window.location = "http://www.yoururl.com"; Ho Tribal Revolt during Colonial India | औपनिवेशिक भारत में 'हो' जनजातीय विद्रोह

Ho Tribal Revolt during Colonial India | औपनिवेशिक भारत में 'हो' जनजातीय विद्रोह

 


Summary :

The 'Ho' Tribal Revolt was an important tribal uprising that took place between 1820-1821 in the Singhbhum region of present-day Jharkhand, India. It was led by the Ho tribe, which strongly opposed British interference in its traditional way of life. The main causes of the revolt were the expansion of British authority, heavy taxation, and attempts to control the tribe's self-governing system. The Ho people valued their independence and refused to accept foreign rule.

The British, with the support of some local rulers, tried to establish administrative control over the region. In response, the Ho warriors organized a strong resistance. They used guerrilla warfare and took advantage of the dense forests and hilly terrain to launch attacks against British forces. Their courage and determination made it difficult for the British to gain complete control of the area.

Although the British eventually suppressed the revolt by sending larger military forces, the Ho Tribal Revolt remains a significant chapter in India's history of resistance against colonial rule. It symbolized the determination of tribal communities to protect their land, culture, and traditional rights. The revolt also inspired later tribal movements and contributed to the broader struggle against British colonialism in India. detail articles are following in Hindi.

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'हो' विद्रोह औपनिवेशिक भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ छोटा नागपुर  क्षेत्र के सिंहभूम जिले (वर्तमान झारखंड) में ‘हो‘ जनजाति द्वारा किया गया एक प्रमुख और सशक्त जनजातीय विद्रोह था। यह विद्रोह मुख्य रूप से 1820-1822 के दौरान हुआ और 1837 तक रुक-रुक कर चलता रहा। 

हो या कोल्हा भारत का एक ऑस्ट्रोएशियाटिक मुंडा जातीय समूह है, जो मुख्य रूप से झारखंड के कोल्हान क्षेत्र और ओडिशा के कुछ हिस्सों में केंद्रित है तथा पश्चिम बंगाल, बिहार, बांग्लादेश व नेपाल में भी इसकी छोटी आबादी है।

धलभूमि पर पहली चढ़ाई (1767) के वक्त अंग्रेज पोराहाट (पुरीहाटी) के राजा के सम्पर्क में आये जो उस वक्त वीरभूम का राजा कहलाता था। इस राजा का नाम जगन्नाथ सिंह था। उसे उसके भतीजे ने कैद कर रखा था। अंग्रेजों की सफलता देख राजा ने अपना दूत उनके पास भेजा, उनकी सहायता माँगी और सूचित किया कि वह अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार करने तथा वार्षिक कर देने को तैयार है। अंग्रेज तो इसी तरह भारतीय राजाओं को अपनी शरण में आते देखने और उनका संरक्षक बन सारे भारत में ब्रिटिश राज्य लाने को उत्सुक रहते थे। यह प्रस्ताव पाते ही मेदिनीपुर के अंगरेज रेजीडेन्ट जार्ज वन्सीटार्ट ने दिसम्बर 1776 को कलकत्ते में कंपनी सरकार के तत्कालीन प्रधान वेरेल्स्ट के पास लिख भेजा कि -

‘‘सिंहभूम (राज्य) में पहले लगभग 14,000 गाँव थे, लेकिन इस वक्त केवल लगभग 500 गाँव राजा के अधिकार में रह गये हैं। दूसरों में से कुछ तो नष्ट हो चुके हैं। बाकी कोलों के, जो लूटपाट करने वाले डकैतों की उपजाति है, हाथ में है। यह राजा विवाह के जरिए संभलपुर के राजा का दूर का सम्बन्धी है। दोनों रियासतों के बीच बराबर पत्रचार होता है और व्यापारियों के बीच अबाध आदान-प्रदान हुआ करता है। वे एक दूसरे से लगभग 90 कोस की दूरी पर हैं और दोनों के बीच साधारणतः सारे रास्ते अच्छी सड़क है। मुगलों के राज में सिंहभूम कभी भी पराधीन नहीं हुआय बल्कि 52 पीढ़ियों से स्वतंत्र और वर्तमान परिवार के अधिकार में रहा है। अगर आप इस देश को कंपनी के संरक्षण में लेने की सम्मति दें तो मेरा विश्वास है कि सिपाहियों की चार कंपनियाँ काफी सेना होंगी और इससे संभवतः संभलपुर के साथ आसानी से परस्पर सम्बन्ध का दरवाजा खुल जायगा।‘‘

वन्सीटार्ट इस प्रकार इस राज्य को कंपनी के संरक्षण में लेने की सिफारिश कर रहा था। जिस राज्य को मुगल भी नहीं जीत सके, जो बावन पीढ़ियों से स्वतंत्र चला जा रहा है, वह कंपनी की अधीनता स्वीकार करने को तैयार है। वन्सीटार्ट के अनुसार ऐसा मौका नहीं चूकना चाहिए। यही नहीं, यह मुट्ठी में आ जाता है तो संभलपुर को भी मुट्ठी में लाना आसान होगा।

इस सिफारिश के पाते ही कलक्टर जनरल ने वन्सीटार्ट को दो जासूस सिंहभूम भेजने का आदेश दिया जो उस राज्य और किले में सेना के बारे में जानकारी हासिल करके आयेंगे। साथ ही वे यह भी खबर ले आयेंगे कि किसी प्रकार मराठे तो इस पर दावा नहीं करते, क्योंकि उस वक्त मराठों से भिड़ना कंपनी के बूते के बाहर की बात थी।

इस आदेश के अनुसार दो सिपाही सिंहभूम भेजे गये। लेकिन उन्हें जल्दी ही वापस आना पड़ा, क्योंकि ज्योंही वे सिंहभूम के अन्दर एक या दो कोस पहुँचे, उन्हें वापस जाने को बाध्य किया गया। किन्तु वे यह जानकारी ले आये कि राजा जगन्नाथ सिंह अपने भतीजे शिवनाथ सिंह की मुट्ठी में है, राजा पोराहाट में रहता है और सिंहभूम पर मराठों का कभी भी राज न था और न कभी मराठे वहाँ से कोई चैथ वसूल कर सके। इस पर भी उस वक्त अंगरेजों ने सिंहभूम को अपने हाथ में लेना उचित न समझा। इसका कारण वेरेल्स्ट के शब्दों में मिलता है रू

चूँकि मैं कटक पर अधिकार करने की जल्दी आशा करता हूँ, इसलिए मैं तब तक सिंहभूम के बारे में कोई भी कार्रवाई करना उचित नहीं समझता।ष्

सिंहभूम को अपने नियंत्रण में लाने का कदम अंग्रेजों ने 1820 में उठाया। पोराहाट के राजा ने कंपनी राज्य की अधीनता स्वीकार कर ली और सालाना 101 रुपया कर देना मंजूर किया। अंग्रेज उसके संरक्षक बने। ऐसा करने में राजा के लक्ष्य तीन थे- खरसवान और सराइकेला के सामन्तों को अपने अधीन लाना, सराइकेला के राजा के यहाँ से अपनी कुलदेवी की मूर्ति वापस पाना और अंग्रेजों की मदद से ही आदिवासियों का दमन करना, जिन्हें वह अपनी प्रजा बताता था, लेकिन जो पचास साल से ज्यादा से स्वाधीन चले आ

रहे थे।

अंग्रेजों ने पहला दावा मानने से इन्कार कर दिया, किन्तु पिछले दो दावे स्वीकार किये। राजा और उसके सामन्त सरदारों की अन्तिम इच्छा पूरी करने के लिए मेजर रफसेज ही आदिवासियों का दमन करने चला। लेकिन ज्योंही उसने हो आदिवासियों पर चढ़ाई की तैयारी की, राजा और अन्य सामन्त सरदारों ने उसे ऐसा न करने को कहा। ये राजा और सामन्त सरदार अंग्रेजों की मदद करने की हिम्मत न करते थे, क्योंकि हो आदिवासियों का आतंक उनके मन में घर किये हुए था। रफसेज ने लिखा है कि-

‘‘इन जंगली लोगों की ताकत और खूँखारी के बारे में उनकी धारणा इतनी भयग्रस्त थी कि वे मेरे मातहत काफी सेना के बावजूद स्पष्टतः बहुत डर गये थे और उन्होंने चढ़ाई के खतरे के खिलाफ विधिवत प्रतिवाद किया था।‘‘

मेजर रफसेज हो आदिवासियों को राजा की अधीनता स्वीकार करने को बाध्य करने के लिए गया था, लेकिन उसने ऐसा दिखावा किया कि मानो वह उनका दोस्त बनना चाहता है। वह हो आदिवासियों को बेवकूफ बना कर उल्लू सीधा करना चाहता था, लेकिन हो आदिवासियों ने उसे ही बेवकूफ बनाया और वह भी काफी ।

उन्होंने भी उसके साथ मित्रता का ही दिखावा किया। रफसेज का कैम्प उन्हें दोपहर की मोठी नींद लेने की बड़ी अच्छी जगह मालूम हुई। वे उससे अच्छी तरह बातें करते, उसकी दरियों पर पैर फैला कर लेट जाते और मीठी नींद लेते। रफसेज समझ रहा था कि वह इन जंगली आदमियों को वश में करने में समर्थ हो रहा है, लेकिन जल्दी ही उसकी नींद खुली।

हो आदिवासियों ने रफसेज को अपने अंचल में काफी अन्दर तक घुस जाने दिया और चायबासा में अपने सबसे अच्छे गाँवों के बीच पड़ाव डालने दिया। यहाँ एक दिन रफसेज की सेना के सेवकों पर कुछ सशस्त्र हो ने हमला किया। एक घसियारा मारा गया और दूसरे घायल हुए। इसके बाद ही हो पहाड़ियों की तरफ चल पड़े। उन्हें घेरने के लिए लेफ्टिनेन्ट मेटलैण्ड के अधीन कुछ घुड़सवार और पैदल सैनिक भेजे गये। हो लोगों ने तुरन्त इनका पीछा करने वालों पर तीरों की बरसा की । तीरों का असर होता न देख वे दुस्साहस कर खुली जगह में हाथ में फरसा लेकर पीछा करने वालों का मुकाबिला करने को डट गये।

गोलियों के मुकाबिले में आमने-सामने की लड़ाई में बेचारा फरसा क्या करता ? वे बहुत बड़ी संख्या में मारे गये, आधे से कम ही बच कर जा सके। अब रफसेज तेजी से उस गाँव की तरफ बढ़ा जहाँ घसियारा मारा गया था। यहाँ 60 आदमियों को उसने घसियारे की लाश के पास फरसा ताने मुकाबिला करने को तैयार पाया। ज्योंही कंपनी की सेना पास पहुँची, वे घोड़ों और आदमियों पर बाज की तरह टूट पड़े। सारे के सारे यहाँ मारे गये।

शाम को रफसेज ने देखा कि उसके पृष्ठभाग के कट जाने का खतरा उपस्थित है, उसका समाचार आदान-प्रदान का रास्ता बन्द है। दूसरे दिन उसने अपनी सेना की एक टुकड़ी हो आदिवासियों पर हमला करने को भेजा जो गुटियालोर गाँव में हथियार लेकर इकट्ठा हुए थे। मेटलैण्ड अपनी टुकड़ी के साथ ज्योंही गाँव के पास पहुँचा, उसने देखा कि हो बड़ी संख्या में वहाँ इकट्ठा हैं। गाँव के पास पहुँचते ही विद्रोहियों ने उसका स्वागत तीरों की बरसा से किया। इससे उसका काफी नुकसान हुआ।

उनको गाँव से भगाने के लिए उसने एक नीच चाल चली। उसने गाँव में आग लगा दी, लेकिन इसके बावजूद हो लोगों ने बड़ी दृढ़ता से आक्रमणकारियों का मुकाबिला किया। वे फिर बहुत बड़ी संख्या में मारे गये। दूसरी मुठभेड़ में भी उन्हें बहुत नुकसान उठाना पड़ा।

हो लोगों ने आखिर में अनुभव किया कि वे सिर्फ तीरों-फरसों से फिरंगी सेना की गोलियों का मुकाबला नहीं कर सकते। इसलिए और ज्यादा नुकसान से बचने के लिए उत्तरी अंचल के हो लोगों ने आत्मसमर्पण कर दिया। वे पोराहाट के राजा को कर देने के समझौते पर टीप देने को बाध्य हुए।

लेकिन तभी दक्षिण अंचल के हो आदिवासियों ने मोर्चा सँभाला। मेजर रफसेज को उन्होंने बहुत ही परेशान किया। वह एक-एक इंच जमीन के लिए लड़ता हुआ किसी तरह संभलपुर पहुँचा। इस अंचल के हो स्वाधीन बने रहे। ज्योंही रफसेज जिला छोड़कर गया, उत्तर और दक्षिण के हो लोगों के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। हो गुलाम बन कर जिन्दा रहे, दक्षिण के हो इसे कतई पसन्द न करते थे।

एक देशी सूबेदार के मातहत हथियारों से अच्छी तरह लैस एक सौ हिन्दुस्तानी सैनिक राजा और उत्तर के हो लोगों की मदद को भेजे गये। पहले तो दक्षिण वाले हो ने इस सेना को अपने अंचल में घुसने दिया। सूबेदार उनके चक्कर में पड़ गया। वह कुछ सिपाहियों को साथ लेकर पैसे की वसूली में मदद करने कोलहान गया। वहाँ उसे और उसके सब साथियों को काट कर रख दिया गया। इसके बाद हो लोगों ने उस छोटे से किले पर हमला किया जहाँ हिन्दुस्तानी सैनिकों ने भागकर शरण ली थी। यहाँ से भी अपने बारह साथियों को मरा और दस को घायल छोड़ कर कंपनी के सिपाहियों को भागना पड़ा। इस विजय के बाद ही लोगों ने पोराहाट राजा के राज्य के अधिकांश हिस्से को उजाड़ दिया। वे सराइकेला पर भी चढ़ गये जहाँ के सामन्त ने मदद के लिए कंपनी के एजेन्ट को लिख भेजा ।

1821 में हो आदिवासियों को विद्रोह शान्त करने के लिए कंपनी की बड़ी भारी सेना आयी। एक महीने तक उन्होंने इस सेना का डट कर मुकाबिला किया। इसके बाद मजबूर होकर उन्हें निम्नलिखित समझौता करना पड़ा -

(1) हम अपने को ब्रिटिश सरकार की प्रजा मानते हैं और इसके अधिकारियों के प्रति विश्वासपरायण तथा आज्ञाकारी होने का वादा करते हैं। (2) हम आगामी वर्ष से पाँच साल तक आठ आना प्रति हल, अगर हमारी हालत इस लायक हुई, अपने प्रधान या जमींदार को देने को सहमत हैं। (3) हम अपने परगनों से गुजरने वाली सड़क सब किस्म के मुसाफिरों के लिए खुली और सुरक्षित रखने का वादा करते हैं और अगर बटमारी होती है तो हम चोर को न्याय के सिपुर्द करने तथा चोरी गये माल के लिए जिम्मेदार बनने का वादा करते हैं। (4) हम सब जातियों के लोगों को अपने गाँवों में बसने की इजाजत देंगे और उनकी रक्षा करेंगेय हम अपने बच्चों को ओड़िया और हिन्दी भाषा सीखने का भी बढ़ावा देंगे। (5) अगर हमारे प्रधान या जमींदार हमारे ऊपर अत्याचार करेंगे, तो हम इसके प्रतिकार के लिए अस्त्र धारण न करेंगे, बल्कि अपनी सरहद पर स्थित सेना के अफसरों या किसी अन्य उपयुक्त अधिकारी के पास शिकायत करेंगे।

इस तरह साम्राज्यवादियों ने इन आदिवासियों को वादा करने को बाध्य किया कि जमींदार और दूसरे अधिकारी उन पर चाहे जो अत्याचार करें, लेकिन वे अस्त्र धारण न करेंगे। विदेशी पूँजीपतियों के प्रतिनिधियों ने देशी सामन्तों को निर्वाध शोषण और उत्पीड़न चलाने की पूरी सुविधा दी ।

इस गुलामी के समझौते को हो लोगों ने डेढ़-दो साल में ही फाड़ फेंका, उन्होंने पहले से भी बड़े पैमाने पर आक्रमण किये। धलभूम और बामनघाटी को उजाड़ कर छोटानागपुर के अन्दर बहुत दूर तक वे घुस गये। 1831 । 1831 में जब मुण्डा लोगों ने विद्रोह किया, तो हो भी उनके साथ मिल गये। उनकी सम्मिलित शक्ति के आक्रमण के सामने कंपनी सरकार थर्रा उठी। अंग्रेजों ने अंततः 1837 में कोल्हान क्षेत्र पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया और श्कोल्हान स्टेटश् बनाकर वहां एक नई प्रशासनिक व्यवस्था लागू की।


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