to unprecedented levels, farmers experienced newfound stability and certainty, and agricultural productivity surged across the subcontinent. Akbar’s 'Dahsala' system not only established an ideal standard for Mughal economic administration but also remains one of the most discussed and studied topics in the syllabi of competitive history examinations, including the UPSC.
In the following analysis, we will delve deeply into every aspect of this historic revenue system—its pre-Akbar origins, innovative land measurement techniques like 'Gaz-i-Ilahi', precise tax collection methods ('Gallabakshi', 'Nasq', and 'Zabti'), and its enduring impact that shaped the destiny of Indian agriculture for centuries to come. Let us explore why Todarmal’s 16th-century framework continues to offer vital lessons for modern economic administration.
विषय-प्रवेश:
मुगलकालीन राजस्व व्यवस्था की जानकारी हमें अबुल फजल की रचना आईन-ए-अकबरी, समकालीन साहित्यिक रचनाएं, विदेशी पर्यटकों के वर्णन तथा कारखानों के दस्तावेजों से प्राप्त होती है। इन सामग्रियों के अध्ययन से हम इस निष्कर्ष पर आते हैं कि मुगल सम्राटों के शासनकाल तक देश की आर्थिक स्थिति उन्नत थी। यहां, कृषि, वाणिज्य- व्यवसाय, उद्योग-धन्धे आदि उन्नत अवस्था में थे, किन्तु औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् जब देश की राजनीतिक स्तिथि सुदृढ़ नहीं रह गई, यहां की आर्थिक स्थिति में भी पतन शुरू हुआ और विदेशियों ने आर्थिक दृष्टिकोण से इसे अपना शिकार बनाया, जिसकी समाप्ति भारत में अंग्रेजी राज्य की स्थापना के साथ हुई। सम्पूर्ण मुगल भारत की आर्थिक स्थिति सामाजिक स्थिति के अनुरूप ही रही। उच्चवर्ग के लोगों की सम्पन्नता उनके उच्च जीवन-स्तर, खान-पान, पोशाक एवं आभूषण तथा रहन-सहन में स्पष्ट रूप से झलकती है। मध्यवर्ग के लोगों की स्थिति संतोषप्रद कही जा सकती है, जबकि निम्नवर्ग को अपने जीवन-यापन में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। उच्च वर्ग के लोगों के द्वारा उनका शोषण उनकी दयनीय स्थिति का महत्वपूर्ण कारण कहा जा सकता है।
कृषि -
भारत सदा की तरह मुगल काल में भी एक कृषि प्रधान देश बना रहा। कृषि आर्थिक जीवन और राजस्व व्यवस्था का प्रधान स्तम्भ था। देश की बहुसंख्यक जनता कृषि अथवा कृषि सम्बन्धित उद्योग-धंधों पर ही निर्भर थी। देश अन्न के मामले में आत्मनिर्भर था। भारतीय ग्राम देश के आर्थिक कार्यों का धुरी थे, क्योंकि उद्योग-धन्धे तथा वाणिज्य-व्यवसाय दोनों कृषि पर ही आधारित थे। ग्राम पूर्णरूप से आत्मनिर्भर थे। उत्तर भारत में उत्पन्न की जाने वाली फसलों के नाम अबुल फजल ने अपनी रचना आईन-ए-अकबरी में दिये हैं। ये फसलें थीं- धान, गेहूं, जौ, ज्वार-बाजरा, विभिन्न प्रकार के दलहन, ईंख, कपास, सन, तरह-तरह के तिलहन, नील, पोस्ता-पान, सिंघाड़ा आदि। कॉफी, चाय तथा तम्बाकू जैसी नई फसलें भी देश के विभिन्न भागों में उपजायी जाती थीं। ईख, कपास, तम्बाकू, चाय आदि मुख्य वाणिज्यिक फसालें थी। कुछ अंशों में फसलों का स्थानीयकरण भी था। बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में गन्ने कपास, तम्बाकू, चाय आदि मुख्य वाणिज्यिक फसलें थीं। पेलसर्ट सूचित करता है कि यमुना की घाटी तथा मध्य भारत में नील की काफी उपज होती थी। दोआब में बड़े पैमाने पर गन्ना, धान, गेहूं आदि फसलें उपजाई जाती थीं। फसलों को एक स्थान से दूसरे स्थान में बिक्री के लिए निरन्तर भेजा जाता था। सम्पूर्ण देश में फलों के बागीचों की भरमार थी, जिनसे अंगूर, सेब, नासपाती, आवलाॅ नींबू, आम, बेर, खजूर, अंजीर, खरबूजे आदि फल काफी मात्रा में प्राप्त हो जाते थे। लोग भिन्न-भिन्न प्रकार की साग-सब्जियों का भी प्रचुर मात्रा में उत्पादन करते थे।
कृषि के साधन -
कृषि के साधन अत्यन्त सीधे-साधे थे, क्योंकि जमीन उपजाऊ थी और खाद तथा पानी की कोई कमी नहीं थी। देश की आबादी कम थी एवं भूमि प्रचूर मात्रा में उपलब्ध थी। अतः भूमि पर पैदावार के दृष्टिकोण से दबाव कम था। साधारण कृषि-यंत्रों के प्रयोग से काफी उपज हो जाती थी। कृषि-यंत्र लगभग पुराने किस्म के होते थे। हल, कुदाल, फावड़ा, खुरपी, जुआठ, हंसुआ आदि औजारों का विशेष रूप से प्रयोग किया जाता था। इस काल में सिंचाई के आधुनिक कृत्रिम साधनों की नितान्त कमी थी और लोग तालाब, कुआं से ही अपने खेतों की सिचाई किया करते थे। अपनी आत्मकथा ’तुजुक-ए-बाबरी’ में बाबर ने भारत में सिंचाई के उद्देश्य से निर्मित नहरों की पूर्ण अभाव का वर्णन किया है। वैसे फिरोज शाह के द्वारा निर्मित नहरें उस समय किसी न किसी रूप में रही होंगी। शेरशाह और अकबर ने कृषि की उन्नति के लिए अपने शासनकाल में नहरों का निर्माण करवाया था।
मध्यकालीन कृषि-व्यवस्था की विशेषताएं -
मध्यकालीन कृषि की दो विशेषताएं थीं- भूमि की प्रचुरता तथा कृषि मजदूरों की कमी। सम्पूर्ण देश में शायद ही ऐसा क्षेत्र रहा होगा, जहां कृषि-कार्यों के लिए भूमि की कमी का अनुभव किया गया हो। यहाॅं तक कि गंगा-यमुना की घाटी में भी कृषि-योग्य क्षेत्र परती पड़े रहते थे। देश के विभिन्न क्षेत्रों में जंगलों का भरमार था, जिन्हें सहज ही साफ-सुथरा कर कृषि-योग्य बनाया जा सकता था। यही कारण था कि भूमि कौड़ी के मोल बिकती थी। भू-संपत्ति का कोई अस्तित्व नहीं था। लोग भूमि पर अपने अधिकार को स्थापित करने के लिए व्यग्र नहीं रहते थे। जो अपनी जीविका हेतु कृषि-कार्यों को अपनाते थे, उन्हें भूमि का कोई अभाव नहीं रहता था। कृषि मजदूरों की सम्पूर्ण देश में नितान्त कमी थी क्योंकि आजकल की तरह ग्रामवासियों के समक्ष बेकारी की कोई भी समस्या नहीं थी। कृषि कार्यों को समाज में निम्न दृष्टि से नहीं देखा जाता था।
मुगल काल में किसानों की स्थिति सामान्यतः संतोषजनक कही जा सकती है। किसानों को भोजन, वस्त्र आदि के संचयन में कठिनाई होती थी, किन्तु उस काल में सुबह-शाम दोनेां वक्त भोजन की प्राप्ति ही देशवासियों के लिए बडी बात थी। मुगल सम्राट अकबर ने अपने अधिकारियों को कृषकों की भलाई पर ध्यान देने का आदेश दे रखा था, किन्तु अधिकारीगण इन आदेशों का पालन शायद ही करते थे तथा लालच एवं स्वार्थ में पड़कर वे किसानों का शोषण और दमन किया करते थे। राज-कर्मचारी किसानों के प्रबलतम शत्रु थे। कभी-कभी इसके दमन एवं शोषण से तंग आकर किसानों को अपना गांव-घर छोड़कर पड़ोसी गांवों अथवा जंगलों में शरण लेनी पड़ती थी। किसानों को जंगली जानवरों तथा अतिवृष्टि, अनावृष्टि के प्रकोपों को भी सहन करना पड़ता था।
मुगलकालीन राजस्व व्यवस्था -
भारत में मुगल वंश की नींव बाबर ने डाली थी लेकिन अपने 4 वर्षों का संिक्षप्त शासन काल में राजस्व व्यवस्था के क्षेत्र में उसने कोई ठोस प्रयास नही किया और सच कहा जाय तो उसे इसका अवसर ही नही मिला। वास्तव में मुगल साम्राज्य को स्थापित और विस्तारित करने में ही वह परेशान रहा और और यहाॅं उसे कई युद्ध भी लडने पडे। उसकी मृत्यु के बाद जब हुमायूॅ मुगल साम्राज्य की राजगद्दी पर बैठा तो उसने इस दिशा में प्रयास प्रारंभ किया।
सबसे पहले उसने सम्पूर्ण भूमि को दो भागों में बंटवा दिया। एक ’खालसा भूमि’ और दूसरी ‘जागीर भूमि’। ’खालसा भूमि’ पर सम्राट् का अधिकार था। इसकी आय केन्द्रीय सरकार को जाती थी। ’जागीर भूमि’ जागीरदारों के पास थी। भूमि का अधिकांश भाग इसी श्रेणी में थी। जागीरदार सम्राट् को एक निश्चित रकम देते थे। यद्यपि अभी तक अर्थात् हुमायूॅ के शासनकाल में मुगल साम्राज्य की सीमा में कोई खास वृद्धि नहीं हो पाई थी, इसलिए हुमायूॅ के शासनकाल में इस प्रकार का प्रबन्ध सुचारू रूप से चलता रहा। बीच में कुछ वर्षों के लिए शेरशाह का शासनकाल भी आया और शेरशाह प्रथम मुस्लिम बादशाह था जिसने राजस्व प्रणाली के सिद्धान्त को नये ढंग से निर्धारित किया था। उसके शासनकाल में भूमि से सम्पूर्ण उपज का 1/3 भाग राजस्व के रूप में किसानों से लिया जाता था। शेरशाह की भू-राजस्व व्यवस्था का विस्तार से उल्लेख उपर किया जा चुका है।
जब अकबर मुगल साम्राज्य की राजगद्दी पर बैठा और उसने मुगल साम्राज्य की सीमा को तब काफी बढ़ा लिया तो उसको इस प्रबन्ध से काफी कठिनाइयां होने लगीं। पुनः उसने अनुभव किया कि बाजार भावों को निर्धारित करने में काफी समय लग जाता है और किसानों को परेशानी होती है। इसी प्रकार कीमतों का निर्धारण शाही दरबार के निकट की कीमतों पर आधारित होता था जो अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों की कीमतों से अधिक होती थी और किसानों को अधिक अंश कर के रूप में देना पड़ता था। अतः उसको इस व्यवस्था में परिवर्तन करना पड़ा।
यद्यपि प्रशासन के प्रत्येक क्षेत्र में शेरशाह अकबर का अग्रणी एवं पथ-प्रदर्शक था, किन्तु अकबर का राजस्व प्रबन्ध अपने समय से अधिक विकसित था। अकबर के कठोर परिश्रम, सूझ-बूझ एवं भू-परीक्षण के अतिरिक्त उसके राजा टोडरमल एवं मुजफ्फरपुर खाँ जैसे उच्चकोटि के वित्त-शास्त्रियों ने राजस्व को समुचित व्यवस्था कर मुगल साम्राज्य की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ बनाया।
अकबर के साम्राज्य विस्तार के साथ-साथ राज्य की आय में भी वृद्धि होती गई। समकालीन दरबारी इतिहासकार अबुल फजल ने अपने ग्रंथ आइन-ए-अकबरी में 1565 ई0 के काल में मुगल साम्राज्य के प्रत्येक सूबों की माल-गुजारी का आॅंकड़ा प्रस्तुत किया है जिसके अनुसार अकबर के साम्राज्य की कुल वार्षिक आय 1 अरब, 28 करोड़, 70 लाख, 75 हजार, 4 रू0 थी। इस आय का लगभग आधा भाग भूमिकर से प्राप्त होता था जबकि शेष अन्य करों के द्वारा।
अकबर की आय के मुख्यतः दो साघन थे - 1. केन्द्रीय कर, तथा 2. स्थानीय कर
केन्द्रीय कर -
अकबर के शासनकाल में राजकोष में आय प्राप्ति के अनेक स्रोत थे जैसे - व्यापार, टकसाल, उपहार, नमक, चंुगी तथा भूमिकर। इनमें भी भूमिकर आय का सबसे बडा और महत्वपूर्ण स्रोत था। जकात कर केवल मुसलमानों से लिया जाने वाला धार्मिक कर था, किन्तु निर्धन मुसलमान इस कर से मुक्त थे। मुसलमानों को अपनी आय का एक भाग जकात कर के रूप में देना पड़ता था। यह घन उन्हीं के हितार्थ खर्च किया जाता था। खुम्स (युद्ध में प्राप्त धन) से भी राज्य की बहुत आमदनी होती थी। नमक और नील पर राज्य का एकाधिकार था। उनकी बिक्री पर लगे कर से भी अच्छी आय होती थी।
आयात एवं निर्यात कर पूर्व की भांति मुसलमानों से ढाई प्रतिशत तथा हिन्दुओं से सवा पाँच प्रतिशत वसूला जाता था। अकबर तथा उसके उत्तराधिकारियों ने इसमें कोई परिवर्तन नहीं किया। साम्राज्य के निजी कारखाने दिल्ली, आगरा, लाहौर एवं अन्य प्रमुख नगरों में थे। इनमें वस्त्र, जरी के काम, उपहार योग्य वस्तुयें, युद्ध सामग्री, सजावट का सामान, श्रृंगार प्रसाधन आदि बनते थे। विभिन्न राज्यों में प्राप्त खनिज पदार्थों की खानों पर साम्राज्य का अधिकार होता था। इससे प्राप्त माल की बिक्री से भी आय होती थी। खानों की आय पर 1/5 प्रतिशत कर लगाया जाता था।
स्थानीय कर -
चुंगी, नदी, घाट, सड़क, हाट, बाजार आदि से व्यापारिक माल के आवागमन तथा यातायात पर भी चुंगी वसूली जाती थी। अकबर ने अनेक कर समाप्त भी कर दिये थे।
अबुल फजल के अनुसार- सम्राट अकबर ने जजिया, तीर्थयात्रा कर, बन्दरगाह पर महसूल, दरोगा की फीस, तहसीलदार की फीस, बाजार का महसूल, विदेश यात्रा कर, मकान के क्रय-विक्रय पर कर एवं अन्य तमाम कर निरस्त कर दिये थे।
भू-राजस्व व्यवस्था का इतिहास -
इससे पूर्व कि सम्राट अकबर की भू-राजस्व व्यवस्था का वर्णन किया जाय यह उचित होगा कि उसके पूर्व की भूमि व्यवस्था पर एक नजर डाल ली जाय। प्राचीन काल में उपज और पशुधन का दसवां भाग कर के रूप वसूल किया जाता था। डा० घोषाल के अनुसार उस समय मालगुजारी निर्धारित करने के दो तरीके थे। प्रथम उपज का बंटवारां जिसे आजकल बंटाई कहते हैं। दूसरे उपज के मूल्य में राज्य का भाग लेना जिसे आजकल कनकूत कहते हैं। सरकार का हिस्सा उपज के 1/6 से 1/8 तक और 1/10 से 1/12 तक भूमि की उर्वरता के आधार पर निश्चित होता था। कालान्तर में इस व्यवस्था में भी समय-समय पर कुछ सुधार किये गये ओर मालगुजारी के साथ-साथ सिचाई कर भी लिया जाने लगा, जिसकी मात्रा 1/5 से 1/6 भाग थी। ऐसा भी प्रतीत होता है कि मौर्य काल से करदाता व राज्य के बीच सीधे व प्रत्यक्ष सम्बन्ध स्थापित थे। गाँव में मालगुजारी सम्भवतः गाँव के मुखिया की सहायता से एकत्र की जाती थी। अकाल तथा सूखे की अवस्था में मालगुजारी में छूट दी जाती थी। जब किसान अपनी फसलों की समुचित व्यवस्था नहीं करते तो इस पर उन्हें जुर्माना देना पड़ता था। हिन्दू काल में किसी भी दशा में भूमिकर 1/4 अथवा 1/3 से अधिक नहीं था।
दिल्ली सल्तनत की स्थापना के बाद यहाँ के मुस्लिम शासक पूर्ण रूप से इस्लामी व्यवस्था को लागू न कर सके। सुविधा की दृष्टि से उन्होंने प्राचीन भारत की मालगुजारी व्यवस्था को ही लागू किया और कृषि पर राज्य कर निर्धारित करने तथा उसे वसूल करने के लिए प्राचीन पद्धति को ही अपनाया। फिर भी वे पूर्ण रूप से इस्लामिक पद्धति की उपेक्षा न कर सके और भारत में एक मिली-जुली व्यवस्था स्थापित की। डा० आशीर्वादी लाल ने लिखा है कि यह मध्यकालीन व्यवस्था मौलिक रूप से तो प्राचीन भारत की कृषि व्यवस्था का ही थोड़ा सा भिन्न रूप रही लेकिन इस्लामी आदर्शों को बनाये रखने के लिए अलग-अलग प्रकार की भूमि के नाम बदल दिये गये और हिन्दू तथा मुसलमान किसानों से एक-सा कर वसूल न करके उनकी अलग-अलग दरें निश्चित कर दी गई।
कर निर्धारण में सल्तनत काल में उपज अथवा नकद दोनों प्रकार की व्यवस्थाएं थीं। सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने उपज पर अधिकतम 50 प्रतिशत कर लगाया। उसने भूमि की पैमाइश भी करवायी थी। वह नकद और अनाज दोनों ही रूपों में कर बसूलता था। फीरोजशाह तुगलक के शासन काल में भी कृषि कर आंशिक रूप में नकद और उपज दोनों ही प्रकार से लिया जाता था। परन्तु सुल्तान इब्राहीम लोदी का स्पष्ट आदेश था कि कृषि कर उपज के रूप में ही वसूल किया जाय। सम्भव है कि बाबर और हुमायूँ काल में भी यही व्यवस्था लागू रही होगी।
शेरशाह प्रथम मुस्लिम शासक था, जिसने मालगुजारी निर्धारित करके भूमि व्यवस्था में महत्वपूर्ण सुधार किया। उसने विभिन्न करों की तालिका तैयार कराकर उस पर निश्चित मालगुजारी निर्धारित की। उसकी तालिका से ज्ञात होता है कि उसके भू-राजस्व की दर भूमि की औसत उपज पर आधारित थी। जो भूमि के तीन वर्गों के अनुरूप श्रेष्ठ, मध्यम और निम्न स्तर में विभाजित थी। परन्तु कर का निर्धारण इन्हीं तीन प्रकार की औसत उपज पर किया जाता था। शेरशाह उपज का तिहाई भाग, भूमिकर के रूप में लेता था।
अकबर की भू-राजस्व व्यवस्था:
जब अकबर मुगल सम्राट बना तो उसने शेरशाह द्वारा की गई भूमि व्यवस्था को आधार मानकर इस सुधार को और आगे बढ़ाया। भू-राजस्व सुधार के क्षेत्र में अकबर ने कई प्रारम्भिक प्रयोग भी किये। सर्वप्रथम 1560 ई0 में बैरम खाँ के पतन के बाद अकबर ने अब्दुल मजीद को आसफ खाँ की उपाधि से विभूषित कर वजीर नियुक्त कर दिया और उसे मालगुजारी व्यवस्था को पुनः संगठित करने को कहा गया। आसफ खाँ ने मनमाने ढंग से कहीं-कहीं मालगुजारी को बढ़ा दिया और कहीं कम कर दिया। कर निर्धारण की इस व्यवस्था का कोई वास्तविक आधार नहीं था। आसफ खाँ ने केवल जागीरदारों को संतुष्ट करने के लिए उनकी जागीरों का मूल्यांकन अधिक कर दिया था परन्तु यह व्यवस्था सफल न हो सकी। शीघ्र ही आसफ खाँ को वजीर के पद से हटा दिया गया और उसे कड़ा का आमिल नियुक्त कर दिया गया। इस प्रकार अकबर द्वारा मू-राजस्व सुधार में किया गया यह प्रथम प्रयास विफल साबित हुआ।
अकबर ने भू-व्यवस्था में सुधार का दूसरा प्रयास उस समय किया जब 1562 ई0 में एतमाद खाँ को खालसा भूमि का दीवान नियुक्त किया गया। उसने खालसा भूमि को जागीरी भूमि से अलग कर दिया और खालसा भूमि के मालगुजारी वसूली के नये नियम बना दिये गये। इन नये नियमों को सितम्बर 1562 ई0 में लागू कर दिया गया। परन्तु इस व्यवस्था में भी कोई स्थायी लाभ नहीं हुआ और 1567 ई0 में यह व्यवस्था समाप्त हो गई। फिर भी अबुल फजल ने इस व्यवस्था के विषय में इतना अवश्य लिखा कि इस व्यवस्था में गबन समाप्त हो गया जबकि समकालीन इतिहासकार बदायूँनी के अनुसार इससे खर्च में बड़ी बचत हुई।
1567 ई0 में अकबर ने पुनः इस क्षेत्र में तीसरा प्रयोग किया। अकबर ने राज्य का भाग उपज के रूप में निश्चित करने की प्रथा समाप्त कर दी और एक नई व्यवस्था लागू की। इस नई व्यवस्था में नकद जमा की प्रथा लागू की गई। अभी तक मालगुजारी की व्यवस्था शेरशाह के शासन काल से चली आ रही फसलों की दरों पर ही थी परन्तु अब इनके स्थान पर परगने की फसलों के लिए अलग-अलग फसलों की दरों की व्यवस्था की गई। सभी कानूनगो को आदेश दिया गया कि वे अपने परगनों के भूमि में, उपज और करों के आंकड़े प्रस्तुत करें।
1567 से 1571 ई0 में भूमि की जांच, नाप एवं राजस्व को निर्धारित करने के लिए मुजफ्फर खाॅं और टोडरमल के नेतृत्व में दस विशेष भूमि अधिकारियों की नियुक्ति की गई और कानूनगो के ही समान सभी भूमि की उपज को अलग-अलग ध्यान में रखकर मालगुजारी की दरें निर्धारित की गईं। 1571 ई0 में कुल मालगुजारी का जो अनुमान लगाया गया वह पूर्व के आंकड़ों से कम था। यद्यपि यह नयी व्यवस्था 1571 ई0 में लागू कर दी गई फिर भी अकबर इस व्यवस्था से सन्तुष्ट नही था क्योंकि वह एक ऐसी भ-राजस्व व्यवस्था लागू करना चाहता था जो सरल, सुविधाजनक और किसानों के हित में हो। अतः 1574-75 में भू-राजस्व के क्षेत्र में उसने एक नया और चैथा प्रयोग किया।
टोडरमल ने भूमि पैमाइश कराकर भूमि के क्षेत्रफल और उपज के आधार पर भूमि कर निर्धारित किया। इसी समय अकबर ने एक सुनियोजित भूमि पर पैमाइश की योजना लागू की। उसने सिकन्दर लोदी के गज को सरकारी पैमाने की ईकाई मान लिया। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन रस्सियों से भूमि की नाप की जाती थी, मौसम के प्रभाव के कारण वह घट-बढ जाती थी, इसलिए अकबर ने रस्सियों के स्थान पर बाॅंस के डण्डों को ईकाई के रूप में प्रचलित किया। बाॅस के ये डण्डे लोहे के कडों से एक दूसरे में फॅंसे रहते थे। इन्हे ‘गज-ए-इलाही‘ का नाम दिया गया। इसकी लम्बाई 33 इंच होती थी। अब भूमि को बीघों में नापा जाने लगा। एक बीघा पहले की ही भाॅंति 60 गज लम्बा और 60 गज चैडा होता था। प्रारंभ में इस भूमि की पैमाइश चार प्रमुख व्यक्तियों- शाहबाज खाॅं, आसफ खाॅं द्वितीय, पुरूषोत्तम और राय रामदास - की एक समिति की देखरेख में की जाती थी। भूमि की पैमाइश के बाद उसकी वास्तविक उपज निर्धारित करके उस पर मालगुजारी निश्चित कर दी जाती थी।
बंगाल व बिहार को छोडकर 1575-76 ई0 में साम्राज्य के शेष सभी क्षेत्रों में यह व्यवस्था लागू कर दी गई। इस व्यवस्था के अन्तर्गत सम्पूर्ण राज्य को 182 परगनों में बाॅंटा गया और प्रत्येक परगने में एक करोड़ी नियुक्त किया गया। परगनों का गठन इस हिसाब से किया गया कि प्रत्येक परगने से लगभग एक करोड़ दाम की आय प्राप्त हो। करोड़ी का मुख्य काम खेती को प्रोत्साहन देना व राजस्व एकत्र करना था। इसके अतिरिक्त वह बेकार पडी भूमि का पता लगाके उस पर खेती करने के लिए किसानों को प्रेरित करता था। अपने अधीन अधिकारियों और कर्मचारियों पर नियंत्रण रखना और आय-व्यय के हिसाबों की जाॅंच करना भी उसका प्रमुख कर्तव्य था।
करोड़ियों के हिसाब की जाॅच एक निश्चित समय पर की जाती थी। अगर कोई करोड़ी हिसाब में किसी प्रकार का गोलमाल करते हुये पाया जाता था तो उसे कड़ी सजा दी जाती थी। इस सम्बन्ध में इतिहासकार लेनपूल ने लिखा है कि - ‘‘ इस बात का समुचित प्रबन्ध किया गया था कि यदि कोई करोड़ी अपने परगने के किसानों से अधिक और अनियमित लगान वसूल कर ले तो कृषक उसकी शिकायत आसानी से कर सकें तथा अपराध सिद्ध होने पर अपराधी को कठोर दण्ड दिया जा सके।‘‘
अकबर ने 1580 ई0 में राजा टोडरमल को दीन-ए-अशरफ अर्थात मुगल साम्राज्य का दीवान नियुक्त किया। उसने भूमि व्यवस्था और राजस्व प्रणाली में विशेष योजनाएॅं लागू की। कई प्रयोगों के बाद टोडरमल के द्वारा जब्ती या आइन-ए-दहसाला पद्धति को अपनाया गया। टोडरमल ने इस बात को अच्छी तरह समझ लिया था कि राज्य की सारी भूमि पैदावार की दृष्टि से एक समान नही है। अतः उसने उपज के आधार पर भूमि का विभाजन कर दिया और उसी विभाजन के आधार पर भू-राजस्व निर्धारित किया। उसने राज्य की सम्पूर्ण भूमि को उपज के आधार पर निम्नलिखित भागों में बाॅटा था -
1. पोलज: इस श्रेणी की भूमि काफी उपजाऊॅ होती थी अतः यह भूमि प्रथम श्रेणी की भूमि मानी जाती थी। इस तरह की भूमि को प्रत्येक वर्ष जोता और बोया जाता था। इसमें साल में कम से कम दो फसलें पैदा की जाती थी और इसे कभी परती नहीं छोड़ी जाती थी। इस भूमि से प्रतिवर्ष राजस्व वसूल किया जाता था।
2. परौती: यह वह भूमि होती थी जो पोलज की तरह निरन्तर उर्वरा नहीं होती थी अर्थात परौती भूमि की उत्पादन शक्ति पोलज की अपेक्षा कम थीं। कुछ दिनों तक खेती करने के बाद इसकी उर्वरा शक्ति स्वतः कम हो जाती थी। अतः इसे एक साल तक खेती के काम में नहीं लाया जाता था। इसका तात्पर्य यह है कि इसे परती छोड़ दिया जाता था ताकि वह अपनी उर्वरा शक्ति को ठीक से बढ़ा ले।
3. चाचर: तृतीय श्रेणी की भूमि को चाचर भूमि कहा जाता था जो बहुत ही कम उर्वरा थी। इस प्रकार की भूमि की उत्पादन शक्ति प्राप्त करने के लिए कुछ दिनों तक जोतने के बाद इसे तीन या चार सालों तक परती छोड़ दिया जाता था।
4. बंजर : बंजर भूमि राज्य की सबसे निम्न कोटि की भूमि होती थी। इसमें उपज नाममात्र की होती थी। इसकी गिनती उपजाऊॅ भूमि के रूप में नहीं होती थी। ऐसी भूमि को कुछ दिन जोतने के बाद पाॅंच साल या इससे अधिक समय के लिए परती छोड़ दिया जाता था जिससे यह कुछ हद तक अपनी उत्पादन-शक्ति को बढ़ा सके।
इस प्रकार राज्य में पोलज, परौती और चाचर भूमि को ही उपजाऊ भूमि समझा जाता था। राजा टोडरमल ने सम्पूर्ण भूमि की पैमाइश एवं वर्गीकरण के बाद भूमि की वार्षिक उपज का औसत अनुमान निकाला। उसने पोलज, परौती और चाचर तीनों प्रकार की भूमि के प्रति बीघा उपज का योग लगाकर उसको तीन से भाग देकर उनकी उपज का औसत निकाला तथा उसी को प्रत्येक श्रेणी की औसत उपज निर्धारित कर दी। भूमि उपज का औसत निकालने के बाद भू-राजस्व की राशि भी निश्चित कर दी गई। भूमि की पैमाइश और गुणों के आधार पर उसका विभाजन करने के पश्चात लगान वसूली की भी व्यवस्था की गई जो मुख्यतः तीन प्रकार से की जाती थी -
1. गल्ला बक्शी: बटाई होतीगल्ला बक्शी को बटाई भी कहते थे। यह बहुत पुरानी प्रथा थी। इसके द्वारा उपज का कुछ भाग सरकार द्वारा वसूला जाता था। इसमें मुख्यतः कभी खडी फसल, कभी पूर्णतः तैयार फसल और कभी फसल बोने के समय ही तीन बराबर भागों में बाॅंट दिया जाता था और उसका एक भाग सरकार अर्थात राज्य को और दो भाग किसान को दिया जाता था। इस प्रथा के अनुसार किसानों को नगद रूपया नहीं देना पड़ता था बल्कि गल्ले की थी।
2. नस्क: लगान वसूली की दूसरे तरीके को नस्क के नाम से जाना जाता है। यह प्रथा मुख्यतः बंगाल में प्रचलित थी। इसके द्वारा खडी फसल के अनुमान के आधार पर सरकारी लगान निश्चित कर दिया जाता था। इस प्रथा के अनुसार किसान और सरकार का सीधा सम्बन्ध स्थापित होता था। इसमें जमींदारों की आवश्यकता नही थी। किसानों को सरकार को सीधा लगान भेजने का प्रबन्ध था। एक प्रकार से यह प्रथा रैयतवाडी प्रथा के समान थी।
3. जब्ती: इस प्रथा के अनुसार खेत में बोए हुये गल्ले की किस्म के अनुसार किसान को एक निश्चित रकम नगद रूपये के रूप में सरकार को देनी पड़ती थी। यह प्रथा टोडरमल की विशेष देन थी और इसमें लगान का निश्चय फसल के आधार पर किया जाता था। यह ठोस वैज्ञानिक प्रणाली मानी जाती थी।
दससाला बन्दोबस्त अथवा दसवर्षीय प्रबन्ध -
टोडरमल का महत्वपूर्ण सुधार दससाला बन्दोबस्त था। अकबर द्वारा किये गये भूमि प्रबन्ध के विषय में बहुत से विद्वानों का मानना है कि उसने दस वर्षीय प्रबन्ध भी कराया था जिसके अनुसार 1580 के पहले 10 वर्षों के मूल्य का औसत निकाल कर भू-राजस्व वसूलने की व्यवस्था की गई।
दरअसल अभी तक प्रत्येक वर्ष की उपज के आधार पर कर निश्चित कर दिया जाता था। कर का निर्धारण अकबर की अनुमति प्राप्त होने पर ही होता था और तब राज्यों या प्रान्तों में इसकी सूचना भेजी जाती थी। किन्तु कालान्तर में साम्राज्य विस्तार होने के कारण दूर-दूर के राज्यों में सम्राट का यह आदेश देर से प्राप्त होता था और उसके पूर्व ही आमिल उपज को अनुमानित आधार मानकर राजस्व वसूल कर लेते थे। इसी कारण कभी-कभी राजस्व अधिक वसूल हो जाता था तो कभी कम। परिणामस्वरूप जब कर की अधिक वसूली होती थी तो आमिल उसे वापस करने से इन्कार कर देते थे और जब कम वसूली होती थी तो उसकी पूर्ति के लिए किसानों से पुनः कर वसूल किये जाते थे। निश्चित रूप से इससे किसानों में असन्तोष फैलता था और इन कारणों से राजकोष को भी क्षति पहुॅचती थी। इस प्रकार दोनों ही स्थितियाॅं हानिकारक थी। अतः इन विषमताओं को दूर करने के लिए टोडरमल ने दससाला बन्दोबस्त को स्थापित किया।
दससाला बन्दोबस्त को जमा-ए-दहसाला, आइन-ए-दहसाला आदि अनेक नामों से जाना जाता है। इस बन्दोबस्त के सम्बन्ध में समकालीन इतिहासकार अबुल फजल ने लिखा है कि- इस नवीन कार्य का सार यह था कि हर परगने की पिछली दस साल की उपज और उपज की कीमतों की स्थिति की जानकारी प्राप्त कर ली गई और उसका दसवाॅ भाग वार्षिक मालगुजारी के रूप में निश्चित कर दिया गया। इसकी एक विशेषता यह भी थी कि सामान्य फसलों पर दससाला व्यवस्था के अनुसार ही कर निश्चित होते थे जबकि कुछ अच्छी आय देने वाली फसालों जैसे- नील, पोस्त, गन्ना आदि पर कुछ अधिक कर लगाये जाते थे।
दससाला व्यवस्था में औसत पैदावार निश्चित करने के लिए प्रत्येक परगना को एक ईकाई माना जाता था और मूल्य निश्चित करने के लिए दस्तूर को ईकाई माना जाता था। वस्तुतः मालगुजारी की नगद दरों को दस्तूर कहा जाता था जिसे उस क्षेत्र के पिछले 10 वर्षों की औसत उपज और औसत कीमतों के आधार पर निश्चित किया जाता था।
भू-राजस्व की दर -
भू-राजस्व के रूप में सामान्यतया उपज का 1/3 भाग वसूल किया जाता था किन्तु यह भी उल्लेखनीय है कि राजस्व वसूली में पूरे साम्राज्य में एकरूपता नही थी। गुजरात में उपज का 1/2 भाग तथा अजमेर में 1/7 या 1/8 भाग वसूल किया जाता था। मोरलैण्ड और इरफान हबीब का मानना है कि भू-राजस्व की दर उत्पादन का आधा या तीन चैथाई थी। काश्मीर में अकबर ने कुल उत्पादन के आधे भाग की वसूली का आदेश दिया था। आई0ए0एच0 कुरैशी का मानना है कि संभवतः भू-राजस्व 1/3 ही लिया जाता था। अगर इस तरह की बात होती तो किसानों का विद्रोह शाहजहाॅं के समय में न होकर अकबर के समय ही हुआ होता। भूमिकर वर्ष में दो बार रबी और खरीफ की फसल के समय वसूला जाता था। कर को किसी वस्तु के रूप में नही अपितु नकद रूप में वसूल किया जाता था।
भू-राजस्व का संग्रहण -
भूमि लगान का प्रबन्ध और उसकी वसूली के लिए अनेक प्रकार के अधिकारी-कर्मचारी भी मौजूद थे। भू-राजस्व के संग्रह के लिए सरकारी अधिकारियों को दस्तूर-अल-अमल अर्थात निर्देश दिया जाता था। भू-राजस्व की वसूली करने वाले अधिकारियों में सरकार के स्तर पर अमालगुजार और परगने के स्तर पर आमिल होता था। प्रत्येक परगने में कानूनगो होता था जो गाॅव के पटवारियों का प्रमुख होता था। भू-राजस्व के संग्रहण में सबसे छोटी ईकाई गाॅंव होती थी जहाॅ मुकद्दम और पटवारी होता था। लगान प्रबन्ध और वसूली से सम्बन्धित सबसे महत्वपूर्ण कर्मचारी आमिल को माना जाता था। आमिल के पद पर एक ऐसे योग्य व्यक्ति को नियुक्त किया जाता था जो काफी ईमानदार और परिश्रमी होता था। अपने क्षेत्र के मुकद्दम, पटवारी और कारकून आदि कर्मचारियों के रजिस्टरों की जाॅच करना और कृषकों तथा बाजार के भावों की दशा का मासिक विवरण सरकार को भेजना इसका मुख्य काम था। लगान प्रबन्ध से जुडा दूसरा प्रमुख कर्मचारी वितिकचि था। इस पद पर ऐसे व्यक्ति को नियुक्त किया जाता था जिसका लेख सुन्दर हो, जो हिसाब- किताब में निमुण हो और जिस जिले में वह नियुक्त हो वहाॅं के कायदे- कानून और रीति-रिवाज से वह भली-भाॅति परिचित हो। वह राज्य के सभी प्रकार के लगान का विवरण लिखित रूप में केन्द्रीय सरकार को भेजता था। लगान वसूली से जुडा कर्मचारी पोतदार कहलाता था। इसका कार्य किसानों द्वारा लगान से प्राप्त धनराशी को राजकोष में जमा करना और उसे सुरक्षित रखना था। हिसाब-किताब के लिए इसके पास एक रजिस्टर भी होता था। इसके अलावा भी कानूनगो, पटवारी जैसे कर्मचारी थे जो कर वसूल करने में आमिल आदि कर्मचारियों की सहायता करते थे।
अकबर की राजस्व व्यवस्था की एक मुख्य विशेषता यह भी थी कि राजस्व निर्धारित करने के साथ ही उसको वसूल करने वाले कर्मचारियों के लिए कुछ नियम निर्धारित किये गये थे। आमिलों को इस बात के कड़े आदेश दिये गये थे कि वे समय से राजस्व वसूली और उसका लेखा-जोखा प्रस्तुत करें। उन्हे यह भी स्पष्ट आदेश था कि वे किसानों से निर्धारित कर से अधिक वसूल न करें। ऐसा न करने पर उन्हे दण्डित किया जाता था तथा अच्छे कार्यों के लिए उन्हे पुरस्कृत भी किया जाता था।
अकबर की भू-राजस्व प्रणाली के गुण -
अकबर के शासनकाल में राजा टोडरमल द्वारा किये गये भू-राजस्व प्रबन्ध से सरकार एवं किसान दोनों को लाभ हुआ। सरकार को पहला लाभ यह हुआ कि अब राज्य की आय निश्चित हो गयी और लगान वसूल करने में सुविधा हो गई। इसके अतिरिक्त अब कोई भी व्यक्ति सरकारी मालगुजारी को हड़प नही सकता था। इस प्रणाली के द्वारा सरकारी कर्मचारियों के अनुचित कार्यों पर पूर्ण रूप से नियंत्रण रखा जाने लगा जिससे उनके चरित्र पर बडा सकारात्मक प्रभाव पडा।
दूसरी तरफ इस व्यवस्था के चलते किसानों को बहुत से करों से मुक्ति मिल गई और उनका भूमि पर अधिकार हो गया। इतिहासकार लेनपूल के अनुसार- ‘‘ भारत में भूमिकर सदा से ही राज्य की आय का साधन रहा है। अब मालगुजारी ही आय का प्रायः सम्पूर्ण भार वहन करने का साधन बन गया था क्योंकि अकबर ने केवल प्रत्येक व्यक्ति पर लगाये गये कर तथा यात्रा कर को ही माफ नही किया था वरन् पचास से भी अधिक अन्य करों को हटा दिया था।‘‘
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह थी कि किसानों का भूमि पर अधिकार हो जाने से किसान अब भूमि की उपज को बढाने में अधिक दिलचस्पी लेेने लगे। उन्होने परिश्रम करके भूमि की उपज में उन्नति की। किसानों को अब दैवीय या प्राकृतिक आपदाओं से भय नही रह गया क्योंकि ऐसी परिस्थिति में सरकार हर तरह से सहायता करने के लिए तैयार थी। इस व्यवस्था के द्वारा किसानों को सरकारी खजानों में जाकर लगान की रकम जमा करने की सुविधा मिल गई। इससे ये सरकारी कर्मचारियों के दबाव से बच गये। अब उनको घूस, रिश्वत, उपहार आदि नही देने पड़ते थे। लगान निश्चित हो जाने से किसानों को काफी राहत मिली। अब वे अच्छी तरह जान गये कि उनको सरकार को कितनी रकम देनी है। इससे उनको खेती की उपज बढाने में प्रोत्साहन मिला क्योंकि खेती का अधिक-से-अधिक लाभ किसानों को देने की व्यवस्था की गई थी।
यद्यपि अकबर की भू-राजस्व प्रणाली काफी सराहनीय है फिर भी अनेक इतिहासकारों ने इसमें विद्यमान कमियों की ओर भी इंगित किया है और इसकी आलोचना की है। आलोचकों का मानना है कि अकबर के शासनकाल में प्रजा इतनी ईमानदार और शान्तिप्रिय नही थी कि वह सिद्धान्तों का पूर्णरूप से पालन कर सकती। आलोचक यह भी मानते है कि अकबर ने कर निर्धारण एवं वसूली की कडी व्यवस्था की थी। कर वसूली के समय प्रजा और राजस्व कर्मचारियों के बीच काफी संघर्ष होता था। जैसा कि जदुनाथ सरकार ने लिखा है कि - मालगुजारी के वसूली के लिए सदैव सरकार एवं कृषकों में संघर्ष होता रहता था तथा कभी-कभी कठोरता के साथ ही कर वसूल कर लिया जाता था। कुछ विद्वानों का यह भी मानना है कि टोडरमल के रजिस्टर इस प्रकार थे जिसमें प्रजा के हित की अवहेलना तथा राज्य सरकार के हितों की रक्षा की गई थी।
लेकिन इन आलोचनाओं के बावजूद वास्तविकता यह थी कि इस प्रबन्ध से प्रजा की दशा अच्छी हो गई थी। इस बात की पुष्टि में इतिहासकार ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है कि- ‘‘जीवन के उपयोग की सभी आवश्यक वस्तुएॅं सस्ती थी। किसान के रहन-सहन का स्तर पहले से अधिक उत्तम बन गया था। वे उससे अधिक आनन्द का उपभोग करते थे जितना कि वे करों के कम भार और सुव्यस्थित शासन के अन्तर्गत प्राप्त करते थे।‘‘
मूल्यांकन:
उपर्युक्त विवरण के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि अकबर की राजस्व प्रणाली से प्रजा, किसान एवं सरकारी पदाधिकारी सभी प्रसन्न थे, जैसा कि डॉ० ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है कि- “भू-राजस्व प्रणाली किसानों के लिए एक महान् वरदान सिद्ध हुई। राज्य को उनसे जो कुछ लेना था वह निश्चित कर दिया गया और प्रत्येक कृषक को यह ज्ञात हो गया कि उसे सरकार को क्या देना है।”
अकबर की राजस्व प्रणाली के सम्बन्ध में डॉ० आर0 पी0 त्रिपाठी ने लिखा है कि- “यद्यपि अकबर के करों का भार भीषण रूप से असहनीय नहीं था, लेकिन वे कम भी नहीं थे। इसके अतिरिक्त अकबर शताब्दियों से जनता का पिता के नाम से प्रसिद्ध है। इसका प्रमुख कारण यही है कि उसने भारत के किसानों को एक ऐसी राजस्व प्रणाली प्रदान की जो केवल स्थाई ही नहीं, बल्कि जनता द्वारा पूरी तरह समझ भी ली गई थी।”
अन्य मुगल शासकों के अधीन भू-राजस्व:
अकबर के शासनकाल में भू-राजस्व सम्बन्धी सारी व्यवस्थाएं ठीक-ठाक चलीं। किन्तु उसके बाद उसके उत्तराधिकारियों के काल में इसमें दोष आने लगे। शाहजहां ने लगान व्यवस्था में परिवर्तन लाकर शाही खजाने को भरने का प्रयत्न किया। उसने लगान की दर में वृद्धि कर दी। फलस्वरूप राज्य की आय बढ़ गई। योग्य राजस्व मंत्री, मुर्शिद-कुली खां ने विभिन्न उपायों से शाही खजाने को भरने का सफल प्रयास किया। सिर्फ लगान के रूप में साम्राज्य को 45 करोड़ रुपये सालाना प्राप्त होते थे। किन्तु औरंगजेब के शासनकाल में जागीरदारी व्यवस्था में उत्पन्न संकट तथा कृषक विद्रोहों के कारण लगान वसूली और इससे राज्य को होनेवाली आय में गिरावट आई और राज्य के सामने एक आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया।
सम्पूर्ण मुगलकाल में किसान तथा कर वसूलनेवाले अधिकारियों के बीच तानातानी चलती रही। ठेकेदार और लगान अधिकारी किसानों से अधिक कर लेने का प्रयास करते थे तथा अनेक अवैध कर वसूल करते थे। मुगल शासकों ने इस दिशा में सुधार के असफल प्रयास किये। दूसरी ओर किसान भी यथासंभव वैसे कर देना नही चाहते थे जो अनुचित थे। ऐसी हालत में दोनों के बीच संघर्ष की स्थिति का पैदा होना स्वाभाविक था। सामान्य तौर पर हम यह कह सकते है कि इस क्षेत्र में केवल अकबर और जहाॅंगीर के शासनकाल को छोड़कर किसानों की अवस्था असंतोषजनक रही।
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