Summary
The Pagalpanthi Revolt (1825) was an important peasant and tribal uprising against the British East India Company and oppressive zamindars in the northern parts of present-day Bangladesh, especially in the Sherpur and Mymensingh regions. The movement was founded by Karim Shah, who preached equality, justice, and unity among poor peasants and tribal communities. After his death, his son Tipu Shah became the leader and transformed the movement into a strong resistance against British rule.
The main causes of the revolt were excessive land taxes, exploitation by zamindars, forced collection of revenue, and the harsh treatment of peasants and tribal people. In 1825, Tipu Shah led thousands of followers in attacking government offices and zamindar estates. The rebels briefly established their authority over parts of Sherpur and declared Tipu Shah as their ruler. However, the British government soon sent military forces to crush the uprising. After fierce fighting, the revolt was suppressed, and many rebels were arrested or killed.
Although the Pagalpanthi Revolt did not succeed in ending British rule, it became a symbol of resistance against colonial oppression. It demonstrated the growing anger of peasants and tribal communities and inspired future movements against British exploitation. Today, the revolt is remembered as an early and significant struggle for justice and freedom in the Indian subcontinent.
For more detail you may visit on www.itihaastarang.in
पागलपंथी विद्रोह (1825-33)
औपनिवेशिक शासनकाल में आदिवासियों और जनजातियों के अनेक विद्रोह हुये जिनमें से एक महत्वपूर्ण विद्रोह पागलपंथी विद्रोह के नाम से जाना जाता है। यह विद्रोह 1825-27 और 1832-33 में हुआ। वस्तुतः यह विद्रोह गारो जाति का विद्रोह था। इसका क्षेत्र बंगाल के मयमन सिंह जिले का सुसंग-शेरपुर अंचल था जो आजकल बंगलादेश में है।
सुसंग अंचल में उन्नीसवीं सदी के प्रथम भाग में हाजंग आदिवासी किसानों ने गारो आदिवासियों के साथ मिलकर प्रसिद्ध श्हाथी खेदा विद्रोहश् किया था। ये हाजंग गारो पहाड़ियों की तलहटी में घने जंगल में श्खेदाश् बनाकर हाथी पकड़ते थे। जमींदार ये हाथी बेचकर मालामाल होते। वे हाजंगों को बेकार खटा कर हाथी पकड़ने को बाध्य करने लगे, तो ये आदिवासी विद्रोही बन गये। उन्होंने जमींदार के पाइकों-बरकन्दाजों की सेना को बारामारी के मैदान में पराजित किया। जमींदार सपरिवार जान लेकर नेत्रकोना भाग गया। पाँच साल तक लड़कर हाजंगों ने बेगार प्रथा खत्म करा दी। पागलपंथी विद्रोह भी किसानों का विद्रोह था, लेकिन वह सिर्फ जमींदारों के खिलाफ न था, अंगरेज साम्राजियों के भी खिलाफ था।
इस विद्रोह को पागलपंथी विद्रोह क्यों कहते हैं ? ‘पागलपंथी‘ धर्म बंगाल में फैले बाउल धर्म का ही दूसरा नाम है। बंगाल के बाउल अपना परिचय अक्सर पागल कहकर देते हैं।
1813 में पागलपंथी धर्म के प्रचारक करमशाह की मृत्यु हुई। उनकी मृत्यु के बाद सुसंग परगना के लेटियाकाँदा गाँव के टीपू गारो जिसे टीपू शाह के नाम से भी जाना जाता है, ने अपनी जाति के लोगों को ‘पागलपंथी‘ धर्म में दीक्षित किया। कही कही किसी पुस्तक में इसे तीतू मीर के नाम से भी सम्बोधित किया गया है। टीपू गारो का यह धर्म कहता था: “सभी मनुष्यों को ईश्वर ने बनाया है। कोई किसी के अधीन नहीं; इसलिए ऊँच-नीच का भेद करना उचित नहीं।‘‘
1812 में गारी सरदार सफाती ने स्वाधीन गारो राज्य स्थापित करने की कोशिश की थी। यह चेष्टा असफल रही, लेकिन उसने गारो जाति को जगा दिया। उक्त असफलता के बाद जमींदारों ने अंग्रेज शासकों की सहायता से अपना शोषण और अत्याचार बढ़ा दिया। इस अंचल का शोषण जमींदार किस तरह करते थे, इसके उदाहरण के लिए राजस्व को ही लीजिए। दससाला बन्दोवस्त के समय विस्तृत पहाड़ी अंचल का राजस्व सिर्फ 12 रुपया निश्चित किया गया था। जमींदार अंग्रेज शासकों को सिर्फ 12 रुपया देते थे, लेकिन प्रजा से तरह-तरह के कर बैठा कर 20 हजार रुपया वसूल करते थे। 1793 में इस्तेमारी बंदोबस्त में सब जगह की तरह यहाँ भी राजस्व बहुत ज्यादा बढ़ाया गया। इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि मीरकासिम की नबाबी के जमाने में पूरे सुसंग परगने का राजस्व 25,186 रु. था, लेकिन इस्तमारी बंदोबस्त में सिर्फ पहाड़ी अंचल से 40 हजार रुपया वसूल किया जाने लगा।
1824 ई0 में बर्मा युद्ध के समय अंग्रेज शासकों की सहायता के नाम पर जमींदारों ने करों का बोझ एकाएक बहुत बढ़ा दिया। इससे गारो विद्रोही हो गये। मयमन सिंह जिले के गजेटियर ने लिखा कि टीपू के नेतृत्व में पागलपंथी (गारो) विद्रोह “जमींदारों के भयंकर शोषण-उत्पीड़न का ही अनिवार्य परिणाम था।” (पृ0सं0 32)
करमशाह के द्वितीय पुत्र टीपू शाह के आदेश से सारी प्रजा ने जमींदारों को लगान आदि देना बंद कर दिया। जमींदारों ने जबर्दस्ती वसूल करने की कोशिश की तो विद्रोही उनसे भिड़ गये। जनवरी 1824 में गढ़ जरीपा में दोनों पक्षों में युद्ध हुआ। जमींदार हार कर सपरिवार भाग गये। उन्होंने कालीगंज के ज्वायंट मजिस्ट्रेट डेम्पियर की कचहरी में जाकर शरण ली। विजयी सात सौ विद्रोहियों ने शेरपुर शहर पर अधिकार कर लिया। इस शहर को केंद्र बनाकर विद्रोहियों के सरदारों ने नया गारो राज्य स्थापित किया। इस शहर में उनका न्यायालय और प्रशासन विभाग स्थापित हुआ। गढ़ जरीपा से टीपू विद्रोहियों का नेतृत्व करते रहे। बकसू को न्यायाधीश और दीपचान को फौजदार या मजिस्ट्रेट नियुक्त किया।
गारो जाति का यह राज्य दो साल तक रहा। इस बीच उनके और अंग्रेजी सेना के बीच कई बार युद्ध हुए। इन सब में अंग्रेज शासकों की सेना पराजित हुई। 1826 के अंत में अंग्रेज शासकों की एक बड़ी सेना रंगपुर से आयी। इस सेना के साथ युद्ध में विद्रोही पराजित हुए। 1827 में छल से एक दारोगा दस बरकन्दाजों के साथ जरीपा के किले में घुस गया और टीपू को गिरफ्तार कर लिया। मयमनसिंह के सेशन जज ने उन्हें जिन्दगी भर कैद की सजा दी। मई 1852 में जेल में ही टीपू की मृत्यु हुई।
यह पहला विद्रोह पराजित हुआ, पर इसने अंग्रेज शासकों को आदिवासियों पर होने वाले जुल्मों को कम करने का आदेश देने को बाध्य किया। किन्तु जमींदारों के अत्याचार ने फिर विद्रोह की ज्वाला धधका दी। 1833 ई0 फिर जमींदारों और अंग्रेज शासकों के विरुद्ध गारो उठ खड़े हुए।
1832 के अंत में विद्रोहियों ने जमींदारों की कचहरियों और जमींदारपरस्त गारो पर हमले शुरू किये। कितनी ही जगह उन्होंने जमींदारों के बरकन्दाजों और पुलिस पर आक्रमण किये। 1833 के आरंभ में जानकू पाथर और दोबराज पाथर नामक दो गारो सरदारों ने विद्रोहियों का नेतृत्व सँभाला। विद्रोहियों को दो भागों में बाँटा गया। एक भाग ने जानकू पाथर के नेतृत्व में शेरपुर के पच्छिमी कोने में कड़ेबाड़ी को और दूसरे ने दोवराज के नेतृत्व में नलिताबाड़ी को अपना अड्डा बनाया और आक्रमण की तैयारी की। अप्रैल 1833 में दोनों ने मिलकर शेरपुर पर आक्रमण किया और जमींदार के घर तथा कचहरी को लूट लिया। जमींदार और उसके आदमी जान बचाकर किसी तरह भागे। इसके बाद विद्रोहियों ने थाने पर आक्रमण कर उसमें आग लगा दी। कुछ दिनों तक लगता था मानो अंग्रेजी राज खत्म हो गया है।
शेरपुर पर आक्रमण का समाचार पाते ही जिला मजिस्ट्रेट डनबर ने ज्वायंट मजिस्ट्रेट गैरेट को वहाँ भेजा। गैरेट के शेरपुर पहुँचते ही विद्रोहियों ने उसका बंगला घेर लिया। वह किसी तरह भाग निकला और जमींदारों के सिपाहियों तथा पुलिस को जमा कर फिर आगे बढ़ा। नलिताबाड़ी की तरफ गैरेट को सदल-बल आता देख दोबराज विद्रोहियों को लेकर पीछे हट गये और पहाड़ों में छिप गये। सरकारी सेना ने नलिताबाड़ी पर अधिकार कर लिया। जमींदार की कचहरी फिर लगने लगी। सरकारी सेना और जमींदार के कर्मचारी विजय उत्सव मना रहे थे कि रात को विद्रोहियों ने नलिताबाड़ी पर धावा बोल दिया। सरकारी सिपाहियों को बंदूकें उठाने का भी मौका न मिला, सब जान लेकर भागे। बहुत से सिपाही और जमींदार के कर्मचारी मारे गये और घायल हुए। सारे शेरपुर में आतंक छा गया।
27 मई 1833 को जमालपुर स्थित सरकारी सेना के पास पत्र लिखकर मयमनसिंह जिले के मजिस्ट्रेट डनबर ने सूचित किया कि सेना के बगैर विद्रोह का दमन नहीं किया जा सकता। विद्रोहियों ने शेरपुर और गारो पहाड़ी के बीच सारे विस्तृत अंचल पर अधिकार कर लिया है, वे अब शेरपुर पर आक्रमण की तैयारी कर रहे हैं। जिला मजिस्ट्रेट ने यह भी बताया कि विद्रोहियों की मुख्य सेना लगभग चार से पाँच हजार होगी। बल्लम, तलवार, जहरीले तीर और धनुष उनके हथियार हैं। किसी-किसी के पास बन्दूकें भी हैं।
नियमित सेना ने आकर जब चारों तरफ से हमले किये, तब विद्रोहियों को पराजित किया जा सका। गारो पराजित हुए, लेकिन वे बीच-बीच में सर उठाते रहे। उन्नीसवीं सदी के अंत तक उनके विद्रोह के प्रमाण पाये जाते हैं।
